भारत सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है और बड़ी संख्या में युवा हायर एजुकेशन में एडमिशन ले रहे हैं। अब युवा सिर्फ 12वीं करके घर नहीं बैठ रहे बल्कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी में ए़डमिशन लेकर हायर एजुकेशन का विकल्प चुन रहे हैं। भारत में पिछले कुछ दशकों में कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जाने वाले छात्रों की संख्या में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही भारत में कॉलेजों की संख्या भी काफी ज्यादा बढ़ गई है। 1950 में भारत में सिर्फ 1600 कॉलेज और यूनिवर्सिटी थे। यही संख्या 2022 में बढ़कर 69,000 तक पहुंच गई है। 

 

भारत में भले ही कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जाने वाले युवाओं की संख्या में उछाल देखा गया हो लेकिन भारत में एजुकेशन की क्वालिटी अभी भी सवालों के घेरे में है। भारत में कॉलेजों की संख्या तो लगातार बढ़ रही है लेकिन इन कॉलेजों की रैंकिंग में कोई सुधार नहीं आ रहा है। लगभर सभी अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग्स में भारत के संस्थान पीछे छूटते जा रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि इतने संस्थान होने के बावजूद भारत के एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स रैंकिंग में पीछे छूट जा रहे हैं। आइए समझते हैं-

 

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ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो यानी 18-23 साल की उम्र के युवा जो कॉलेज या यूनिवर्सिटी में जाते हैं, लगातार बढ़ रही है। यह अनुपात 2011 के 16 प्रतिशत से बढ़कर साल 2022 में 28 प्रतिशत हो गया है। भारत में अब 45 लाख युवाओं पर एक कॉलेज है। 

कहां पीछे छूट रहे भारत के कॉलेज?

भारत के कॉलेजों के इंटरनेशनल रैंकिंग में पीछे छूटने की एक बड़ी वजह पर्याप्त फैकल्टी का ना होना है। द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, आमतौर पर एक कॉलेज में 15-25 छात्रों पर एक फैकल्टी का होना जरूरी है। भारत में यह अनुपात अब तक का सबसे बेहतर साल 2010 में था। उस समय 24 छात्रों पर एक फैकल्टी था। हालांकि, इसके बाद स्थिति खराब होती गई। 2016 में 36.1 छात्रों पर एक फैकल्टी था और 2021 में 32 छात्रों पर एक फैकल्टी। इसका सीधा असर एजुकेशन की क्वालिटी पर पड़ता है। इंटरनेशनल लेवल पर जारी होने वाली रैंकिंग्स में भारत के एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स इसलिए अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते क्योंकि यहां पर पर्याप्त रूप में फैकल्टी नहीं है। 

कितना पीछे हैं हम?

कोई भी रैंकिंग जारी होती है उसके कुछ पैमाने होते हैं और फैकल्टी स्टूडेंट रेश्यो इसमें एक अहम भूमिका निभाता है। दुनियाभर में मशहूर QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में दुनिया की नंबर-1 यूनिवर्सिटी या एजुकेशन संस्थान मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) है। इस रैंकिंग में भारत में स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी दिल्ली (IITD) भारत में पहले नंबर पर है। हालांकि, पूरी दुनिया में इस संस्थान को 123वां रैंक मिला है। यानी साफ है कि दुनिया की नंबर-1 संस्थान और भारत के नंबर 1 संस्थान में 122 अंकों का अंतर है। यह सिर्फ एक रैंकिंग की बात है। भारत का हाल ज्यादातर रैंकिंग में यही है। 

MIT का प्रदर्शन

 

 

इसके पीछे वजह भी साफ समझ आती है। मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में फैकल्टी स्टूडेंट रेश्यो 100 प्रतिशत है यानी निर्धारित मानकों के अनुसार है।

 

IIT दिल्ली का प्रदर्शन

 

वहीं, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी दिल्ली में फैकल्टी स्टूडेंट रेश्यो 21.9  यानी 22 प्रतिशत से भी कम है। यही हाल अन्य पैमानों पर भी है। भारत के ज्यादातर कॉलेजों में यही हाल है।

 

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फैकल्टी की कमी से जूझ रहे कॉलेज

दिल्ली यूनिवर्सिटी भारत की बेहतरीन यूनिवर्सिटी में से एक है। इस यूनिवर्सिटी की बात करें तो इसमें भी फैकल्टी की कमी है। इसी साल की रिपोर्ट है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के 12 कॉलेजों में 980 फैकल्टी की पोस्ट खाली हैं। कुल 1508 फैकल्टी की पोस्ट में से सिक्फ 528 पर्मानेंट टीचर्स हैं। साल 2025 में संसद की स्थायी समिति ने संसद में एक रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में बताया गया कि इंडिया के हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स में 56 प्रतिशत प्रोफेसर के पद खाली पड़े हैं। यानी भारत के हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स में 44 प्रतिशत से भी कम फैकल्टी मेंबर्स हैं। इसमें आईआईटी, आईआईएम और कई सेंट्रल यूनिवर्सिटी शामिल हैं। भारत के लिए यह चिंताजनक स्थिति है।