जियोपॉलिटिक्स भी अजीब चीज़ है। जिसे कभी देखा नहीं, उसे बहस की वजह बना सकती है और जो सबके सामने है उसे आंखों से ओझल कर सकती है। सेमीकंडक्टर, माइक्रोप्रॉसेसर या कंप्यूटर चिप्स। यह सुनकर हमारे दिमाग में TSMC या फॉक्सकॉन जैसे नाम आते हैं।

 

लेकिन हम एक नाम मिस कर जाते हैं जो इस यूनिवर्स का एक बड़ा और ताकतवर खिलाड़ी है - इंटेल। कैलिफोर्निया की सिलिकॉन वैली को टेक्नॉलजी का मक्का जिन कंपनियों के बूते कहा जाता है, वह बस गूगल और एपल के दम पर नहीं है। इनके आने से तीन दशक पहले से इंटेल अपना खूंटा गाड़कर बैठी हुई है। सॉफ्टवेयर की बादशाहत के दौर में हार्डवेयर और फर्मवेयर से नाम बनाने वाली कंपनी अमेरिका के लिए उतनी ही अहम है जितनी बोइंग या गूगल।

 

इंटेल का नेट वर्थ 83 लाख करोड़ रुपए है। हेडक्वॉटर कैलिफोर्निया के सैंटाक्लारा में है। लेकिन यह अभी वॉशिंगटन बनाम बीजिंग की लड़ाई में फंसी हुई है। 18 मार्च 2025 को इस कंपनी ने चीनी मूल के अमेरिकी नागरिक लिप बो तान को अपना CEO बनाया। कंपनी के इतिहास में पहली बार किसी चीनी मूल के व्यक्ति को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। जब यह हो रहा था तब तक डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति की शपथ लिए हुए लगभग 2 महीने हो चुके थे।

 

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चीनी मूल का सीईओ

अब चीनी मूल का आदमी CEO बना है तो ट्रंप के कान खड़े होने लाज़मी थे। वैसे अमेरिका में जब भी चीनी मूल का कोई व्यक्ति इतने बड़े पद पर जाता है तो लोग बातें बनाने लगते हैं। कभी कभी तो सिक्योरिटी एजेंसियां सतर्क हो जाती हैं। 

 

 

ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ ट्रंप या रिपब्लिकन लोगों की बीमारी है। टिकटॉक का उदाहरण ले लीजिए। 2023 और 24 में बाइडन प्रशासन उनके पीछे पड़ा रहा। अमेरिकी कांग्रेस में उनके CEO की पेशी हुई। उनसे उनके कारोबार की डिटेल देने को कहा गया, वजह बताई गई कि शक है कि कहीं वह अमेरिकियों की जानकारी चीनी सरकार को तो नहीं भेज रहे हैं।

 

खैर, टिकटॉक तो एक चीनी कपंनी है। उसके CEO भी चीनी मूल के ही हैं। जब उन पर जांच बैठ सकती है तो एक अमेरिकी कंपनी का CEO चीनी आदमी को बनाने पर कितना बवाल हो सकता है सोचिए। ऊपर से यह ट्रंप का निज़ाम है। फिर ट्रंप ने चीन के साथ एक ट्रेड वॉर छेड़ी हुई है। वह बात और है कि बार बार नब्बे दिनों की मोहलत के पीछे छिप रहे हैं। क्योंकि चीन से सीधे टकराने में नुकसान किसका है, यह तो ट्रंप को भी मालूम है। इसीलिए वह इधर उधर हाथ चला रहे हैं। कि कुछ न कुछ गतिविधि करते रहना है। तो उन्होंने इंटेल पर ही जांच बैठाने की बात शुरू कर दी। 

 

आपको अपना पहला कंप्यूटर या लैपटॉप तो याद ही होगा। सभी पुराने कम्प्यूटर्स में लगभग यही चिप लगी आती थी, खासकर माइक्रोसॉफ्ट के बने हुए। अब मार्केट में कई और प्लेयर्स आ गए हैं। जो इससे बेहतर और सस्ते दामों में चिप दे रहे हैं। लेकिन इंटेल, अब भी एक बहुत बड़ा प्लेयर है।

 

