गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर कई वजहों से चर्चित रहा है। इसे कई शासकों ने तोड़ा, लूटा और बर्बाद किया। इसके बावजूद यह मंदिर हजारों साल के बाद भी विराजमान रहा। इसके इतिहास के साथ यह भी दर्ज हो गया है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कई वजहों के चलते इसको लेकर नाराज थे। जब उन्हें इस मंदिर के उद्घाटन समारोह का न्योता मिला तो उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस कार्यक्रम में जाने को राजी हो गए तो पंडित नेहरू उनसे भी नाराज हो गए। उनकी तमाम नाराजगी उनके पत्रों में दर्ज है। आज जब वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ पर महमूद गजनवी के हमले के 1000 साल पूरे होने पर एक लेख लिखा है तो यह मंदिर, पंडित नेहरू और इससे जुड़ा इतिहास एक बार फिर से चर्चा में आ गया है।
जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल फंड ने अपनी वेबसाइट नेहरू आर्काइव्स पर पंडित नेहरू के लिखे तमाम पत्रों को संजोया है। इसमें उस दौर की तमाम घटनाओं पर पंडिच नेहरू की लिखी राय दर्ज है। इन चिट्ठियों में यह साफ नजर आता है कि वह अपनी राय दर्ज कराने में हिचकते नहीं थे और अपने मंत्रियों से भी लिखित पत्राचार खूब करते थे। आइए पढ़ते हैं कि पंडित नेहरू ने उस वक्त सोमनाथ मंदिर को लेकर तमाम लोगों को लिखी चिट्ठी में क्या-क्या लिखा।
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साल 1950 में के एम मुंशी को लिखी चिट्ठी
पंडित नेहरू इस बात से भी नाराज थे कि उनकी ही सरकार के मंत्री और कई कांग्रेस नेता सोमनाथ मंदिर के निर्माण में सीधे तौर पर शामिल हो रहे थे। 8 मई 1950 को सोमनाथ मंदिर के फिर से निर्माण के लिए नींव रखी गई थी। 20 जुलाई 1950 को पंडित नेहरू ने अपनी ही सरकार के मंत्री के एम मुंशी को एक चिट्ठी में लिखा-
"प्रिय मुंशी, सोमनाथ मंदिर के फिर से निर्माण में आपकी संलिप्तता से मैं सहज नहीं हूं। सरकार के तौर पर हम किसी धर्म स्थल के निर्माण का काम नहीं कर सकते हैं। अगर हम एक बार ऐसा करते हैं तो हमसे अलग-अलग धर्मों के लिए ऐसा ही करने की मांग की जाएगी। देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति के हिसाब से ऐसे प्रोजेक्ट ठीक भी नहीं हैं।"
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राष्ट्रपति को लिखी चिट्ठी में क्या कहा?
इसी मामले में पंडित नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को एक चिट्ठी लिखी और नाराजगी जताई।
इस चिट्ठी में वह लिखते हैं-
"प्रिय राजेंद्र बाबू, 2 मार्च को लिखी आपकी चिट्ठी के लिए शुक्रिया। पिछले कुछ दिनों से मैं आपसे बात नहीं कर पा रहा हूं इसके लिए माफी चाहता हूं। मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि सोमनाथ मंदिर के कार्यक्रम में आपके जाने को लेकर मैं खुश नहीं हूं। यह सिर्फ एक मंदिर जाना भर नहीं है, यह एक ऐसे भव्य कार्यक्रम में शामिल होना है जिसके जाहिर तौर पर कई तरह के असर होंगे। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि यह ऐसा वक्त नहीं है कि सोमनाथ मंदिर का ऐसा भव्य निर्माण किया जाए। यह काम धीरे-धीरे और शायद और प्रभावी ढंग से आने वाले सालों में किया जा सकता है। हालांकि, अब यह हो ही गया है तो मेरा मानना है कि अगर आप इस कार्यक्रम की अध्यक्षता न करें तो बेहतर होगा।"

