जब ब्रिटेन वर्ल्ड वॉर 2 लड़ रहा था। तब वहां की जनता तो खाने के लिए तरस ही रही थी। साथ ही साथ मोर्चे पर खड़े सैनिक भी भूखे-प्यासे जंग लड़ रहे थे। तब सैनिकों को उम्मीद होती थी घर से आने वाले पार्सल की। पार्सल आता, डिब्बे में से चिट्ठी तो निकलती ही थी। साथ में निकलता था एक नीले रैपर वाला चॉकलेट, शुगर फ्री, खास सैनिकों के लिए। चॉकलेट को जंग के लिए ही बनाया गया था। उस समय भी इस चॉकलेट की डिमांड थी और आज भी है। इतनी कि इसी चॉकलेट से लदा ट्रक आज की तारीख में चोरी हो गया है। अब समझ गए होंगे किस चॉकलेट की बात हो रही है- किट-कैट। जिसने बच्चों से लेकर बूढों को हर ब्रेक में किट-कैट खाने का चस्का लगाया और ये सब हुआ एक फैक्ट्री वर्कर की बदौलत।
इसकी शुरुआत के लिए हमें जाना होगा लंदन। 18वीं सदी में लंदन में एक मशहूर क्लब था। किट-कैट क्लब। इस क्लब में कोई आम आदमी नहीं बल्कि बड़े-बड़े नेता, राइटर्स और आर्टिस्ट ही आते थे। इसी क्लब की मीटिंग्स में किट कैट नाम के मटन पाई परोसे जाते थे। यहीं से किट-कैट नाम निकला लेकिन इसे लाना वाला आदमी कौन था? वह थे हेनरी Isaac Rowntree। जो राउनट्री नाम की कंपनी चलाते थे। यह कंपनी अपनी फ्रूट कैंडिज़ के लिए फेमस थीं। ऑरेंज, स्ट्रॉबेरी अलग-अलग फ्लेवर्स की कैंडिज़। उस समय ब्रिटेन के लोगों को ऐसे फ्रूटी और हल्के मीठे स्नैक्स बहुत पसंद आते थे। राउनट्री ने उसी चीज़ को पकड़ा और कैंडीज़ का बिज़नेस किया। इसी के साथ साथ 1911 में आकर राउनट्री ने किट-कैट नाम का ट्रेडमार्क करा लिया।
उस समय इसका इस्तेमाल नहीं हुआ। फिर 1920 में कंपनी ने किट कैट नाम से डिब्बे वाली चॉकलेट बेचनी शुरू की लेकिन तब यह चॉकलेट बिकी नहीं। जिसकी वजह से राउनट्री ने इसे बेचना ही बंद कर दिया। एक बिज़नेस बंद हुआ तो दूसरा तो चल ही रहा था- कैंडीज़ का। उसके लिए राउनट्री की फैक्ट्री में रोज़ कर्मचारी आते ही थे। इसी में से एक कर्मचारी ने एक दिन सजेशन बॉक्स में एक आइडिया लिखकर दिया। आदमी ने लिखा कि ऐसा स्नैक होना चाहिए जिसे आदमी आसानी से अपने बैग में डालकर काम पर ले जा सके। इसे काम के बीच-बीच में खा सके और जो टिफिन बॉक्स में आसानी से आ जाए।
किटकैट कैसे बना ब्रेक सिंबल?