इंटेल कई तरह के चिप्स बनाता है। जैसे माइक्रोप्रोसेसर, CPU, ग्राफिक कार्ड्स, मदरबोर्ड के लिए चिपसेट आदि। ट्रंप से पहले के दौर में इंटेल को एक ऐसी कंपनी के रूप में देखा जाता था, जो टेक्नॉलजी और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की दुनिया में अमेरिका को आगे रखेगी। लेकिन ट्रंप फिर ट्रंप हैं। कुछ अजीबोगरीब न करें तो दुनिया कहेगी कैसे कि ट्रंप का राज है। तो उन्होंने 7 अगस्त को अपनी सोशल मीडिया वेबसाइट ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘The CEO of INTEL is highly CONFLICTED। उन्हें तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इस समस्या का कोई और समाधान नहीं है। Thank you for your attention to this problem!’ ट्रम्प ने अपने पोस्ट में कोई एक्सप्लानेशन नहीं दिया कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसके पीछे की क्या वजह है? बस बोल दिया कि इस्तीफा दे दो।

शेयर गिरा नीचे

ट्रंप के इस पोस्ट के बाद इंटेल के शेयर लगभग 3 फीसदी नीचे आए। फिर 11 अगस्त को ट्रंप ने CEO लिप बो तान को मिलने के लिए बुलाया। मुलाकात के बाद ट्रम्प बोले, ‘बड़ी अच्छी मीटिंग रही। तान एक बढ़िया आदमी हैं। उनकी सफलता की कहानी बहुत बढ़िया है। उम्मीद है कि आगे इस सिलसिले में और मुलाकात होगी।’

 

ट्रंप भले ही यह बात कहकर निकल गए हों, पर इस प्रकरण ने इंटेल की इमेज को नुकसान तो पहुंचा ही दिया है। वैसे भी इंटेल के दिन इन दिनों ख़राब चल रहे हैं। पिछले एक साल में कंपनी नुकसान में ही रही है। उसका घाटा सिर्फ एक साल में 26 फीसदी से ज़्यादा रहा है। वह कंपनी जो एक समय कंप्यूटर चिप के मामले में पूरी दुनिया में एकतरफा राज करती थी उसका साम्राज्य अब चुनौतियों का सामना कर रहा है।

कब बना था पहला कंप्यूटर?

हम सबने यह सवाल स्कूल में सामान्य ज्ञान की किताब में पढ़ा है। जवाब है चार्ल्स बैबेज़। 1822 में उन्होंने दुनिया का पहला कंप्यूटर बनाया था। इन्हें ही फादर ऑफ कंप्यूटर कहा जाता है। फिर जर्मनी के वैज्ञानिक कोनराड ज्यूस ने 1936 में Z1 कम्पूटर बनाया। इसमें बड़े बड़े मैकेनिकल स्विच थे।

 

फिर 1941 में उनका Z3 यानी इसी का एडवांस वर्ज़न आया। जिसे आम तौर पर दुनिया का पहला प्रोग्रामेबल डिजिटल कम्प्यूटर माना जाता है। इस समय तक कंप्यूटर का साइज़ बहुत बड़ा होता था। कमरे के साइज़ तक का कम्प्यूटर बनाया जाता था।

 

फिर आया साल 1958। इस साल जैक किल्बी ने इंटीग्रेटेड सर्किट बनाया। इसे जर्मेनियम धातु से बनाया गया था। साल 2000 में इसके लिए उन्हें नोबेल पुरुस्कान मिला था। किल्बी की यह खोज क्रांतिकारी थी। इससे कंप्यूटर का साइज़ छोटा हुआ।

 

इसके 10 साल बाद इंटेल कंपनी की नींव रखी गई। 1968 में रॉबर्ट नॉइस और गॉर्डन मूर नाम के दो लोगों ने यह काम किया। नोइस और मूर फेयर चाइल्ड सेमीकंडक्टर कंपनी में काम करते थे। लेकिन दोनों ने मिलकर अपने आईडिया पर काम किया और 1968 में एक पावरफुल चिप बनाई। जिससे कंप्यूटर तेज़ चलने लगे।

 

आर्थर रॉक नाम के एक उद्योगपति को इस कंपनी में संभावना दिखी तो उन्होंने इस कंपनी में इन्वेस्ट कर दिया। उस ज़माने में रॉक ने इस कंपनी में ढाई मिलियन डॉलर लगा दिए थे। इसके बाद इंटेल कंपनी ने 3 बड़े काम किए, जिसने कंप्यूटर जगत में क्रांतिकारी बदलाब ला दिया। कौन से थे यह 3 काम?

