भारत के प्रधानमंत्री के आधिकारिक ऑफिस को लेकर दो बदलाव हो रहे हैं। पहला यह कि अब प्रधानमंत्री ऑफिस (PMO) का पता बदल रहा है और दूसरा कि इसका नाम भी बदल जाएगा। अब प्रधानमंत्री के कार्यालय को 'सेवा तीर्थ' कहा जाएगा। यह बदलाव सेंट्रल विस्टा रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत हो रहा है जिसमें नई संसद, कर्तव्य पथ, नए सचिवालय आदि का निर्माण शामिल है। इसी क्रम में कई मंत्रालयों के दफ्तर पहले ही बदल चुके हैं। अब कई मंत्रालयों के दफ्तर एक ही बिल्डिंग में शिफ्ट कर दिए गए हैं और इन बिल्डिंग का नाम कर्तव्य भवन रखा गया है। एक जैसी कई बिल्डिंग हैं इसलिए इनके नाम कर्तव्य भवन-1, कर्तव्य भवन-2 करके रखे गए हैं।

 

अगर आप कभी इंडिया गेट गए हों तो वहीं से एकदम सीध में राष्ट्रपति भवन दिखाई देता है। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक जाने वाली सड़क को अब कर्तव्य पथ कहा जाता है, जिसे पहले राज पथ कहा जाता था। 26 जनवरी को होने वाली परेड इसी सड़क पर होती है। जब आप इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन की ओर जाएं तो राष्ट्रपति भवन से ठीक पहले नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक आते हैं। अंग्रेजों के समय बनी इन्हीं इमारतों में कई अहम मंत्रालय दशकों से चलते रहे हैं। साउथ ब्लॉक की कई इमारतों में से एक अब तक प्रधानमंत्री के दफ्तर के तौर पर इस्तेमाल की जाती रही है। अब यही पता बदलने जा रहा है।

नया PMO कहां होगा?

 

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, प्लाट नंबर 36 और प्लॉट नंबर 38 को नए प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए चुना गया था। यह जगह साउथ ब्लॉक के ठीक बगल में ही है। इसके एक कोने पर उद्योग भवन मेट्रो स्टेशन पड़ता है। दूसरे कोने पर MR सुमन पार्क का गोल चक्कर पड़ता है। एक तरफ दारा शिकोह रोड, दूसरी तरफ मोतीलाल नेहरू रोड, तीसरी तरफ टू टू रोड और चौथी तरफ कामराज रोड है।

 

इस पूरे कैंपस को एग्जीक्यूटिव एनक्लेव नाम दिया गया है। इसमें प्रधानमंत्री के दफ्तर के अलावा, कैबिनेट सचिवालय और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सचिवालय भी होंगे। इन्हीं इमारतों का नाम सेवा तीर्थ-1, सेवा तीर्थ-2 और सेवा तीर्थ-3 रखा गया है। आपको बता दें कि आने वाले समय में प्रधानमंत्री आवास भी बदल जाएगा। मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री 7-लोक कल्याण मार्ग पर रहते हैं। अब नया प्रधानमंत्री आवास साउथ ब्लॉक के ठीक पीछे बन रहा है जो नए प्रधानमंत्री कार्यालय के बिल्कुल बगल में है। अभी प्रधानमंत्री आवास और प्रधानमंत्री कार्यालय एक-दूसरे से दूर हैं।

क्या है PMO का इतिहास?

 

जिस दफ्तर में मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री कार्यालय चल रहा है, वह बिल्डिंग यानी साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक साल 1931 में तब बने जब इस पूरे इलाके को विकसित किया गया था। हर्बर्ट बेकर और एडविन लुटियन्स ने इन इमारतों को डिजाइन किया था। इनमें छज्जे और जाली का बखूबी इस्तेमाल किया गया था। देश की आजादी के पहले जब राष्ट्रपति भवन वायसरॉय हाउस हुआ करता था, उस वक्त ब्रिटिश सरकार का कामकाज इन्हीं इमारतों से चला करता था।

