कोलकाता में मॉनसून की दस्तक हो चुकी थी, कैलेंडर पर तारीख़ 21 अगस्त की थी और साल 1946 था। शहर के बालीगंज सीवेज पंप स्टेशन पर एक कर्मचारी थककर चूर हो चुका है। सूरज सिर पर चढ़ चुका है लेकिन लेकिन सुबह से वह कर्मचारी यह समझ नहीं पा रहा कि सीवेज जाम क्यों है? वह अपने डिपार्टमेंट के चीफ इंजीनियर तक मैसेज पहुंचवाता है कि साहब पता नहीं कैसे सीवेज चोक कर गया है। इंजीनियर तुरंत पंप स्टेशन आ धमका। नाले का ढक्कन हटवाने लगा। एक पाइप नाले के भीतर डालता है। उसे लगा कि कचरा होगा तो पाइप से पता चल जाएगा लेकिन पाइप जैसे ही थोड़ा भीतर घुसा सब हक्के-बक्के रह गए। ऐसा लगा कि पाइप किसी ठोस चीज़ से जा टकराया है। इंजीनियर ने एक और ढक्कन हटवाया। झुककर देखने लगा। सीवेज देखते ही लड़खड़ा गया। नाले में चार लाशें आ फंसी थीं। अब क्या हो?
अंग्रेज इंजीनियर ने अपने असिस्टेंट से कहा कि कुछ मज़दूर लाओ और जल्दी इन लाशों को निकालो। असिस्टेंट 2-3 मज़दूरों के साथ इस काम पर लग गया। पहली लाश निकली। फिर दूसरी, तीसरी और चौथी भी निकल गई लेकिन जैसे-जैसे जगह ख़ाली होती गई लाशें पानी में पॉलिथीन की तरह बहकर आने लगीं। 21 अगस्त को शुरू हुआ काम 24 अगस्त की शाम तक चलता रहा। अंत में जब सारी लाशें सीवेज से बाहर निकाल दी गईं तो पंप स्टेशन के पास 10-20 नहीं बल्कि 110 लाशों का एक ढेर लगा हुआ था। नाले के 200 फीट भीतर तक से ये लाशें खींचीं गई थीं। वहां मौजूद हर शख्स के चेहरे पर घिनौना भाव था। न जाने कितने दिनों से ये लाशें नाले में सड़ रही थीं। लग रहा था कि बदबू के चलते नाक में विस्फोट हो जाएगा लेकिन हैरत यह थी कि किसी के ज़ेहन में इस सवाल से पैदा बेचैनी नहीं थी कि इन लोगों की लाशें आई कहां से? इन्हें किसने मार डाला? नाले में किसने फेंका? इन सवालों का जवाब सोचने के बजाय ये लोग इन लाशों को कूड़े के ढेर की तरफ फेंकने के इंतज़ाम में लग गए क्योंकि ऐसे हज़ारों दृश्य का गवाह कोलकाता उस दौरान बन रहा था।
यहां तो 110 ही लोगों की देह पड़ी थी। शहर तो पूरा हज़ारों ज़िंदगियों का कत्लग़ाह बन चुका था क्योंकि सनक भरे दो लोगों के दिमाग़ पर यह भूत सवार था हिंदुस्तान नाम के चादर से अपने धागे और अपना रंग अलग करेंगे। एक नई चादर बनाएंगे। भले ही इसके लिए मिट्टी को खून से लाल क्यों ना करना पड़े। कौन थे ये दो लोग?
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एक वह जिसके पिता समृद्ध मुस्लिम व्यापारी थे। पैसा-रुपया था। ठाट-बाट थी। बाप ने बेटे को लंदन के मशहूर लिंकन इन से बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए भेजा दिया। पढ़कर लौटा तो देखा कि देश में आज़ादी के कुछ दीवाने सिर पर कफ़न बांधे और कुछ धोती लपेटे लड़ाई लड़ रहे हैं। वह धोती वालों के ग्रुप में शामिल हो गया लेकिन समय बीता तो सिर पर धर्म का नशा चढ़ गया। मुट्ठी भींचने लगा कि मैं ही मुसलमानों का रहनुमा। असल में पीता था शराब और सिगार। क़ुरान पढ़ा नहीं था। कपड़े-लत्ते वेस्टर्न। लंदन का असर जो था लेकिन नुमाइंदगी मुसलमानों की। उसी आदमी को धर्म के आधार पर अलग देश का ऐसा खुमार चढ़ा कि हर क़ीमत पर हिंदुस्तान का बंटवारा चाहने लगा। क़ीमत अदा हुई भी, लाखों जानें गईं, लाखों बेघर हुए। इन बैरिस्टर साहब का नाम था जिन्ना। मोहम्मद अली जिन्ना।
इन्हीं जिन्ना के ट्रैक पर दौड़ा एक और शख्स। यह भी रईस था, ख़ानदानी, पिता अंग्रेज़ों के जमाने के जज थे तो बेटा पढ़ा सेंट जेवियर्स में। फिर गया इंग्लैंड। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से वक़ालत की डिग्री लिए भारत लौटा। जिन्ना की ही तरह पहले हिंदुस्तानी की आज़ादी की वकालत कर रहा था लेकिन जल्दी टू नेशन थ्योरी का शिष्य बन गया। लड़ाई लड़ने लगा भारत को तोड़ने की। तोड़कर एक नया देश बनाने की- पाकिस्तान। इनका नाम था हुसैन शहीद सुहरावर्दी। जो ग़ुलाम भारत में बंगाल का प्रधानमंत्री था। साल भर के लिए पाकिस्तान का भी प्रधानमंत्री रहा।
