कांग्रेस ने 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव में 1980 से भी प्रचंड जीत हासिल की। पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में आई, लेकिन चंद्रशेखर सिंह को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिली। 1985 के बाद कांग्रेस आज तक बिहार में इतनी प्रचंड जीत नहीं हासिल कर सकी। भारी हिंसा के बीच हुए चुनाव में कांग्रेस के सामने उसके विरोधी दल चारों खाने चित्त हो गए।
सभी दलों ने हर हथकंडे अपनाए। गुंडों का सहारा लिया। बूथ लूटे गए, ताकि जीत सुनिश्चित की जा सके। 1985 से पहले चुनाव में हिंसा बहुत कम होती थी। साफ छवि और सामान्य सा व्यक्ति भी नेतागीरी कर सकता था, लेकिन इस चुनाव ने यह बताया कि बाहुबल के बिना विधायकी नहीं मिल सकती।
चुनाव आयोग ने बिहार में दो चरणों में चुनाव कराने की घोषणा की। पहले चरण का मतदान 2 मार्च और दूसरे चरण का 5 मार्च को होना था। चुनाव से चार महीने पहले 31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों ने निर्मम हत्या कर दी। राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने बिहार समेत कुल 10 राज्यों में हो रहे चुनाव की बिसात बिछानी शुरू की।
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इंदिरा गांधी के हत्या के बाद उठी सहानुभूति की लहर और राजीव गांधी की भावुक अपील ने जनता का मूड बदल दिया। विपक्ष में कर्पूरी ठाकुर की अगुवाई में लोकदल ने खूब हवा का रुख बदलने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। बिहार में अपने दूसरे चुनाव में उतरी बीजेपी भी कुछ खास करिश्मा नहीं दिखा सकी।
हिंसा के बीच हुए चुनाव
बिहार में साल 1977 में हिंसा की कुल 260 घटनाएं रिकॉर्ड की गईं। 1984 में यह आंकड़ा बढ़कर 617 हो गया। 1985 के विधानसभा चुनाव में करीब 100 लोगों की हत्या हुई और हिंसा की करीब 1370 घटनाओं ने पूरे प्रदेश को हिला दिया। चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले राजनीतिक रंजिश में 11 लोगों की जान गई। मतदान वाले दिन हिंसा में 49 लोगों की मौत हुई। कई जगह बूथ लूटे गए।
चुनाव से पहले प्रत्याशियों की हत्या
मतदान से एक दिन पहले नालंदा के निर्दलीय प्रत्याशी महेंद्र प्रसाद को उनके ही घर में मार दिया गया। मसौढ़ी से कांग्रेस प्रत्याशी जनेश्वर प्रसाद सिंह की हत्या चुनाव कार्यालय में ही कर दी गई। विष्णु महतो ने हटिया विधानसभा सीट से निर्दलीय पर्चा भरा, लेकिन चुनाव से पहले ही उनको भी मार दिया गया। उस वक्त बिहार से अलग होकर झारखंड अलग राज्य नहीं बना था। बोकारो सीट से निर्दलीय बनवारी राम चुनाव लड़ रहे थे। उनकी रहस्यमयी मौत का राज आज भी दफन है।
चुनाव अधिकारियों ने की थी बूथ कैप्चरिंग
बिहार के बेनीपट्टी, मधेपुरा, मुंगेर, खड़गपुर और बख्तियारपुर में बूथ कैप्चरिंग हुई। कई निर्वाचन अधिकारियों ने वोटिंग में न केवल धांधली की, बल्कि चुनाव से एक दिन पहले ही बैलेट पेपर पर मोहर लगाकर बॉक्स में डाल दिया। कुछ अधिकारियों की गिरफ्तारी भी हुई। हिंसक झड़प और मतपेटियों को लूटने की घटना के बाद कई मतदान केंद्रों पर वोटिंग स्थगित करनी पड़ी।
अर्धसैनिक बलों की 200 कंपनियां भी नहीं रोक पाई हिंसा
