यूरोप के मुहाने पर चल रही जंग कहने के लिए रूस और यूक्रेन की है। असल लड़ाई पश्चिमी देश बनाम रूस की है। तीन साल से अदना सा यूक्रेन महाशक्ति रूस के सामने यूं ही नहीं खड़ा है। अमेरिका के अलावा तमाम यूरोपीय देश रूस के खिलाफ यूक्रेन को युद्ध का ईंधन-पानी मुहैया करवा रहे हैं। कोई पैसा भेज रहा है तो कोई हथियार। हजारों जानें जा चुकी हैं। हल अभी तक नहीं निकला है। ट्रंप युद्ध विराम का दबाव बनाने में जुटे हैं, लेकिन पुतिन को कोई फर्क नहीं पड़ता है।

 

यह तो एक खुली जंग है, जिसे पूरी दुनिया जानती हैं। मगर पश्चिम देश बनाम रूस की एक और जंग जारी है। इसके जद में कई देश हैं। यूरोप और एशिया से इतर इस बार कुश्ती का अखाड़ा अफ्रीका महाद्वीप बना है। आइये जानते हैं कि अफ्रीका में रूस और पश्चिमी देशों के खिलाफ कौन सी जंग जारी है, किसको कितनी बढ़ हासिल है?

 

माली: 10 साल में माली तीन तख्तापलट देख चुका है। पहला साल 2012 में हुआ। इसके बाद 2020 में नौ महीने के अंतराल में दो तख्तापलट हुए। आखिरी के दो तख्तापलट को अंजाम माली जुंटा के नेता जनरल असिमी गोइता ने दिया था। उस वक्त अमेरिका उनके खिलाफ था। असिमी गोइता की अमेरिका ने न केवल निंदा की बल्कि माली की सुरक्षा सहायता भी रोक दी।

 

2013 में माली में जिहादी विद्रोह भड़का। उसे रोकने की खातिर फ्रांस ने अपनी सेना वहां भेजी। करीब नौ साल बाद माली की गोइता सरकार के दबाव में फ्रांस को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। वहां की सैन्य सरकार ने फ्रांस की जगह रूस के सैनिकों को माली बुलाया। माली के लोगों ने इसका स्वागत किया। रूस की बढ़ती धाक से अमेरिका टेंशन में आ गया। उसने तुरंत उस गोइता सरकार से बातचीत शुरू की, जिसका खुलकर अमेरिका निंदा कर चुका है।

 

हाल ही में माली की सैन्य अधिकारियों ने गोइता को पांच साल के लिए राष्ट्रपति बनाया है। उनके पास यह ताकत भी है कि वह बिना चुनाव के अपना कार्यकाल बढ़ा सकते हैं। अब अमेरिका को हकीकत का पता चल गया है। अगर माली में अपना प्रभाव बरकरार रखना है तो गोइता से बातचीत करना अहम है, ताकि रूस के प्रभाव को कम किया जा सके। दूसरी रूस माली में रिफानरियां बना रहा है। सोने की खादानों में उसकी कई कंपनियां लगी है। रूस का वैगनर समूह माली की सेना के साथ आतंकरोधी अभियान में जुटी है।

 

बुर्किना फासो: एक अन्य अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में कैप्टन इब्राहिम ट्रोरे का शासन है। उनको पश्चिम खासकर फ्रांस विरोधी माना जाता है। रुस से उनकी नजदीकियां जगजाहिर हैं। बुर्किना फासो की सत्ता में रूस का प्रभाव किसी से ढका-छिपा नहीं है। ट्रोरे रक्षा से व्यापार समझौते तक रूस के साथ करने में जुटे हैं। बदले में रूस से जुड़े लोग सोशल मीडिया पर ट्रोरे का गुणान करते हैं।

 

नाइजर: माली और बुर्किना फासो जैसा ही नजारा नाइजर में है। यहां लोग पश्चिमी देशों के खिलाफ हैं जबकि रूस का पलकें बिछाकर स्वागत करने में जुटे हैं। इन देशों में रूस का प्रभाव कितना है इसका अंदाजा एक इस बात से लगा सकते हैं कि पुतिन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने वारंट जारी किया। अब 22 सितंबर को माली, नाइजर और बुर्किना फासो ने आईसीसी से हटने का ऐलान कर दिया।

 

इक्वेटोरियल गिनी: यहां भी रूस का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। पिछले साल रूस ने यहां के राष्ट्रपति की सुरक्षा में करीब 200 सैनिकों को तैनात किया था। 1979 में तख्तापलट के बाद सत्ता में काबिज होने वाले राष्ट्रपति तियोदोरो ओबियांग का पिछले 45 से राज है। इक्वेटोरियल गिनी एक छोटा सा देश है, लेकिन तेल समृद्ध है।