कोलकाता को कब्रिस्तान बना देने से पहले अगर जिन्ना ने कहा, “We have a pistol and are in a position to use it।” तो सुहरावर्दी ने पिस्तौल इस्तेमाल करने के लिए 24 घंटे की खुली छूट दी। पब्लिक हॉलीडे घोषित कर दिया ताकि पुलिस वाले भी छुट्टी पर रहें और जिन्ना के उकसाए हुए लोग शहर में खून की बारिश करा दें। दंगों और हिंसा की हद का पैरामीटर लाशों की संख्या ही होती है क्या? अगर होती है तो फिर यह कहानी शायद हिंदुस्तान की तवारीख़ के सबसे बड़े दंगे की है। हत्याओं के तांडव की कहानी। जो खेली गई 1911 से पहले तक रहे देश की राजधानी और अब पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में। जो शुरू 16 अगस्त, 1946 को कोलकाता में और चली आज़ादी के दिन तक नोआखली में।
जीत, जिन्ना और खुराफाती प्रधानमंत्री
भारत में आज़ादी की मांग ज़ोर पकड़ चुकी थी। 1935 का साल आ चुका था। महात्मा गांधी और कांग्रेस मुख्य तौर पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। दूसरे धड़े भी थे। जो इस यज्ञ में आहुति दे रहे थे। दूसरी ओर थी बरतानिया हुकूमत। जो इस हवन कुंड में पानी के छींटे मार रही थी। ऐसी ही एक छींट गिरी 1935 के साल में। ब्रिटिश शासन ने भारत में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट लागू कर दिया। कई चीज़ें तय की गईं। सबसे बड़ी बात यह हुई कि देश भर में चुनाव कराए गए। राज्यों में सरकारें बनीं। कहानी में ट्विस्ट आया चार साल बाद। साल 1939, सेकेंड वर्ल्ड वॉर शुरू हो गया। भारतीयों की सहमति के बग़ैर इंग्लैंड ने भारत को भी जंग के चूल्हे में झोंक दिया। विरोध शुरू हुआ। विरोध में पहला काम यह हुआ कि सभी प्रांतों के प्रधानमंत्रियों ने इस्तीफ़ा दे दिया। तब भारत में प्रांत होते थे, जिनके मुखिया को प्रीमियर या प्रधानमंत्री का दर्ज़ा हासिल था। दूसरा विश्व युद्ध खत्म होता है 1945 में। एक साल बाद 1946 में भारत में फिर चुनाव की तैयारी होने लगी। गहमागहमी बढ़ गई लेकिन एक प्रांत था जहां इस चुनावी तैयारी में शोले भड़क रहे थे। पश्चिम बंगाल। तीन बड़ी पार्टियां थीं मैदान में- कांग्रेस, हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग।
कांग्रेस पार्टी अपने मेनिफेस्टो में कह रही थी, 'कांग्रेस भारत के हर नागरिक, चाहे वह पुरुष हो या महिला, के लिए समान अधिकारों और अवसरों के लिए खड़ी रही है। यह सभी समुदायों और धार्मिक समूहों की एकता और उनके बीच सहिष्णुता और सद्भावना के लिए खड़ी रही है।' वह आगे भी देश की आज़ादी और समानता की वक़ालत कर रही थी। हिंदू महासभा का कहना था, 'जो लोग देश और राष्ट्र को बेवजह और गलत तरीके से बांटना चाहते हैं, उन्हें न्याय की नज़र में एंटी-नेशनल माना जाएगा और उनके साथ भी वैसा ही बर्ताव होना चाहिए।'
मुस्लिम लीग का घोषणा पत्र कैसा था? किसी वॉर क्राई की तरह। लीग ने अपने मेनिफेस्टो में लिखा, 'कायदे-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की ओर से यह एलान करते हैं कि भारत की सेंट्रल और प्रोविंशियल लेजिस्लेचर के आने वाले चुनाव को भारत के मुसलमानों का पाकिस्तान पर जनमत संग्रह माना जाएगा। इसलिए, हम जंग के बीच में हैं क्योंकि आम चुनाव भारत के मुस्लिम दुश्मनों के साथ पाकिस्तान के लिए पहली बड़ी लड़ाई होने जा रही है। आम चुनाव हमारी लड़ाई की शुरुआत है। इसलिए, बिना किसी नफ़रत के, बिना किसी बदले की भावना के, अपनी आखिरी जीत पर पूरे भरोसे के साथ, दिल से चलो जंग में उतरते हैं।'
जिन्ना और उनकी पार्टी ने इस चुनाव को जंग बताया। तो ग़र चुनाव जंग था, तो इसमें जीत मिली मुस्लिम लीग को ही। बंगाल में, मुस्लिम लीग के लिए नतीजे अप्रत्याशित थे। मुसलमानों के लिए रिज़र्व 123 में से 115 सीटों पर लीग की जीत हुई। तब इस प्रांत में कुल सीटें थीं 250। 25 यूरोपियन सदस्यों और शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के सदस्य जोगेंद्रनाथ मंडल के समर्थन से लीग ने सरकार बना ली। सरकार के मुखिया या प्रांत के प्रधानमंत्री बने हुसैन शहीद सुहरावर्दी।
जैसा कि लीग ने अपने घोषणा पत्र में लिखा था कि यह चुनाव पाकिस्तान के लिए लड़ाई की शुरुआत है तो शुरुआती लड़ाई में मिली जीत के बाद पार्टी के नेता बंगाल में ज़हर-बुझे बयान देने लगे थे। कोई कह रहा था कि हमें अहिंसा में कोई यकीन नहीं तो कोई कह रहा था कि एक बार मौका मिले तो ऐसी तबाही मचाएंगे कि हलाकू भी शर्मा जाएगा। हलाकू खान चंगेज़ खान का पोता था। क्रूर और नरभक्षी किस्म का मंगोल शासक। जिसने 1258 ई. में बगदाद में तबाही का वह मंज़र क़ायम किया था जिसकी कहानी सुनकर ही रूह कांप जाए। इतिहासकार अनुमान लगाते हैं कि हलाकू के हमले में बगदाद में 2 लाख से 10 लाख लोगों का कत्लेआम हुआ। उस हलाकू को अपनी करतूत से शर्मसार कर देने की मंशा लिए मुस्लिम लीग के नेता बंगाल में घूमने लगे थे।