 

देश को आजादी मिले तो सत्ता का केंद्र यही इलाका बना। वायसरॉय हाउस को राष्ट्रपति भवन में बदला गया और सारे मंत्रालयों के दफ्तर भी यहीं बनाए गए। तब प्रधानमंत्री सचिवालय (PMS) की स्थापना हुई। यह एक कम प्रभावी दफ्तर था, जिसमें प्रधानमंत्री के रोजमर्रा के कामकाज किए जाते थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू कैबिनेट सिस्टम पर ज्यादा भरोसा करते थे और इस PMS का इस्तेमाल बहुत कम ही करते थे। तब उनसे प्रमुख सचिव रहे HVR लेंगर और M O मथाई जैसे अफसर प्रभावी जरूर थे लेकिन वे सत्ता का केंद्र कभी नहीं बन पाए। वजह यह थी कि पंडित नेहरू इस PMS के अधिकारियों की बजाय अपनी कैबिनेट में शामिल नेताओं से सलाह लेते थे और उन्हीं से चर्चा करके काम भी करते थे।

साल 1964 में पंडित नेहरू की जगह लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने औपचारिक रूप से इस PMS को सरकार का हिस्सा बनाया। उन्होंने ही लक्ष्मीकांत झा को प्रधानमंत्री का सचिव बनाया जिससे PMS की ताकत में थोड़ा इजाफा हुआ। आगे चलकर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो इसी PMS में बैठने वाले पी एन हक्सर प्रमुख सचिव बने और वही बैंकों को नेशनलाइजेशन जैसे अहम मुद्दों पर काम करने लगे। यानी इस दफ्तर की ताकत और बढ़ गई।

PMS से PMO

 

जब जनता पार्टी की सरकार आई तो इस PMS का नाम बदलकर प्रधानमंत्री कार्यालय यानी PMO कर दिया गया। इंदिरा गांधी पर तानाशाही के आरोप लगाने वाली जनता पार्टी ने इस सत्ता केंद्र को कमजोर करने के लिए प्रमुख सचिव पद खत्म कर दिया और कैबिनेट सचिव पद बनाया। 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी हुई थो फिर से प्रमुख सचिव तैनात हो गए।

 

1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो PMO और ताकतवर हुआ। उस वक्त सैम पित्रोदा जैसे सलाहकार भी इसी दफ्तर से काम करने लगे थे। 1989 से 1998 के दौर में वी पी सिंह, एच जी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजरात ने नेहरू स्टाइल में काम किया और प्रधानमंत्री ऑफिस से फैसले लेने के बजाय कैबिनेट में फैसले लिए जाने लगे। 

 

अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में आए तो फिर से PMO ताकतवर हुआ। बृजेश मिश्रा को दोहरी भूमिका मिली। वही प्रमुख सचिव भी थे और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी थे। वह विदेश मामलों के साथ-साथ कारगिल युद्ध, डिप्लोमैटिक मामले और न्यूक्लियर प्रोजेक्ट तक का काम देखते थे।

 

मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो PMO में फैसले होते नहीं थे, इस दफ्तर का काम उन फैसलों को लागू करने का था। वजह यह थी कि मनमोहन सिंह अपनी पार्टी कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी और अन्य वरिष्ठ नेताओं की सलाह से सरकार चलाते थे। इसी वजह से उन पर रिमोट कंट्रोल से चलने के आरोप भी लगे।

मोदी सरकार में क्या बदला?

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सख्त फैसले लेने और बिना किसी लाग-लपेट के उन्हें लागू करवाने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद ज्यादातर मंत्रालय भी PMO को रिपोर्ट करने लगे। कई अहम मिशन भी PMO से संचालित होते हैं और कैबिनेट कमेटी की भूमिका बेहद कम हो गई है। मौजूदा वक्त में PMO के कई अफसर ऐसे हैं जो सरकार की दशा और दिशा तय करते हैं। जाहिर सी बात है कि वे ऐसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशों या सलाह के आधार पर ही करते हैं।