अफगानिस्तान को साम्राज्यों का कब्रगाह कहा जाता है। यहां जो आया, वह शिकस्त खाकर ही लौटा। 15 फरवरी 1989 को सोवियत संघ को अपनी सेना अफगानिस्तान से वापस बुलानी पड़ी। नौ साल तक अफगान मुजाहिदीनों और सोवियत सेना के बीच जंग चली। 9/11 आतंकी हमले के बाद 7 अक्टूबर 2001 को अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान में एंट्री हुई। तालिबान शासन पर आतंकी ओसामा बिन लादेन और उसके संगठन अल-कायदा को पनाह देने का आरोप लगा। 

 

करीब दो दशक बाद 2021 में अमेरिका ने हार मान ली और अपनी सेना को वापस बुला लिया। काबुल की सत्ता में तालिबान की वापसी हुई तो पाकिस्तान में खुशियां मनाई जाने लगीं। विश्लेषकों ने तालिबान की वापसी को भारत के लिहाज से झटका करार दिया। मगर अब अफगानिस्तान के 'ग्रेट गेम' में पाकिस्तान ही फंस गया है। मगर सवाल यह उठता है कि आतंक के नाम पर पाकिस्तान अपनी लड़ाई लड़ रहा है या अमेरिका की, क्योंकि उसका इतिहास बेहद संदिग्ध रहा है।

 

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क्या बगराम के लिए हो रहा सबकुछ?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की निगाह अफगानिस्तान के बगराम एयरबेस पर है। वह हर हाल पर यहां नियंत्रण चाहते हैं। ट्रंप का तर्क है कि यह एक बेहद विशाल एयरबेस है। यहां से चीन के मिसाइल कार्यक्रम पर नजर रखी जा सकती है। पिछले साल 21 सितंबर को ट्रंप ने अफगानिस्तान को सीधी धमकी दी थी। इसमें कहा था, 'अगर अफगानिस्तान बगराम एयरबेस का कंट्रोल वाशिंगटन को नहीं सौंपता है बहुत बुरा होने वाला है।'

 

ट्रंप के बयान के अगले महीने ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच घातक झड़प हुई। इसमें अफगानिस्ता के 9 और पाकिस्तान के 58 सैनिकों की जान गई। हालांकि पाकिस्तान सेना ने सिर्फ 23 मौतें ही स्वीकार की। 18 अक्टूबर को पाकिस्तान ने एक बार फिर एयर स्ट्राइक की। इसके बाद सीमा पर दोनों देशों के बीच भारी गोलीबारी हुई। 19 अक्टूबर को कतर और तुर्की की मध्यस्थता से युद्धविराम पर सहमति बनी।

असीम मुनीर की तारीफ के पीछे क्या?

कुछ समय से डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की खूब तारीफ करने में जुटे हैं। व्हाइट हाउस में लंच कराया। ट्रंप करीब 10 बार असीम मुनीर की तारीफ कर चुके हैं। विश्लेषक इसे गाजा और अफगानिस्तान मामले से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि कूटनीति में कोई फ्री लंच नहीं होता है। अब पाकिस्तान का बिल चुकाने का समय आ चुका है।

 

ट्रंप कभी असीम मुनीर को अपना फेवरेट फील्ड मार्शल तो कभी महान योद्धा बताते हैं। 20 फरवरी को वाशिंगटन में पीस बोर्ड की बैठक हुई। इस दौरान भी ट्रंप ने असीम मुनीर की तारीफ की। दो दिन बाद 22 फरवरी को पाकिस्तान की सेना ने अफगानिस्तान के कई प्रांतों में बमबारी की। तालिबान ने चार दिन का धैर्य दिखाया और 26 फरवरी की रात पाकिस्तान पर धावा बोला। अब तक की झड़प में दर्जनों लोगों और सैनिकों की जान जा चुकी है। शुक्रवार यानी दूसरे दिन भी झड़प जारी है।

ख्वाजा आसिफ ने खुद ही खोली पोल

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी अमेरिका के इशारे में अफगानिस्तान पर दो युद्ध लड़ने की बात स्वीकार कर चुके हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि कहीं पाकिस्तान वाशिंगटन के कहने पर तीसरा युद्ध तो नहीं लड़ रहा है।

 

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पाकिस्तान की संसद में ख्वाजा आसिफ कहा था कि अफगानिस्तान युद्ध में इस्लामाबाद की भागीदारी धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से थी। पाकिस्तान कोल्ड वार से 9/11 के बाद तक अंतरराष्ट्रीय फंड हासिल करने और सुपरपावर खासकर अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने की खातिर युद्ध में शामिल हुआ था। हम इन युद्धों में इस्लाम की रक्षा या जिहाद के लिए नहीं उतरे थे।

 

ख्वाजा आसिफ का दावा ऐतिहासिक रूप से काफी दुरुस्त है। सोवियत सेना के खिलाफ अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद से तालिबान को मजबूत बनाया था। पाकिस्तान में अफगान लड़ाकों को ट्रेनिंग दी गई। वहीं 2001 के बाद अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान में अपने अधिकांश हमलों को पाकिस्तान की सरजमीं से ही अंजाम दिया। आतंक के खिलाफ कथित जंग में सहयोग के नाम पर पाकिस्तान को खूब फंडिंग मिली। अमेरिका ने एफ- 16 विमान भी सौंपे।