एक प्रस्ताव और एक आह्वान
1935 से 1955 तक इंग्लैंड के प्रधानमंत्री थे क्लीमेंट एटली। 15 मार्च, 1946 को एटली ने इंग्लैंड की संसद में एक भाषण दिया। बताया कि लेबर पार्टी की सरकार एक आयोग को भारत भेजेगी। जो सभी स्टेकहोल्डर्स से पावर ट्रांसफर की बात तय करेगी। यानी आज़ादी। कब, कैसे, किस स्वरूप में ये फिगर आउट करने का काम। एटली ने तीन लोगों को भारत भेजा- पेथिक लॉरेंस (Pethick Lawrence), ए.वी. अलेक्जेंडर (A.V. Alexander) और स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स (Stafford Cripps)। ये तीनों अपने देश में कैबिनेट मंत्री थे। 22 मार्च, 1946 को तीनों ही भारत पहुंचे। एक कैबिनेट मिशन प्लान के साथ। क्या था इस प्लान में? 3 मुख्य बातें।
एक यूनियन ऑफ़ इंडिया होगा जिसमें ब्रिटिश इंडिया और रियासतें दोनों शामिल होंगी। जो विदेश मामलों, रक्षा और संचार से जुड़े मामलों को देखेगा और ज़रूरी पैसे जुटाने की ताक़त रखेगा। बाकी सभी विषय और बची हुई शक्तियां प्रांतों या रियासतों के पास होंगी।
सभी प्रांतों को दो हिस्सों में बांटा जाएगा: एक में हिंदू-बहुल प्रांत और दूसरे में मुस्लिम-बहुल प्रांत।
तीसरा प्वाइंट वह आधिकारिक सांप्रदायिक बीज था। जो हिंदुस्तान की ज़मीन में बोया गया। तो आज तक नासूर बना हुआ है लेकिन इस बीज से किसी को क़ायदे का फसल उगते नहीं दिख रहा था। एक तरफ गांधी ने क्रिप्स को चिट्ठी लिखी कि यह योजना पाकिस्तान वाली योजना से भी ज्यादा ख़तरनाक है। दूसरी ओर जिन्ना इस बात से दुखी हुए पड़े थे कि पूरे प्रस्ताव में कहीं पाकिस्तान शब्द को मेंशन नहीं किया गया। सिर्फ हिंदू और मुस्लिम वाली भाषा में ही बात हुई। एक और बड़ी मुसीबत यह थी कि प्रस्ताव या तो पूरी तरीके से स्वीकार होता या खारिज। यानी ऐसा विकल्प नहीं था कि प्रस्ताव की दो बातें मान ली जाएं और एक बात ना मानी जाए।
गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद क्रिप्स को चिट्ठियां लिख रहे थे लेकिन जिन्ना के दिमाग़ में कुछ और ही ख़्याल घुमड़ने लगे थे। उसने 27 जुलाई, 1946 को बॉम्बे में मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई। वीपी मेनन अपनी किताब 'The Transfer of Power in India' में लिखते हैं, 'जिन्ना ने कैबिनेट मिशन पर गलत नीयत और कांग्रेस के हाथों में खेलने का आरोप लगाया। उन्होंने कांग्रेस की उसके छोटी-मोटी बातों और मोल-भाव करने वाले रवैये की बुराई की। उन्होंने कहा कि लीग रियायत की हद तक चली गई थी लेकिन कांग्रेस ने उसके किए गए त्याग की कोई कद्र नहीं की। इसलिए लीग के पास एक बार फिर पाकिस्तान के राष्ट्रीय लक्ष्य पर टिके रहने के अलावा कोई चारा नहीं था।' इस बयान के साथ बैठक में एक रिजोल्यूशन पेश हुआ। वर्किंग कमिटी को ‘डायरेक्ट ऐक्शन’ का प्लान बनाने का अधिकार दिया गया।
‘डायरेक्ट एक्शन’ वाली बात को याद रखिएगा। साथ ही लीग के सदस्यों से कहा गया कि ब्रिटिश सरकार से मिले सभी टाइटल छोड़ दें। यह रिजोल्यूशन बिना किसी विरोध के पास हो गया। तब जिन्ना ने कहा, 'आज हमने जो किया है, वह हमारे इतिहास का सबसे ऐतिहासिक काम है। लीग के पूरे इतिहास में हमने कभी भी संवैधानिक तरीकों और संवैधानिकता के अलावा कुछ नहीं किया लेकिन अब हम इस स्थिति में मजबूर हैं। आज हम संवैधानिक तरीकों को अलविदा कहते हैं।'
लीग की वर्किंग कमिटी ने 16 अगस्त, 1946 की तारीख़ को डायरेक्ट एक्शन डे के तौर पर मनाना तय किया। जगह तय हुआ कोलकाता क्योंकि बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी। कोलकाता में मेयर मुस्लिम लीग का था- मोहम्मद उस्मान। जो एलानिया कह रहा था, 'काफ़िरों, तुम्हारा अंत दूर नहीं है। तुम्हारा कत्लेआम होगा।' आबादी का रसायन भी उन्हें सूट कर रहा था। एलान हो गया। यह किसी हिटलर के फाइनल सोल्यूशन जैसा साउंड वाला टर्म था। डायरेक्ट एक्शन तो फिर क्या हुआ 16 अगस्त को?