 

नंबर 1ः इंटेल ने 1970 में पहला बड़ा स्टोरेज डिवाइस बनाया। जिसे  DRAM कहा गया। और इसका नाम दिया गया Intel 1103। इससे डेटा तेज़ी से ट्रांसफर करना आसान हो गया।


नंबर 2: 1971 में इंटेल ने Intel 4004 लॉन्च किया। यह दुनिया का पहला माइक्रो प्रोसेसर था। यानी पहली बार एक छोटा सा सिलिकॉन चिप कंप्यूटर में लग रहा था। इसके पहले के कम्प्यूटरों में CPU कई बड़े-बड़े सर्किट बोर्ड पर फैला होता था, जिससे मशीन भारी और महंगी होती थी। माइक्रो प्रोसेसर ने कम्प्यूटर को छोटा, तेज़, और सस्ता बना दिया। यहीं से पर्सनल कम्प्यूटर का रास्ता खुला। 

 

नंबर 3: 1978 में इंटेल ने 8086 प्रोसेसर लॉन्च किया। IMB ने जब दुनिया का पहला पर्सनल कंप्यूटर बनाया तो इसमें इंटेल का ही प्रोसेसर लगा था।

 

फिर आया 1990 का दौर। 1993 में इंटेल ने पेंटियम नाम का प्रोसेसर बनाया। यह नाम इतना मशहूर हुआ कि लोग पेंटियम को ही कंप्यूटर समझने लगे थे। असल में पर्सनल कंप्यूटर में इसी चिप का इस्तेमाल किया जा रहा था। अब दुनिया में इंटरनेट का प्रचलन भी बढ़ने लगा था। इसलिए मार्केट में कंप्यूटर की डिमांड भी तेज़ होती चली गई।

 

साल 2006 में Intel Core सीरीज़ लॉन्च हुई। जिसने मार्केट में तबाही मचा दी। यह सीरीज़ आज तक रिलेवेंट है। अब भी इस प्रोसेसर के कम्प्युटर और लैपटॉप मार्केट में बड़ी संख्या में बिकते हैं।

 

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इंटेल की फाइनेंशियल ग्रोथ

ढाई मिलियन डॉलर के निवेश के साथ शुरू हुई यह कंपनी 1980 की शुरुआत तक 1 बिलियन डॉलर की बन गई थी। 1990 के शुरुआत में 8 बिलियन डॉलर पहुंची और साल 2000 आते आते इसकी कीमत 26 बिलियन डॉलर हो गई थी। फिर इंटेल कोर आने के बाद इसका मार्केट पूरी तरह बदल गया। 2015 में कंपनी का रिवेन्यू लगभग 55 बिलियन डॉलर था।

पर वक्त हमेशा एक सा नहीं होता। लगातार सफलता पाने के बाद इंटेल का भी ख़राब समय आना शुरू हो गया। एक आम धारणा यह है कि 2020 के बाद से इंटेल का ख़राब समय शुरू हुआ है। जबकि ऐसा है नहीं। असल में इसकी शुरुआत 2015 में ही हो गई थी।

 

इस साल हुआ यह कि इंटेल ने मोबाइल प्रोसेसर में एंट्री करने की कोशिश की। लेकिन इसमें इंटेल को सफलता मिली नहीं। स्मार्ट फोन के आने से कंप्यूटर की अहमियत और मांग दोनों घटने लगी थी। एक तरफ स्मार्ट फोन के चिप बनाने की असफलता और दूसरे तरफ कंप्यूटर का जमा जमाया मार्केट कम हो रहा था।

 

धीरे धीरे मार्केट में प्रोसेसर बनाने वाली नई कंपनियां भी आ गईं। AMD और एनविडिया जैसी कम्पनियों ने इंटेल का मार्केट कम करना शुरू किया। साल 2020 के अंत तक एप्पल कंपनी ने भी इंटेल के साथ अपने संबंध खट्टे कर लिए। उस साल के बाद Apple ने Mac में इंटेल प्रोसेसर छोड़कर अपनी खुद की चिप लगानी शुरू कर दी।

 

अब डेटा सेंटर में AMD और Nvidia का दबदबा बढ़ रहा था। फिर AI बूम हुआ। इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों ने  Nvidia के GPU पर ज़्यादा भरोसा दिखाया। इससे इंटेल और पिछड़ता चला गया।

