जंग अब सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर हमले से आगे बढ़ चुकी है। ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की जंग में डेटा सेंटरों को निशाना बनाया जा रहा है। इसका असर न केवल बैंकिंग सेक्टर, बल्कि लोगों की आम जिदंगी पर भी पड़ रहा है। तीनों देश एक-दूसरे के डेटा सेंटरों को तबाह करना चाहते हैं, ताकि दुश्मन पर युद्ध की अधिक कीमत थोपी जा सके।

 

होर्मुज की खाड़ी पर ईरान की नाकेबंदी के कारण दुनियाभर में तेल और गैस की आपूर्ति बाधित है। वहीं दुनिया के आधुनिक तेल यानी डेटा पर भी सेनाओं की निगाह टिक चुकी है। 2006 में ब्रिटिश गणितज्ञ क्लाइव हम्बी ने डेटा को नया तेल बताया था। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच इसी नए तेल को बाधित करने की जंग छिड़ी है।

 

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अभी तक डेटा सेंटर हैंकरों के निशाने पर थे। दूर बैठा कोई हैकर गुपचुप तरीके से डेटा में सेंध लगाता था। यह सबकुछ पर्दे के पीछे होता था। मगर अब पर्दा हट चुका। सेनाएं एक-दूसरे के डेटा सेंटरों को तबाह करना चाहती हैं, ताकि व्यवस्था को चौपट किया जा सके और लोगों में भय व अफरा-तफरी का माहौल पैदा किया जा सके। 

अब तक कहां-कहां डेटा सेंटर निशाने पर

डेटा सेंटरों को निशाना बनाने की शुरुआत ईरान की आईआरजीसी ने किया। उसने सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में स्थित दो डेटा सेंटर पर अटैक किया। इनका संबंध अमेरिकी कंपनी अमेजन से था। बहरीन में भी एक डेटा सेंटर को निशाना बनाया गया। इन दोनों जगह ईरानी हमले से भौतिक तौर पर नुकसान तो मामूली हुआ, लेकिन सेवा क्षेत्र में बड़ा असर हुआ। उपभोक्ता सेवा से बैकिंग तक पर बुरा असर देखने को मिला।

 

11 मार्च को इजरायल ने ईरान की राजधानी तेहरान में एक डेटा सेंटर को तबाह कर दिया। यह डेटा सेंटर सेपाह बैंक से जुड़ा था। यहां आईआरजीसी और ईरान सेना के जवानों के वेतन खाते थे। उनका सारा रिकॉर्ड था। इजरायली हमले के कारण सैनिकों को वेतन का भुगतान करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। ऑनलाइन बैंकिंग को भी रोकना पड़ा।

 

अपने डेटा सेंटर पर इजरायली हमले से ईरान भड़क उठा। उसने उन तकनीकी टारगेट की सूची जारी की। जिन्हें वह यूएई, इजरायल, कतर और बहरीन में निशाना बनाने वाला है। अमेरिका की कंपनियों से जुड़े डेटा सेंटर पर हमले को ईरान ने वैध टारगेट बताया। सूची के मुताबिक ईरान ने आईबीएम के छह, एडब्ल्यूएस व माइक्रोसॉफ्ट के 5-5, गूगल के चार, ओरेकल और एनवीडियो के तीन-तीन डेटा सेंटर पर हमले की धमकी दी। 

 

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रूस के खिलाफ यू्क्रेन का डेटा युद्ध

युद्ध में डेटा का इस्तेमाल 2022 से बढ़ गया है। रूस के खिलाफ यूक्रेन एआई बेस्ड युद्ध लड़ रहा है। इसमें अमेरिकी कंपनियां उसकी मदद कर रही हैं। एलन मस्क की स्टारलिंक इंटरनेट मुहैया करवा रही है। क्लियरव्यू एआई का चेकपॉइंट में उपयोग हो रहा है। इससे रूसी एजेंटों की पहचान करने में मदद मिल रही है। साइबर हमले से निपटने में माइक्रोसॉफ्ट यूक्रेन को सहायता दे रहा है। सिस्को नाम की कंपनी ने यूक्रेन को साइबर सुरक्षा की ट्रेनिंग दी। इसके अलावा यूक्रेन के शिक्षा, रक्षा और अर्थव्यवस्था मंत्रालय पलान्टियर टेक्नोलॉजीज का इस्तेमाल करती हैं। 

कितना घातक हो सकता है डेटा सेंटर पर हमला?

आधुनिक समय में डेटा सेंटर किसी भी देश के दिल, दिमाग और धड़कन हैं। यहां पर ऐप और वेबसाइट का डेटा संग्रहित होता है। बैंकिंग सिस्टम भी इसी से जुड़ा होता है। सरकार से जुड़ा डेटा और संवेदनशील जानकारी एकत्रित होती है। अगर कोई देश अपने दुश्मन का डेटा सेंटर तबाह कर देती है तो उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। सेनाओं का आपसी संपर्क कट जाएगा। कमांड और कंट्रोल सिस्टम में भी रुकावट आएगी। दुश्मन के हमले का जवाब देने में समय लगेगा।  

 

ऑनलाइन सेवा और बैंकिंग सिस्टम बंद होने से जनता में अफरा-तफरी का माहौल पैदा होगा। डेटा सेंटरों में ही निगरानी डेटा, खुफिया जानकारी और साइबर ऑपरेशन कंट्रोल की जानकारी होती है। डेटा सेंटर पर एक भी हमला दुश्मन को अंधा और बहरा बना सकता है।