जिन्ना की प्लानिंग, सुहरावर्दी का एग्जिक्यूशन
16 अगस्त की तारीख़ के लिए प्रॉपर प्लानिंग हुई। प्लानिंग दो स्तर पर हो रही थी। एक घोषित और दिखाते हुए। दूसरा बिन बताए घरों और अलग-अलग ठिकानों पर बारी-बारी दोनों जान लेते हैं। दिनेश चंद्र सिन्हा और अशोक दासगुप्ता की किताब है 'The Great Calcutta Killings and Noakhali Genocide'। किताब में ज़िक्र मिलता है कि 13 अगस्त को Star of India में डायरेक्ट एक्शन डे का पूरा प्लान छापा गया। Star of India अंग्रेज़ी का नामी अख़बार था। कोलकाता से निकलता था। अख़बार में क्या प्लान छपा था? बताया गया कि ऑल इंडिया मुस्लिम लीग द्वारा घोषित ऑल इंडिया डायरेक्ट एक्शन डे, कलकत्ता डिस्ट्रिक्ट मुस्लिम लीग के निर्देशन में कलकत्ता, हावड़ा, हुगली, मेटियाबुर्ज, 24 परगना मिल एरिया में सीधे मनाया जाएगा। पानी के प्लांट, हॉस्पिटल, डॉक्टरों के क्लीनिक, मैटरनिटी सेंटर, लाइट, बिजली, गैस और पोस्टल सर्विस जैसी ज़रूरी सर्विस को छोड़कर, सिविक, कमर्शियल और इंडस्ट्रियल- सभी हिस्सों में पूरी तरह हड़ताल।
कलकत्ता, हावड़ा, हुगली, मेटियाबुर्ज और 24-परगना के सभी मोहल्लों से म्यूज़िक बैंड और तबालजंग के साथ जुलूस, काफिला और अखाड़े निकलेंगे। ये सभी शाम 3 से शाम 6:30 बजे के बीच ऑक्टरलोनी मॉन्यूमेंट (अभी का ‘शहीद मीनार’) के नीचे तक पहुंचेंगे। जहां एक बड़ी सभा होगी। अध्यक्ष बंगाल के प्रधानमंत्री और बंगाल मुस्लिम लीग के नेता एच। एस। सुहरावर्दी करेंगे। यह भी लिखा गया, 'मुसलमानों को याद रखना चाहिए कि रमज़ान में ही कुरान नाज़िल हुआ था। रमज़ान में ही बद्र की लड़ाई, इस्लाम और बुतपरस्ती के बीच पहली खुली लड़ाई लड़ी गई थी। रमज़ान में ही पवित्र पैगंबर के नेतृत्व में 10,000 मुसलमानों ने मक्का पर जीत हासिल की और अरब में जन्नत का राज और इस्लाम का कॉमनवेल्थ बनाया। मुस्लिम लीग खुशकिस्मत है कि वह इस पाक महीने में अपना काम शुरू कर रही है।'
यह घोषित प्लान था। जो पूरी दुनिया देख-पढ़ रही थी लेकिन बड़ी प्लानिंग भीतरखाने चल रही थी। The Great Calcutta Killings and Noakhali Genocide में ही दर्ज है कि बंगाल के मुसलमानों के बीच सीक्रेट सर्कुलर जारी किए जा रहे थे। कहा जा रहा था, 'भारत के सभी मुसलमानों को पाकिस्तान के लिए मर जाना चाहिए। पाकिस्तान बनने के साथ ही पूरे भारत पर कब्ज़ा कर लेना चाहिए। भारत के सभी लोगों को इस्लाम में कन्वर्ट कर देना चाहिए। सभी मुस्लिम राज्यों को पूरी दुनिया के एंग्लो-अमेरिकन शोषण में शामिल हो जाना चाहिए। एक मुसलमान को पांच हिंदुओं का हक मिलना चाहिए, यानी हर मुसलमान पांच हिंदुओं के बराबर है। हिंदुओं की सभी फैक्ट्रियों और दुकानों को जला देना चाहिए, तबाह कर देना चाहिए, लूट लेना चाहिए और लूट का पैसा लीग ऑफिस को दे देना चाहिए। सभी मुस्लिम लीग वालों को ऑर्डर की अवहेलना करते हुए हथियार रखने चाहिए। सभी राष्ट्रवादी मुसलमानों को, अगर वे लीग में शामिल नहीं होते हैं, तो सीक्रेट गेस्टापो से मार देना चाहिए। हिंदुओं को धीरे-धीरे मार देना चाहिए और उनकी आबादी कम कर देनी चाहिए। सभी मंदिरों को तोड़ देना चाहिए।'
ऐसी नफ़रती और ज़हरबुझी प्लानिंग हुई। हड़ताल के नाम पर। सर्कुलर पहुंच चुका था। लीग के वर्कर और समर्थक अपने काम पर लग चुके थे। सवाल मन में आ सकता है कि जब यह सब हो रहा था पुलिस क्या कर रही थी? क्या पुलिस इसकी भनक नहीं थी कि 16 अगस्त को कलकत्ते में क्या होने वाला है? ख़बर थी- पुख़्ता। बेलियाघाटा से लेकर चितपोर तक के पुलिस स्टेशनों से आला अधिकारियों को इत्तला किया गया था। बताया गया था कि डायरेक्ट ऐक्शन डे के दिन हड़ताल के नाम पर हथियारबंद लोग शहर में कोहराम मचाने की तैयारी कर रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल सर फ्रांसिस टकर खुद अपने संस्मरण While Memory Serves में बताते हैं कि कलकत्ता इंटेलिजेंस सेंटर में रिपोर्ट्स की बाढ़ सी आ गई थी। दोनों समुदायों के नेता आक्रामक बयान दे रहे थे। टेंशन बढ़ रहा था। तो पुलिस महकमा क्या कर