मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के दौरान खासकर ईरान और इजरायल के बीच टकराव के चलते वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति पर असर पड़ना शुरू हो गया। तेल सप्लाई प्रभावित होने की आशंका के बीच कई देशों ने एहतियातन कदम उठाते हुए राशनिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू करनी शुरू कर दी हैं।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो यह संकट और गहरा सकता है। इसी वजह से कई सरकारें अभी से तैयारी में जुट गई हैं। कुछ देशों ने सीधे राशनिंग लागू की है, जबकि कई अन्य देशों ने स्टॉक बढ़ाने, खपत कम करने और जमाखोरी रोकने जैसे कदम उठाए हैं। इसका सीधा असर आम जनता की दैनिक जिंदगी और खर्च पर पड़ रहा है।

 

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क्या है राशनिंग व्यवस्था और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

राशनिंग एक आपातकालीन आर्थिक व्यवस्था है। जिसमें सरकारें हर व्यक्ति या हर घर के हिसाब से कम मिलने वाली चीजों (जैसे फ्यूल, बिजली, या अनाज) की मात्रा को लिमिट करती हैं। आम समय में, मार्केट सप्लाई और डिमांड के आधार पर चलते हैं लेकिन युद्ध जैसे संकट के समय जब सप्लाई कम होती है तो सरकारें दखल देती हैं। इसका मुख्य मकसद पैनिक बाइंग को रोकना और यह पक्का करना है कि अमीर लोग सारा स्टॉक न खरीद लें।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा

आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, राशनिंग का लागू होना इस बात का संकेत है कि वैश्विक मुक्त बाजार दबाव में है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से परिवहन लागत बढ़ गई है, जिसका सीधा असर खाने-पीने की चीजों पर पड़ रहा है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बाधित होता है तो दुनिया की 20% ऊर्जा आपूर्ति रुक जाएगी। जिससे विकसित देशों को भी ऊर्जा राशनिंग जैसे कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं।

 

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हालात अब भी तनावपूर्ण

डोनाल्ड ट्रंप के कूटनीतिक संकेतों के बावजूद इजरायल और ईरान के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। ट्रंप के ट्रुथ सोशल पोस्ट के बाद भी इजरायल ने सोमवार को तेहरान के अंदरूनी इलाकों में हमले जारी रखने की बात कही। रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिका और इजरायल ने हाल के दिनों में हमले तेज कर दिए हैं।

 

वहीं, जवाब में ईरान ने इजरायल और खाड़ी क्षेत्र में मिसाइलें दागीं। इजरायली अधिकारियों का दावा है कि अब तक 400 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं, जिनमें से ज्यादातर को एयर डिफेंस ने रोक लिया। ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के अनुसार, 81,000 से ज्यादा इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं, जबकि इजरायल में 2,700 लोग बेघर हुए।