भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां बहुत तेजी से बिक रही हैं लेकिन जब इन गाड़ियों की बैटरी पुरानी हो जाती है तो उसे अब फेंका नहीं जा रहा। वही पुरानी बैटरी घरों में बिजली देने के काम आ रही है। कहीं गांवों में बिजली का बैकअप बन रही है तो कहीं मोबाइल टावर चला रही है। भारत में इसका मार्केट 2026 में करीब 53 करोड़ डॉलर का हो गया है और 2034 तक यह 200 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। यानी पुरानी बैटरी अब एक बड़े कारोबार में बदल रही है।
भारत में अब कई कंपनियां इस काम में उतर चुकी हैं। ये कंपनियां पुरानी बैटरी को इकट्ठा करती हैं, उसकी जांच करती हैं और फिर तय करती हैं कि उसे दोबारा इस्तेमाल किया जाए या उससे जरूरी सामग्री निकाली जाएं। इस काम में छोटी और बड़ी दोनों तरह की कंपनियां लगी हैं और हर साल इनकी संख्या बढ़ रही है।
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कौन-कौन सी कंपनियां है?
लोहम क्लीनटेक (ग्रेटर नोएडा): यह कंपनी 2018 में शुरू हुई और आज भारत में इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी है। पूरे देश में बैटरी दोबारा काम में लाने का करीब 70 फीसदी काम यही कंपनी करती है। इसकी क्षमता अभी 20,000 टन सालाना है और 2026 के अंत तक इसे 50,000 टन तक ले जाने का लक्ष्य है। कंपनी ने मर्सिडीज बेंज और IIT कानपुर जैसी बड़ी संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया है। अब तक इसने करीब 1,057 करोड़ रुपये जुटाए हैं और इसकी सालाना कमाई 835 करोड़ रुपये है। कंपनी अब यूएई में भी अपना काम फैला रही है।
अटेरो रिसाइक्लिंग (नोएडा): यह कंपनी 2007 में नितिन गुप्ता और रोहन गुप्ता ने शुरू की थी। यह भारत की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन कंपनी है और इसकी खास तकनीक पुरानी बैटरी से 98 फीसदी से ज्यादा लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और ग्रेफाइट वापस निकाल लेती है। टाटा मोटर्स, एमजी और हुंडई समेत करीब 90 फीसदी गाड़ी बनाने वाली कंपनियां इसके साथ काम कर रही हैं। कंपनी ने अगले तीन सालों में 2,000 करोड़ रुपये के निवेश का भी ऐलान किया है और शेयर बाजार में भी आने की तैयारी कर रही है।
बैटएक्स एनर्जीज (गुरुग्राम): यह कंपनी 2020 में उत्कर्ष सिंह और विक्रांत सिंह ने शुरू की। यह बैटरी बनाती भी है और पुरानी बैटरी को दोबारा काम का बनाती भी है। हाल ही में इसे करीब 41 करोड़ रुपये की राशि मिली है। कंपनी का कहना है कि एक EV बैटरी को दोबारा काम में लाना 13,000 मोबाइल फोन की बैटरी को दोबारा काम में लाने के बराबर है। यानी एक बैटरी से कितना बड़ा फायदा हो सकता है।
रिसाइकलकारो (पालघर): इस कंपनी ने 13 साल की मेहनत के बाद अपनी खास तकनीक बनाई है जिससे पुरानी बैटरी से कोबाल्ट, निकेल और मैंगनीज जैसी धातुएं 90 फीसदी से ज़्यादा शुद्धता के साथ निकाली जाती हैं। बजाज ऑटो, एथर एनर्जी, हीरो मोटोकॉर्प और टाटा मोटर्स जैसी बड़ी कंपनियां इसके साथ काम कर रही हैं।
एसीई ग्रीन रिसाइक्लिंग (नोएडा): यह कंपनी बिना किसी प्रदूषण के बैटरी को दोबारा काम में लाती है। इसने गुजरात के मुंद्रा में भारत की सबसे बड़ी लिथियम बैटरी रिसाइक्लिंग सुविधा बनाने का ऐलान किया है जिसकी क्षमता 10,000 टन सालाना होगी। यह जगह बड़े बंदरगाह के पास है जिससे बैटरी लाना और ले जाना आसान होगा।
ग्रेविटा इंडिया (जयपुर): यह कंपनी पुरानी बैटरी को दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाने के साथ-साथ एक डिजिटल मशीन भी चलाती है जिससे बैटरी की पूरी जानकारी रखी जाती है कि वो कहां से आई और कहां गई। यह कंपनी गाड़ियों के अलावा टेलीकॉम, ऊर्जा भंडारण और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भी काम करती है।
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आगे क्या होगा?
जितनी ज्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियां बिकेंगी, उतनी ज्यादा पुरानी बैटरियां आएंगी। अभी भारत हर साल करीब 60,000 टन बैटरी को दोबारा काम में ला सकता है और इससे करीब एक लाख गाड़ियों के लिए जरूरी सामग्री निकाली जा सकती है। जानकारों का मानना है कि आने वाले सालों में यह भारत के सबसे तेज बढ़ने वाले कारोबारों में से एक होगा