यहीं से आइडिया चमका किट-कैट का। कंपनी को यह आइडिया पसंद आया और इसी से 1935 में Rowntree’s चॉकलेट बॉर लॉन्च की। इसे सबसे पहले लंदन और साउथ इंग्लैंड में बेचा गया। 4 फिंगर वाली चॉकलेट को लाल रंग के कवर में बेचा जाता था लेकिन तभी 1942 में वर्ल्ड वॉर 2 हो गई। खाने-पीने की चीज़ों की कमी हुई। जिसका असर किटकैट पर भी पड़ा। किटकैट बनाने के लिए ज़रूरी चीज़ें कम पड़ने लगीं- जैसे दूध। इसलिए स्वाद बदलकर डार्क चॉकलेट कर दिया। लाल रंग की जगह नीला कवर आ गया लेकिन जैसे ही युद्ध खत्म हुआ। सब कुछ फिर से पहले जैसा हो गया। नाम वापिस किटकैट हो गया। दूध वाली चॉकलेट। अब ब्रिटेन में तो चॉकलेट हिट हो गई। फिर इसे दूसरे देशों में भेजा जाने लगा। कैनेडा, साउथ अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया।
अब चॉकलेट फेमस तो हो गई थी लेकिन इससे जुड़ा कोई स्लोगन नहीं था। जिससे यह लोगों को और कनेक्ट कर पाए। इसके लिए एक ऐड बनाया गया। ऐड में एक बच्चा दिखाया गया। जो एक खिलौने को जोड़ने की कोशिश कर रहा है लेकिन वह हर बार फेल हो रहा है, वह थोड़ा ब्रेक लेता है और उस ब्रेक में किटकैट खाता है। माने यह दिखाया गया कि जब दिमाग थक जाए तो एक छोटा सा चॉकलेट ब्रेक सब ठीक कर देता है। किटकैट को ऐसे दिखाया गया जैसे रोज़मर्रा की जिंदगी में एक छोटा सा ट्रीट हो। इसी के चलते 1957 में पहला टीवी ऐड आया, जिसमें टूटी हुई चॉकलेट बार की इमेज के साथ मशहूर लाइन लिखी जाती थी। Have a Break, Have a Kitkat। जिसने किटकैट को ब्रेक लेने का सिंबल बना दिया। ऐड ने चॉकलेट को और बूस्ट दिया और राउनट्री ने जर्मनी में नई फैक्ट्री लगाई ताकि यूरोप में बढ़ती डिमांड को पूरा किया जा सके।
Nestle ने बनाया ग्लोबल ब्रांड
किट-कैट की कहानी में सबसे बड़ा मोड 1988 में आया। जब स्विट्ज़रलैंड की कंपनी नेस्ले ने राउनट्रीज़ को खरीद लिया। इस डील के बाद किट कैट एक लोकल ब्रांड से निकलकर धीरे-धीरे ग्लोबल लेवल का बड़ा नाम बन गया। नेस्ले के पास पहले से ही मजबूत नेटवर्क और मार्केटिंग थी। इसलिए उसने किटकैट को अलग-अलग देशों में लोगों के स्वाद के हिसाब से ढालना शुरू किया। यानी सिर्फ चॉकलेट बेचने की बजाय। हर देश में उसके टेस्ट और फ्लेवर को लोकल पसंद के हिसाब से बदला गया। जापान में आज भी किट कैट के 400 से ज्यादा फ्लेवर्स मिलते हैं। जापानी भाषा के शब्द "Kitto Katsu" का मतलब ‘निश्चित रूप से जीत’ होता है। यह शब्द किटकैट से काफी मिलता-जुलता है। इसी वजह से जापान में छात्र इसे परीक्षाओं से पहले Good Luck चार्म के तौर पर खरीदते और गिफ्ट करते हैं।
नेस्ले को डील के बाद नेस्ले को दुनियाभर में किट-कैट का कंट्रोल तो मिल गया लेकिन अमेरिका में मामला थोड़ा अलग था। वहां द हर्शी कंपनी के पास 1970 से ही किट कैट का लाइसेंस था। जिसके तहत वह चॉकलेट बनाते थे और बेचते थे। एग्रीमेंट इतना मज़बूत कि राउनट्री को खरीदने के बाद भी नेस्ले को इसे मानना ही पड़ा। इसी वजह से आज भी अमेरिका में किट-कैट हर्शी बनाता है जबकि बाकी दुनिया में नेस्ले इसका प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन संभालता है। साल 2000 में नेस्ले ने अपने नेटवर्क का फायदा उठाकर जापान, मलेशिया, भारत और चीन जैसे देशों में नई फैक्ट्रियां लगाईं, जिससे KitKat की पहुंच और बढ़ गई।
केडबरी ने दी टक्कर!