रहा था? इस सवाल के जवाब की तलाश में चलिए 15 अगस्त, 1946 की तारीख़ पर। बंगाल विधानसभा में। बंगाल सरकार ने एक बड़ी घोषणा कर डाली। यानी मुस्लिम लीग की सरकार ने। ऐलान यह कि 16 अगस्त यानी डायरेक्ट एक्शन डे के दिन पब्लिक हॉलीडे होगा। पब्लिक हॉलीडे। पुलिस की छुट्टी। यानी जिस दिन शहर में हड़ताल के नाम पर आग लगने वाली हो, उस दिन पुलिस छुट्टी मना रही होगी। अपने घर में होगी। हिंदु नेताओं ने विधानसभा में इसका विरोध किया लेकिन सरकार ने एलान कर दिया तो कर दिया। यही वह एग्जिक्यूशन का पार्ट था जो सोहरावर्दी ने निभाया था। पुलिस को घर भेज दो। 24 घंटे के लिए। अब याद कीजिए सोहरावर्दी का वह बयान, जो शुरू में ही बताया कि काम खत्म करने के लिए 24 घंटे हैं।
दाग़-दाग़ उजाला
कैलेंडर के पन्ने उलट गए। तारीख़ 16 अगस्त, 1946, डायरेक्ट एक्शन डे। पौ फटने से पहले चाकू चलने लगे। सुबह साढ़े 6 से साढ़े 7 बजे के बीच हथियारबंद लोग मानिकतला इलाके में इकट्ठा हो गए। दंगा भड़क उठा। सुबह साढ़े 7 बजे लाल बाज़ार टेलीफ़ोन ऑफ़िस के सार्जेंट ई। विलियम्स ने बताया कि वह सेंट्रल एवेन्यू पर एक पुलिस ट्रक में महिला ऑपरेटरों को ले जा रहे थे और उसी लॉरी को मुस्लिम युवकों ने रोक दिया। उसी वक्त C.R. एवेन्यू और बीडन स्ट्रीट क्रॉसिंग पर सांप्रदायिक झड़पें हुईं। बोबाज़ार स्ट्रीट और लोअर सर्कुलर रोड (सियालदह जंक्शन) पर लाठियों और लोहे की रॉड लिए मुसलमानों की बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई थी। सुबह साढ़े 8 बजे टेरेटी बाज़ार में कत्लेआम शुरू हो चुका था। उसी समय लोअर चितपुर रोड में सिटी सिनेमा के सामने सांप्रदायिक झड़प शुरू हो गई। ऐसी झड़पों की झड़ी लग गई। पूरे शहर में मार-काट मचा हुआ था। उत्तर और पूर्वी कलकत्ता में घरों में आग लगा दिए गए। मुस्लिम नेताओं ने हिंदू दुकानदारों को दुकानें बंद करने के लिए मजबूर किया। जो नहीं माने उन्हें मारना शुरू कर दिया। हिंदुओं का जत्था भी जमने लगा। जो मुसलमानों के जुलूस को हिंदू इलाकों से ले जाने से रोकने लगे। हिंदुओं ने ताला और बेलगछिया पुलों पर बैरिकेड लगा दिए ताकि मुस्लिम शहर में न घुस सकें।
यह सिर्फ दिन की शुरुआत थी। असली तांडव 3 बजे वाली सभा के बाद होने वाला था। वही सभा जहां सुहरावर्दी भाषण देने वाला था। जगह तय था- ऑक्टरलोनी स्मारक। अब इसे शहीद मिनार कहते हैं। यह कोलकाता का ऐतिहासिक स्तंभ है। 1828 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कमांडर मेजर-जनरल सर डेविड ऑक्टरलोनी की याद में बनाया गया था। यहां सुहरावर्दी ने डायरेक्ट एक्शन डे पर भाषण किया। सूरज आसमान में चढ़ता गया। काफिला और जुलूस रास्ते भर लूट-पाट और मारकाट मचाते ऑक्टरलोनी मॉन्यूमेंट के पास पहुंचने लगे। सुहरावर्दी समय से पहुंचा। भाषण दिया और कहा, 'डायरेक्ट एक्शन डे मुस्लिमों की आज़ादी की लड़ाई की तरफ पहला कदम साबित होगा।' सुहरावर्दी ने लोगों को जल्दी घर लौटने की सलाह दी और कहा कि शहर से गुज़रते समय उन्होंने मुसलमानों को शांत ही पाया लेकिन सबसे बड़ा बयान था, 'मैंने पुलिस और मिलिट्री के साथ मिलकर उनके काम में दखल न देने के सारे इंतज़ाम कर लिए हैं।' यहीं उसने कहा था कि 24 घंटे का समय है, करो जो करना हो। सुहरावर्दी साफ़ कह रहा था कि पुलिस और मिलिट्री लीग के समर्थकों की राह में ना आए इसकी सेटिंग हो चुकी है। फ्रांसिस टकर अपनी किताब में लिखते हैं, 'हमारी इंटेलिजेंस पेट्रोलिंग टीम ने देखा कि भीड़ में बड़ी संख्या में मुस्लिम गुंडे थे। वे समय-समय पर मीटिंग से निकल जाते थे और मीटिंग खत्म होते ही उनकी गिनती बढ़ जाती थी। वे शहर के शॉपिंग सेंटर की ओर बढ़े, जहां उन्होंने तुरंत हिंदू दुकानों और घरों को लूटना और जलाना शुरू कर दिया।'