 

लीबिया: पश्चिमी और मध्य अफ्रीका के बाद रूस अपने वैगनर समूह के माध्यम से उत्तरी अफ्रीका में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। उसने लीबिया के शासक जनरल खलीफा हफ्तार के समर्थन में वैगनर सेना उतारी है। सीरिया में बशर अल असद की सत्ता गई तो रूस की पकड़ कमजोर पड़ी। उसके कई एयरबेस खतरे में आ गए। इसके बाद रूस ने यहां संसाधनों को लीबिया भेजा। पूर्वी लीबिया में स्थित एक बेस से रूसी विमानों ने कई उड़ानें संचालित कीं। खलीफा हफ्तार के समर्थ के बदले वैगनर समूह को लीबिया के तेल क्षेत्र तक पहुंच मिली।

 

मध्य अफ्रीकी गणराज्य: यहां के राष्ट्रपति फॉस्टिन-आर्केंज तौडेरा की सत्ता को रूस के ही वैगनर सैनिकों ने बचाया था। बदले में वैगनर समूह के प्रमुख प्रिगोझिन की कंपनियों को वहां सोने और हीरे की खदाने मिलीं। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के मुताबिक प्रिगोझिन की एक कंपनी ने सिर्फ नदासिमा सोने की खान से 1 बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य का सोना निकाला। अमेरिका ने न केवल वैगनर समूह पर बैन लगाया बल्कि उससे जुड़े अफ्रीका के कई नेताओं पर भी एक्शन लिया। 

अफ्रीका में वैगनर समूह की धाक

रूस का निजी सैन्य संगठन वैगनर समूह का अफ्रीका में काफी दबदबा है। उसके दबदबे की शुरुआत साल 2017 में सूडान शुरू हुआ। अगले साल 2018 में इस समूह ने मध्य अफ्रीकी गणराज्य और मेडागास्कर, 2019 में लीबिया और मोजांबिक और 2020 में माली तक अपना विस्तार किया। 

 

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक 2019 से 2023 के बीच चीन और रूस उप-सहारा अफ्रीका में हथियारों के सबसे बड़े सप्लायर हैं। रूस और अफ्रीका के बीच सिर्फ 18 अरब डॉलर का व्यापार है, जबकि अमेरिका के साथ 64 और चीन के साथ 254 अरब डॉलर का व्यापार है, लेकिन रूस का अफ्रीका के अधिकांश सोना, हीरे, यूरेनियम और तेल जैसे जैसे संसाधनों तक पहुंच है। उसकी कंपनियां इन सेक्टरों में लगी हैं। 

वापसी की कोशिश में अमेरिका

रूस ने पिछले 11 साल में 19 अफ्रीकी देशों के साथ सैन्य सहयोग समझौता किया है। वह हथियारों की सप्लाई कर रहा है। सैनिकों को ट्रेनिंग और खुफिया जानकारी तक साझा करता है। अमेरिका का प्रभाव तेजी से घट रहा है, लेकिन वह वापसी की कोशिश में जुटा है। कई संगठनों को अमेरिका का समर्थन प्राप्त है। खूनी संघर्ष में हजारों लोगों को अब तक अपनी जान गंवानी पड़ी है। अमेरिका उन तानाशाही सरकारों से भी गुपचुप बातचीत करने में जुटा है, इनकी कभी वह खिलाफत करता था।

 

सीएनएन से बातचीत में केप टाउन विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शोध सहयोगी फिलाटोवा ने कहा कि रूस अफ्रीकी देशों को यह सहायता उनके खनिज संसाधनों पर पूरा नियंत्रण या एक निश्चित प्रतिशत के बदले देता है। रूस को यही चाहिए, क्योंकि उसे धन की जरूरत है। इससे यूक्रेन में उसके युद्ध को मदद मिलती है। 

संसाधनों पर सबकी निगाह

रूस और पश्चिमी देशों की जंग में सबसे अधिक अफ्रीकी नागरिक पिस रहे हैं। दुनियाभर में अमेरिका लोकतंत्र बचाने का जिम्मा लेता है। आतंक के खिलाफ लड़ाई का दावा करता है। मगर युंगाडा और माली के सैन्य तानाशाहों के सामने वह नतमस्तक है, ताकि अपने हितों को साध सके। अफ्रीका में दुर्लभ खनिज, सोना और यूरेनियम के बड़े भंडार हैं। सबकी निगाह इन्हीं पर टिकी है।