2004 के आसपास चॉकलेट इंडस्ट्री में जबरदस्त टक्कर चल रही थी। खासकर केडबरी और नेस्ले के बीच उस समय ब्रिटेन के लोग यूरोप में सबसे ज्यादा चॉकलेट खाने वालों में थे लेकिन मार्केट में कॉम्पिटीशन बढ़ गया। केडबरी तेज़ी से आगे बढ़ रहा था। लगभग एक-तिहाई चॉकलेट वही बना रहा था और उसका डेरी मिल्क ब्रांड और ज्यादा हिट हो रहा था। कंपनी ने एक स्मार्ट चाल चली, जिसमें उसने अपने कई प्रोडक्ट्स को Dairy Milk ब्रांड के अंदर ला दिया। इसे मास्टरब्रांडिग कहा गया और इसी वजह से कंपनी की ग्रोथ 13 परसेंट बढ़ गई।
दूसरी तरफ नेस्ले थोड़ी मुश्किल में दिख रहा था। BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, नेस्ले की सेल्स लगभग 1.7% गिर गई थीं। नेस्ले के लिए बड़ा हथियार किट कैट था। जिसे वह एक आइकॉनिक प्रोडक्ट मानता था। कंपनी ने इसे बचाने के लिए तरकीब लगाई। नए-नए वर्जन निकाले लेकिन तब मार्केट ग्रोथ रुक सी गई थी। लोग हेल्थ को लेकर ज्यादा जागरूक हो रहे थे। कम चीनी, कम फैट की मांग और प्रीमियम चॉकलेट्स का ट्रेंड भी बढ़ रहा था लेकिन किटकैट आम आदमी के लिए बनाया गया चॉकलेट ब्रैंड था।
इसके अलावा 2004 में किट कैट ने एक बड़ी गलती कर दी। उसने अपना फेमस स्लोगन “Have a break, have a KitKat” बदल दिया। Make the most of your break, The Guardian की रिपोर्ट के मुताबिक, नया स्लोगन लोगों को उतना पसंद नहीं आया क्योंकि पुराना वाला उनके दिमाग और आदतों में बस चुका था। इसका असर सीधा सेल्स पर पड़ा और चॉकलेट की बिक्री गिरने लगी। उसी समय Cadbury जैसे ब्रांड्स भी तेजी से आगे बढ़ रहे थे। कंपनी के कई बड़े अधिकारी मान चुके थे कि किटकैट का टाइम खत्म हो रहा है। इसलिए कोई भी ब्रांड पर ज्यादा पैसे खर्च करने के पक्ष में नहीं था। ऐसे में नेस्ले की मार्केटिंग हेड कॉलेन चोरेक के सामने यह एक बड़ा चैलेंज था कि कैसे ब्रांड को फिर से जिंदा किया जाए। कॉलिन ने ज्यादा रिसर्च नहीं की बल्कि सिंपल तरीके से यह समझने की कोशिश की कि लोग किट कैट कब और कैसे खाते हैं। उन्हें पता चला कि ज्यादातर लोग इसे “ब्रेक” के समय खाते हैं या अक्सर कॉफी के साथ। यहीं से उन्हें बड़ा आइडिया मिला। अगर किट कैट को कॉफी के साथ जोड़ दिया जाए। तो लोगों को बार-बार याद दिलाया जा सकता है। इसके बाद 'A break’s best friend' नाम से कैंपेन शुरू किया गया। जिसमें हर जगह कॉफी और किटकैट को साथ दिखाया गया। जैसे कोई कॉफी ले रहा है और साथ में KitKat मांग रहा है। यह आइडिया लोगों के दिमाग में बैठ गया और सेल्स में 8 परसेंट की बढ़त आई। 12 महीने के अंदर करीब 33 पर्सेंट तक सेल्स बढ़ गई।
जब चॉकलेट को लेकर भिड़े कैडबरी और किट कैट!
एक तरफ नेस्ले की सेल्स बढ़ रही थी। दूसरी तरफ केडबरी एक अलग लड़ाई की तैयारी कर रहा था। साल 2010 में कैडबरी ने अपने डेरी मिल्क चॉकलेट के पर्पल कलर को ट्रेडमार्क कराने की कोशिश की ताकि कोई और कंपनी वही कलर इस्तेमाल न कर सके। नेस्ले ने इसका विरोध किया। यहीं से दोनों कंपनियों के बीच कानूनी लड़ाई की शुरुआत हो गई और राइवेलरी बढ़ गई। कैडबरी तो कलर वाली लीगल जंग हार गया लेकिन फिर नेस्ले ने भी जवाबी चाल चली। नेस्ले ने KitKat के चार-फिंगर वाले शेप को ट्रे़डमार्क कराने की कोशिश की। मकसद यह था कि कोई भी दूसरी कंपनी उसी तरह की दिखने वाली वेफर चॉकलेट न बना सके लेकिन Cadbury ने फिर से इसका विरोध किया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया। मामला यूरोप की अदालत यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस तक पहुंचा। जहां कोर्ट ने यह कहा कि किट कैट का शेप इतना यूनिक नहीं है कि उसे ट्रेडमार्क दिया जाके। इसके बाद UK की हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को मानते हुए नेस्ले की अपील को खारिज कर दिया। यह Nestlé के लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि इससे मार्केट में कॉम्पिटिशन का रास्ता और खुल गया।
भारत में कैसे हिट हुआ किट कैट?