16 अगस्त के पूरे दिन और रात लोग अपनी जान बचाने के लिए जहां-तहां छिपते-भागते रहे और उनके पीछे दौड़ रही थी हथियारबंद भीड़। 17 अगस्त को हिंदू संगठनों ने अपने लोगों को इकट्ठा करना शुरू किया। कुछ रसूखदार भी थे जो हिंदुओं को बचाने के लिए आगे आए। इन्हीं में एक नाम था गोपाल चंद्र मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा का। वह बकरे के मीट की दुकान चलाते थे। कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट पर दुकान थी। नाम के आगे पाठा इसलिए लगा क्योंकि बंगाली में बकरे को पाठा या पट्ठा कहते हैं। गोपाल सिर्फ एक दुकानदार नहीं थे। मसलमैन थे। भारत जातीय वाहिनी नाम का संगठन चलाते थे। 16 अगस्त को कोलकाता में जब कत्लेआम शुरू हुआ तो पाठा ने अपने लोगों को इकट्ठा किया। साफ़ आदेश दिया, 'तुम्हारे सामने कोई एक हत्या करे। तो तुम उनके दस लोगों का गला काट दो।' दस्ते के हर आदमी के पास चाकू, गंड़ासा और बंदूकें थीं। गोपाल पाठा के पाठा भी दो अमेरिकन पिस्टल लिए निकल पड़े। ब्रिटिश इतिहासकार और पत्रकार एंड्रयू व्हाइटहेड को पाठा ने बताया था कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकन आर्मी के लोग कोलकाता में आने लगे थे, नीग्रो भी थे। उन्हें 250 रुपये या व्हिस्की की बोतल देने पर एक पिस्तौल मिल जाती थी। पाठा और उनके लोगों ने मुस्लिम लीग के समर्थकों के खिलाफ रिटैलिएट किया। ख़ून अब दोनों तरफ से बहाया जाने लगा था।
क़रीब-क़रीब 4 दिन तक यह तांडव चलता रहा लेकिन कभी यह ठीक-ठीक नहीं पता चल सका कि डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कितने लोग मारे गए। 5 से 10 हज़ार लोगों की हत्या का अनुमान लगाया जाता है। घायलों की संख्या का तो कहना ही क्या है। क़रीब 1 लाख से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ा। शिविरों में रहना पड़ा।
नोआखली, गुलाम सरवर और एक सिर
कलकत्ता में नारा गूंजा था-
लड़ के लेंगे पाकिस्तान
छीन के लेंगे पाकिस्तान…
इस नारे की गूंज कलकत्ता से लगभग 500 किलोमीटर दूर नोआखली तक पहुंच गई। वही नोआखली जहां आज़ादी की रात गांधी रुके हुए थे। दंगे की आग शांत कराने के लिए। लेकिन Tryst with Destiny वाली रात से बहुत पहले भी नोआखली धधक चुका था। Calcutta Killings के ठीक बाद। दरअसल यह वही डायरेक्ट ऐक्शन डे वाली बयार थी जो वहां पहुंची थी और हवा में घुली थीं अफ़वाहें और सांप्रदायिक बयान।
29 अगस्त, 1946 के दिन ईद था। उसी दिन नोआखली में एक अफ़वाह उड़ी। हंगामा मच गया। बात यह फैली कि हिंदुओं ने सिखों को हायर किया है। मुसलमानों को मारने के लिए। भाड़े पर बुलाए गए सिख मुसलमानों को मार रहे हैं। मस्जिदों से नमाज़ खत्म होने के बाद भीड़ निकली। सिर पर झूठ का भूत सवार था। वे शहर में घुस गए। हथियारों के साथ। हिंदुओं के साथ नोआखली में मारपीट शुरू हो गई। शिकार आम-ओ-ख़ास, हर कोई बन रहा था। बाबूपुर गांव में एक कांग्रेसी नेता के बेटे की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। कांग्रेस हाउस में आग लगा दी गई। यह एक सिलसिले की शुरुआत थी। जिसके सिरे अलग-अलग मीटिंग्स तक जा रहे थे। एक मीटिंग 7 सितंबर को हुई। मीटिंग मियां गुलाम सरवर ने बुलाई थी। यह कौन था? इंतज़ार कीजिए। इनका भी कच्चा-चिट्ठा खोलेंगे। सरवर ने उलेमाओं और मुस्लिम लीग के साथ एक जॉइंट मीटिंग की। इसमें ढोल बजाकर तय हुआ कि कोलकाता के कत्लेआम का सिलसिला आगे कैसे बढ़ाना है। एलानिया कहा गया कि अब हथियार बनाने और उसका इस्तेमाल करने का वक़्त आ गया है। हथियार ख़ूब बने। अंधाधुंध इस्तेमाल भी हुए। इसकी कहानी सुनाएं। यहां अब ज़रा गुलाम सरवर की कहानी के पन्ने पलट लेते हैं।
उसका पूरा नाम था शाह सैयद गुलाम सरवर हुसैनी। उसका परिवार सूफी पीर की परंपरा से जुड़ा था। आज के बांग्लादेश में एक ज़िला है लक्ष्मीपुर। जहां दियारा शरीफ श्यामपुर है। मुस्लिमों के लिए पवित्र जगह। सरवर का परिवार इसी दियारा शरीफ से जुड़ा था। सरवर बंगाल विधानसभा का सदस्य भी था। इल्जाम लगते हैं कि नोआखली दंगों की ज़मीन उसी ने तैयार की थी। इतिहास के अलग-अलग पन्ने इस इल्जाम की तस्दीक करते हैं। गांधी के निजी सचिव प्यारेलाल भी अपनी किताब में इसका ज़िक्र करते हैं। उन्होंने गांधी के जीवन के आख़िरी हिस्से को 'Mahatma Gandhi: The Last