इस चिट्ठी का जवाब डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 10 मार्च को दिया इस चिट्ठी में उन्होंने पंडित नेहरू को लिखा-
'सोमनाथ मंदिर पूरी तरह से निजी सहयोग से बना हुआ है और इससे जुड़कर मैं कोई अभूतपूर्व काम नहीं कर रहा हूं। मैं समय-समय पर जिस तरह दूसरे धर्मस्थलों में जाता रहता हूं, वैसे ही यहां भी जा रहा हूं। मैं सोमनाथ मंदिर के कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता सिर्फ इसलिए नहीं ठुकरा सकता क्योंकि उसका काफी इतिहास रहा है और राज्य के राज प्रमुख ने इसका न्योता भेजा है।'
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13 मार्च को पंडित नेहरू ने फिर इस चिट्ठी का जवाब दिया-
'प्रिय राजेंद्र बाबू, देर से चिट्ठी का जवाब देने के लिए माफी चाहता हूं। इस बारे में मैं अपनी राय पहले ही बता चुका हैं। अगर फिर भी आपको लगता है कि न्योता अस्वीकार करना आपके लिए सही नहीं होगा तो मैं अब आगे कोई दबाव नहीं डालना चाहता।'

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जाम साहब को लिखी चिट्ठी
गुजरात की रियासत रहे जाम नगर के मुखिया रहे दिग्विजय सिंह ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में शामिल होने के लिए देश की तमाम हस्तियों को चिट्ठी लिखी थी। मई 1951 में होने वाले इस कार्यक्रम के लिए 22 अप्रैल 1951 को जाम साहब ने पंडित नेहरू को चिट्ठी लिखी। पंडित नेहरू ने 24 अप्रैल 1951 को दिए गए अपने जवाब में लिखा-
"प्रिय जाम साहब, आपने सोमनाथ मंदिर के कार्यक्रम में शामिल होने के न्योते वाली जो चिट्ठी 22 अप्रैल को लिखी है उसके लिए शुक्रिया है। हालांकि, मेरे लिए इस संवेदनशील स्थिति में किसी भी कार्यक्रम के लिए दिल्ली छोड़ना संभव नहीं है। इसके इतर इस कार्यक्रम के बारे में मैं आपके सामने अपनी स्पष्ट राय भी रखना चाहूंगा। मैं पहले भी आपको इस बारे में लिख चुका हूं। मुझे इस तरह के नवजागरणवाद और इस तथ्य से बहुत परेशानी है कि हमारे राष्ट्रपति, कुछ मंत्री और राजप्रमुख के रूप में आप इस कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं। मेरी राय में यह राज्य के नेचर के हिसाब से सही नहीं है और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके परिणाम बुरे होंगे। व्यक्तिगत तौर पर तो हर किसी को ऐसे मामले में अपनी-अपनी आजादी है ही लेकिन हम में से बहुत सारे लोग सिर्फ एक व्यक्ति नहीं हैं और हम अपने जन प्रतिनिधित्व को इससे अलग नहीं कर सकते हैं।"

हालांकि, पंडित नेहरू भले ही प्रधानमंत्री थे लेकिन उनके विरोध का असर नहीं हुआ। 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर का भव्य उद्घाटन समारोह हुआ। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इस कार्यक्रम में भाषण देते हुए उन्होंने कहा, 'जब भी मुझे मौका मिलता है, मैं एक जैसी भावना लेकर दरगाह भी जाता हूं, मस्जिद भी जाता हूं, चर्च भी जाता और गुरुद्वारा भी जाता हूं। इस मंदिर को जीर्णोद्धार के काम की शुरुआत सरदार वल्लभ भाई पटेल ने की थी और उन्होंने देश को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। भगवान की कृपा से कुछ हद तक आज सरदार पटेल का यह सपना पूरा हुआ है।'