कॉम्पिटिशन के बावजूद किट कैट अपनी अलग पहचान बनाए हुए था। जैसा उसके साथ भारत में हुआ। 1995 में एंट्री की। तब देश में इंटरनेशनल ब्रांड्स धीरे-धीरे ही पॉपुलर हो रहे थे। उस समय Cadbury पहले से ही काफी मजबूत था। उन्होंने KitKat को एक ऐसा स्नैक बनाकर पेश किया जो थोड़ा प्रीमियम लगे लेकिन कीमत में आम लोगों की पहुंच में भी हो। छोटे-छोटे सस्ते पैक लॉन्च किए। 10 रुपए के, 20 रुपए के। सीधे सस्ती प्राइस सेट की। उस समय मार्केट में ज़्यादातर सॉलिड चॉकलेट्स थीं, इसलिए KitKat का क्रिस्पी वेफर वाला टेक्सचर लोगों के लिए बिल्कुल नया और अलग था। यही उसकी सबसे बड़ी खासियत बन गई। इसके साथ ही किट कैट के ऐड्स भी काफी यूनिक थे। जैसे वह गिलहरी वाला एनिमेशन जो उस दौर में भारत में कम देखने को मिलता था। इससे ब्रांड लोगों के दिमाग में जल्दी बैठ गया। किट कैट ने हर उम्र के लोगों को टारगेट किया लेकिन खास तौर पर कॉलेज स्टूडेंट्स और काम करने वाले युवाओं को। जो बीच-बीच में छोटा सा ब्रेक लेकर कुछ मीठा खाना चाहते हैं।
भारत में KitKat को कड़ी टक्कर Cadbury Dairy Milk, 5 Star और Perk जैसे ब्रांड्स से मिलती रही और यहां तक कि नेस्ले का खुद का मंच भी उसका कॉम्पिटिशन बना लेकिन किटकैट लिमिटेड एडिशन लॉन्च करके। हर बजट के लिए अलग-अलग प्राइस रेंज देकर मार्केट में बना रहा और हर जगह आसानी से उपलब्ध होना। जिससे किट कैट की मार्केटिंग भी स्मार्ट तरीके से की गई। यही वजह रही कि किट कैट ने आज भी अपनी आपदा को अवसर में तब्दील किया।
हाल ही में करीब 12 टन KitKat चॉकलेट चोरी हो गई। ये चॉकलेट्स इटली से पोलैंड जा रही थीं लेकिन रास्ते में ही पूरा ट्रक गायब हो गया, जिसमें लगभग 4 लाख से ज्यादा किट कैट थे। अब मज़ेदार बात यह है कि नेस्ले ने इस घटना को छुपाने की बजाय इसे मजाकिया अंदाज़ में पेश किया। कंपनी ने कहा, 'हम तो लोगों से कहते हैं ‘Have a break’ लेकिन चोरों ने तो इसे कुछ ज़्यादा ही सीरियस ले लिया!' फिर यह खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और बाकी ब्रांड्स भी इसमें कूद पड़े। Domino's Pizza UK ने मजाक में कहा कि अब वे KitKat पिज़्ज़ा लॉन्च करने वाले हैं। केरल टूरिज़म के हैंडल ने भी इस मौके का फायदा उठाया और किट कैट पर मीम बनाया। इसी तरह जो पहले एक नुकसान वाली खबर थी, उसे नेस्ले ने स्मार्ट तरीके से एक पीआर बना दिया। क्योंकि कंपनी ने नेगेटिव न्यूज को पॉजिटिव बना दिया। जिससे ब्रांड की पब्लिसिटी भी हो गई और समस्या भी लोगों तक पहुंच गई।