Phase' में विस्तार से दर्ज किया है। प्यारेलाल एक क़िस्सा लिखते हैं। नोआखली में उन्हें एक हिंदू मिला। वह ऐसे लोगों से घिरा हुआ था जो उसे मार डालना चाहते थे। शख्स ने प्यारेलाल से कहा, 'यहां मौजूद मुसलमान हमारी हिफ़ाज़त करने वाले थे और सुरक्षा वापस बहाल करने के लिए एक ही ज़रूरत है कि मियां साहब गुलाम सरवर को रिहा कर दिया जाए।' कुछ घंटों बाद जब वही व्यक्ति प्यारेलाल से मिला तो बोला, 'आपने उन लोगों के बीच मुझसे और क्या कहने की उम्मीद की थी?' प्यारेलाल सरवर को दंगे के पीछे का दिमाग़ लिखते हैं लेकिन वह आदमी रिहाई की बात क्यों कह रहा था? क्योंकि उसे 25 अक्टूबर के दिन गिरफ्तार कर लिया गया था। आरोप दंगा भड़काने का ही था लेकिन गिरफ्तारी से पहले उसके इशारों पर ज़लज़ला हो चुका था।
गुलाम सरवर ने एक गैंग बनाई थी। गैंग में करीब एक हज़ार लोग थे। इसमें कुछ ऐसे लोग भी थे जो आर्मी में काम कर चुके थे। सरवर ने अपनी गैंग को 150 से 200 छोटे-छोटे ग्रुप्स में बांट दिया और गांवों की तरफ रवाना कर दिया। क्या काम दिया था इन ग्रुप्स को? 10 अक्टूबर की घटना से समझिए। लक्ष्मी पूजा का दिन था। करपारा के चौधरी बाड़ी में नोआखली बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट राय साहेब राजेंद्रलाल चौधरी रहते थे। वह दंगों से लोगों को बचाने में लगे हुए थे। उन्हीं की बाड़ी में भारत सेवाश्रम संघ के एक साधु रहते थे, जिनका नाम त्र्यंबकानंद था। वह हिंदू बाड़ियों में शीतला पूजा की संस्था को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहे थे। अफवाह फैल गई कि साधु ने कहा है कि आने वाले मौके पर बकरे के खून के बजाय मुसलमानों के खून से पूजा होगी। करपारा से थोड़ी ही दूरी पर श्यामपुर था। गुलाम सरवर का इलाका। उसने कह दिया कि साधु और राजेंद्रलाल चौधरी का सिर काट देगा। उसने एक चौकीदार को एक चिट्ठी देकर दोनों को शाहपुर बाजार में मिलने के लिए बुलाया। चौधरी को शक हुआ कि कुछ गड़बड़ है, इसलिए उसने जाने से मना कर दिया लेकिन सरवर बाज़ार पहुंच गया। उसने एक भीड़ के सामने भाषण किया। भीड़ को उकसाया। भीड़ ने बाज़ार में स्थित काली मंदिर में आग लगा दी। कालीगाछ को काट दिया। यहां उत्पात मचाने के बाद भीड़ तीन टुकड़ियों में बंट गई।
दिनेश चंद्र सिन्हा और अशोक दासगुप्ता दर्ज करते हैं कि एक टुकड़ी उत्तर-पश्चिम में रामगंज बाज़ार की ओर निकल पड़ी। दूसरे ने दसघरिया बाज़ार में हिंदुओं की दुकानों को लूटा और ठाकुर मंदिर को जला दिया। तीसरे ने नारायणपुर के ज़मींदार सुरेन बोस की कचहरी पर हमला किया। सुरेन बोस की हत्या कर दी गई। घर में रहने वाले पांच और लोग भी इसी तरह मारे गए। 11 अक्टूबर की सुबह, करीब 8 बजे, चौधरी बाड़ी पर भी हमला हुआ। राजेंद्रलाल चौधरी और उनके बेटे ने कुछ नौजवानों के साथ मिलकर भीड़ का विरोध किया, टकराए। तीन हमलावर मारे गए। फिर भीड़ पीछे हट गई और करीब तीन घंटे क़रीब दस हज़ार की फ़ौज के साथ दोबारा हमला कर दिया। भीड़ और चौधरी के लोगों में गोलीबारी हुई। दोनों ओर से फायरिंग हुई। अंत में हमला करने वालों ने चौधरी के घर पर केरोसिन और पेट्रोल फेंककर आग लगा दी। घर में छिपे लोग जलकर मर गए। राजेंद्रलाल चौधरी को अलग लाया गया। भीड़ के सामने उनका सिर कलम कर दिया गया और सिर गुलाम सरवर के सामने पेश कर दिया गया। यही वह एलान था जो सरवर ने किया था- चौधरी का सिर काट देंगे। ऐसी घटनाए पूरे नोआखली में जहां-तहां हो रही थीं।
गांधी को चुनौती- लौटने नहीं दूंगी