चुनाव आयोग को भी पता था कि चुनाव में भारी हिंसा होगी। मतदान वाले दिन पूरे बिहार में पैरा मिलिट्री फोर्स की कुल 200 कंपनियां लगाई गईं। बूथ पर बवाल करने वाले लोगों को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया। 77 लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत पकड़ा गया। 390 पर बिहार क्राइम कंट्रोल एक्ट लगाया गया। मतदान वाले दिन एक हजार बवाली लोगों को हिरासत में लिया गया। बावजूद इसके चुनाव में हिंसा नहीं रुकी।
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कांग्रेस की आंधी में धराशायी हुआ विपक्ष
चुनाव नतीजे आने पर कांग्रेस 196 सीटों पर जीत हासिल करके सबसे बड़ी पार्टी बनी। उसे 39.3 फीसद वोट मिले। उसके 97 प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे। यह 1952 और 57 के चुनाव के बाद कांग्रेस की सबसे प्रचंड जीत थी। 46 विधायकों के साथ कर्पूरी ठाकुर की अगुवाई वाली लोकदल दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। 29 सीटों पर निर्दलीयों ने जीत हासिल की। बाकी सभी दल 20 का आंकड़ा तक पार नहीं कर सके।
पांच साल में कांग्रेस ने बदले 4 सीएम
विधानसभा चुनाव के वक्त चंद्रशेखर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री थे। उनकी अगुवाई में कांग्रेस को प्रचंड जीत मिली, लेकिन राजीव गांधी ने उनकी जगह बिन्देश्वरी दुबे को राज्य की कमान सौंप दी। 12 मार्च 1985 को बिन्देश्वरी दुबे ने सीएम पद की शपथ ली। राजीव गांधी ने चंद्रशेखर को केंद्र में मंत्री बनाकर उनकी नाराजगी दूर की। बिन्देश्वरी दुबे 2 साल 338 दिन सीएम रहे। 14 फरवरी 1988 को राजीव गांधी ने उनकी जगह भागवत झा आजाद को नया मुख्यमंत्री बनाया। उधर, बिंदेश्वरी दुबे को केंद्रीय कैबिनेट में एडजस्ट किया गया। एक साल 24 दिन बाद भागवत झा आजाद को भी सीएम पद छोड़ना पड़ा।
10 मार्च 1989 को आजाद ने इस्तीफा दिया तो अगले दिन 11 मार्च को सत्येन्द्र नारायण सिन्हा ने शपथ ली। वह भी महज 270 दिन तक सीएम रहे। सत्येंद्र नारायण सिन्हा के इस्तीफे के बाद जगन्नाथ मिश्र पर राजीव गांधी ने भरोसा जताया। मिश्रा ने तीसरी बार बिहार के सीएम पद की शपथ 6 दिसंबर 1989 को ली और 10 मार्च 1990 तक सिर्फ 94 दिनों तक पद संभाला।
जनता दल का उदय और कांग्रेस का बिहार में सूर्यास्त
1985 के चुनाव में प्रचंड जीत के बाद कांग्रेस ने पांच साल में कुल 4 सीएम बदले। इसका जनता पर गलत संदेश गया। बार-बार सीएम बदलने के कारण बिहार में अराजकता और हिंसा का माहौल बना। नक्सली आंदोलन के उदय के साथ जातीय हिंसा भी बढ़ने लगी। जनता दल ने सामाजिक न्याय और आरक्षण की वकालत की। पिछड़ी और अनुसूचित जातियों को लामबंद किया। नतीजा यह हुआ कि 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल के उदय के बाद बिहार में कांग्रेस दोबारा अपने दम पर आज तक नहीं खड़ी हो सकी।
बदल गया जाति का समीकरण
बिहार विधानसभा के शुरुआती चुनाव में उच्च जातियों का दबदबा रहा है, लेकिन 1985 के चुनाव ने यह तस्वीर काफी हद तक बदल दी। पिछड़ी जातियों के 88 और ऊंची जातियों के 118 नेता विधानसभा पहुंचे। 47 यादव, 30-30 आदिवासी और ब्राह्मण, 38 भूमिहार, 4 कायस्थ, 46 राजपूत, 33 मुस्लिम, 48 अनुसूचित जाति, 18 कोईरी, 2 मल्लाह, 9 बनिया और 12 कुर्मी समुदाय से आने वाले नेता विधायक बने। नाई जाति से आने वाले कर्पूरी ठाकुर अपने समुदाय के इकलौते विधायक थे।
| दल | जीती हुईं सीटें |
| कांग्रेस | 196 |
| लोकदल | 46 |
| निर्दलीय | 29 |
| बीजेपी | 16 |
| जनता पार्टी | 13 |
| सीपीआई | 12 |
| जेएमएम | 09 |
| सीपीआई (मार्क्सवादी) | 01 |
| इंडियन कांग्रेस (सोशलिस्ट) | 01 |
| सुराज्य पार्टी | 01 |