 

अकेले 2022 में इंटेल का रेवेन्यू 20 फीसदी गिरा। 2023-24 में भी यह गिरावट दर्ज की गई। अब भी इंटेल के कोई अच्छे दिन नहीं आए हैं। एनविडिया जैसी कंपनी पैसा कमाने के मामले में इंटेल से बहुत आगे निकल चुकी है। अगस्त 2025 में एनविडिया का टोटल मार्केट कैप 4.47 ट्रिलियन डॉलर से भी ज़्यादा है।

क्या है ट्रंप का ताजा विवाद?

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल के पोस्ट के जरिए इंटेल के CEO लिप बो तान के इस्तीफे की बात की। इसके पीछे क्या वजह है? 2 बिन्दुओं में समझिए।

 

नंबर 1: अप्रैल 2025 में न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट आई। जिसमें दावा किया गया कि तान ऐसी कम्पनियों में इन्वेस्ट कर रहे हैं जिनके तार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और उनकी सेना से जुड़ते हैं। रिपोर्ट कहती है कि मार्च 2012 से दिसंबर 2024 तक तान ने कई ऐसे चीनी फर्म में पैसे लगाए हैं जो चीन की आर्म्ड फ़ोर्स यानी पीएलए के लिए तकनीक का निर्माण करती है। यह इन्वेस्टमेंट लगभग 200 मिलियन डॉलर का बताया जाता है।

 

अमेरिकी नागरिक चीन में इन्वेस्ट कर सकते हैं। कानूनन इसमें कोई दिक्कत नहीं है। पर CCP के साथ तार जुड़ने से दिक्कत खड़ी हुई है। ट्रंप की धमकी के एक दिन पहले रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन ने भी प्लेटफोर्म X पर यही मुद्दा उठाया था। उन्होंने एक चिट्ठी लिखी। जिसमें बिल्कुल यही मुद्दे उठाए गए थे।

 

नंबर 2: यह इंटेल से नाराज़गी की उतनी बड़ी वजह तो नहीं है फिर भी महत्त्वपूर्ण है। अमेरिका में एक राज्य है ओहायो। यहां इंटेल का एक बड़ा प्लांट खुलने वाला है। इसके लिए अमेरिकी सरकार ने वहां पैसा भी लगाया है। अब आप पूछेंगे कि पैसा क्यों लगाया है? बाइडन सरकार 2023 में चिप्स एंड साइंस ऐक्ट (CHIPS Act) लेकर आई थी, जिसके तहत लगभग साढ़े आठ बिलियन डॉलर की छूट हर साल इंटेल को मिलती है। सरकार का तर्क यह था कि ताइवान से चिप मार्केट को जो टक्कर मिल रही है वह खत्म की जा सके।

 

अब सरकार इंटेल पर पैसा लगाएगी तो इससे लोगों को नौकरी भी मिलनी चाहिए। ओहायो वाले प्लांट के साथ यही दिक्कत है कि वह ओपन नहीं हो पा रहा है। इसमें इंटेल की तरफ से ही देरी हो रही है। इसलिए यहां का लोकल प्रशासन इंटेल से नाराज़ है। और यह प्रशासन मुख्य रूप से ट्रंप की पार्टी वाला रिपब्लिकन ही है। क्योंकि ओहायो ऐतिहासिक रूप से एक रिपब्लिकन स्टेट रहा है। 2024 के चुनाव में फिर यह स्टेट ट्रंप ने ही जीता। यहां के गवर्नर भी रिपब्लिकन पार्टी से आते हैं। अब इंटेल के प्लांट खुलने से लोगों को नौकरी मिलनी थी जो मिल नहीं पा रही। जिससे वहां का लोकल प्रशासन नाराज़ है।

 

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डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका के चिप्स पूरी दुनिया के लोग खरीदे। लेकिन वह यह नहीं चाहते कि कोई दूसरा देश उनके देश में चिप बेचे, इसलिए उन्होंने विदेशी चिपों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्लान बना लिया है। ऊपर से उनका चीन के साथ तनाव तो चल ही रहा है। अब इंटेल के सीईओ भी चाइनीज़ निकल आए हैं। तो ट्रंप को एक बहाना और मिल गया है।