कोलकाता में जब आग धधक रही थी तब गांधी दिल्ली में थे। उन तक ख़बरें पहुंच रही थीं। फिर नोआखली होने लगा। ख़बरें फिर पहुंची। नोआखली से महिलाओं ने उन्हें चिट्ठियां भेजी थीं। गांधी ने नोआखली जाने का फ़ैसला किया। जब वह दिल्ली छोड़ने वाले थे तब किसी ने उनसे पूछ लिया था कि आप बॉम्बे, अहमदाबाद या छपरा क्यों नहीं गए? क्योंकि वहां मुसलमान मारे गए? नोआखली क्यों जा रहे हैं? क्योंकि वहां हिंदुओं का खून बहा है? गांधी पर ऐसे आरोप लगते रहे उस दौर में। भड़के हुए हिंदू कहते थे कि वह मुसलमानों की तरफदारी कर रहे हैं। गुस्साए मुसलमान कहते थे कि हिंदुओं का पक्ष ले रहे हैं। ख़ैर गांधी ने दिल्ली में उस शख्स को जवाब देते हुए कहा था, 'नोआखली में जो हुआ था, वैसा ही कुछ वहां हुआ होता और अगर मुझे लगता कि मौके पर मौजूद हुए बिना उन जगहों के लिए मैं कुछ नहीं कर सकता, तो ज़रूर उन जगहों पर जाता।' गांधी जब बंगाल पहुंचे तब बोले, 'मैं यहाँ पूरे एक साल या उससे ज़्यादा रह सकता हूं। अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं यहीं मर जाऊंगा लेकिन मैं हार नहीं मानूंगा।'
गांधी नोआखली पहुंचे। लोगों से मिलना शुरू किया। प्रार्थना सभाएं होने लगीं। जहां ज्यादातर महिलाएं आती थीं। जिनके पति या बच्चे दंगे की भेंट चढ़ गए थे। प्रार्थना सभा के ही दौरान एक दिन एक महिला ने गांधी के नाम एक पत्र लिखा और सौंपा। महिला ने लिखा था, 'मैं पक्का जानना चाहती हूं कि मेरी बेटी मर गई है या मेरे पास लौटकर आएगी। मुझे अपनी बेटी की वह दर्दनाक चीख याद है जब उसे मेरे पास से उठाकर ले जाया गया था। आप महात्मा हैं। आप आसानी से एक मां के दिल की पीड़ा को समझ सकते हैं। मैं आपको इस इलाके से तब तक नहीं जाने दूंगी जब तक मुझे मेरी प्यारी बेटी वापस नहीं मिल जाती।' ऐसी कितनी ही चिट्ठियां गांधी के सामने पढ़ी जाती थीं। गांधी उसे सुनते रहते थे। ये पत्र जिन्होंने लिखा था उनकी पूरी जानकारी 'The Great Calcutta Killings and Noakhali Genocide' में मिलती है। उनका नाम बिनारानी रॉय चौधरी था। नोआखली की ही रहने वाली थीं। 11 अक्टूबर, 1946 के दिन हमलावरों की भीड़ ने उन्हें पीटा। फिर उनकी बेटी को उठा ले गए। बेटी के साथ क्या हुआ? कभी पता नहीं चल सका।
10-11 अक्टूबर की घटनाओं के बाद नोआखली कुछ हद तक शांत हुआ लेकिन जो लड़ाई छिड़ी थी वो पूरी तरह खत्म नहीं हुई। कुछ महीनों बाद अगस्त, 1947 आया। भारत दो हिस्सों में बंट गया। 14 अगस्त को दुनिया के नक्शे पर एक नया मुल्क उभरा- पाकिस्तान। भारत के लोग रात 12 बजे का इंतज़ार कर रहे थे। 12 बजा। तारीख़ 14 से 15 अगस्त हो गई। जवाहरलाल नेहरू ने अपना मशहूर भाषण 'Tryst with Destiny' दिया। देश में उत्साह था। आज़ादी का उत्सव। एक तरफ पावर ट्रांसफर हो रहा था। सरकार बन रही थी लेकिन दूसरी तरफ सत्ता और शक्ति की मोह से बहुत दूर एक बूढ़ा दंगों की आग पर पानी डाल रहा था। मजलूमों के जख़्म पर मरहम लगा रहा था। 16 अगस्त, 1946 को बंगाल में जो डायरेक्ट एक्शन शुरू हुआ था वह 15 अगस्त, 1947 तक नोआखली में चलता रहा। अब उसके साथ डायरेक्ट एक्शन का नाम भले ना चस्पा हो लेकिन उसका रूप वही था। वीभत्स और डरावना।
गांधी कोलकाता के हैदरी मंजिल में रुके हुए थे। गांधी अपने साथ सुहरावर्दी को लेकर पहुंचे। वही सुहरावर्दी जिसने 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया था। गुस्साई भीड़ ने गांधी और सुहरावर्दी को घेर लिया। एक शख्स ने गांधी से कहा, 'पिछले साल 16 अगस्त को कहां थे, जब हमारे खिलाफ डायरेक्ट एक्शन हो रहा था?' गांधी ने जवाब दिया, '1946 का बदला 1947 में लेने का क्या फायदा है? अगर बेलियाघाट के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों को वापस आने का न्योता दें तो मैं मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर उनसे भी हिंदुओं को वापस बुलाने का अनुरोध करुंगा।' ऐसी हिंसा और सांप्रदायिक बर्बरता के बीच देश आज़ाद हुआ, बंगाल भी लेकिन बंगाल और देश दोनों दो फाड़ हो चुके थे। ऐसी स्थिति जिस पर गांधी की ही टिप्पणी मौजूं जान पड़ती है। उन्होंने 14 अगस्त को कहा था, 'कल 15 अगस्त को हम ब्रिटिश शासन से मुक्त हो जाएंगे लेकिन आज आधी रात को भारत दो देशों में विभाजित हो जाएगा। कल का दिन ख़ुशी के दिन के साथ-साथ दुख का भी दिन होगा।'
तब से अब के बीच हुगली नदी में काफी पानी बह चुका है लेकिन इतिहास की दिलचस्प बात यह है कि वह बहता नहीं है बल्कि नदी की तलहटी में जम जाता है और नदी में बहने वाले पानी के रंग पर अपना असर छोड़ता रहता है।
