हर साल 22 अप्रैल को पूरी दुनिया पृथ्वी दिवस यानी अर्थ डे मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को हमारे ग्रह की रक्षा के महत्व के बारे में जागरूक करना है। पहली बार अर्थ डे 1970 में मनाया गया था और तब से यह दिन हर साल पर्यावरण सरंक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण आंदोलन बन गया। हर साल पूरी दुनिया में इस दिन को बड़े स्तर पर मनाया जाता और जागरूकता अभियान चलाया जाता है। पर्यावरण पर बढ़ते खतरों को देखते हुए यह दिन साल दर साल और भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है और हमें याद दिलाता है कि हमें अपनी पृथ्वी को बचाकर रखना है।
इस साल का थीम 'अवर पावर, अवर प्लैनेट' है यानी हमरा ग्रह (पृथ्वी) ही हमारी शक्ति है। यह थीम संदेश देता है कि हमारे पास वह शक्ति है जिससे हम अपनी धरती को फिर से हरा-भरा और खुशहाल बना सकते हैं। 'अवर पावर, अवर प्लैनेट' थीम के साथ इस साल पूरी दुनिया में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। इसका मुख्य लक्ष्य रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़वा देना है, जिससे 20230 तक दुनिया भर में स्वच्छ बिजली के उत्पादन को तीन गुना तक बढ़ाया जा सके।
यह भी पढ़ें: 26 लाशें, ऑपरेशन सिंदूर और महादेव, पहलगाम का जख्म याद है?
क्या है इस दिन का इतिहास?
अर्थ डे की शुरुआत 1962 में हुई, जब रेचल कार्सन की मशहूर किताब 'साइलेंट सप्रिंग' पब्लिश हुई थी। इस किताब ने पर्यावरण प्रदूषण और उसके मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले खतरनाक प्रभावों को उजागर किया, जिससे लोगों में जागरूकता बढ़ी। 1969 में अमेरिका में तेल रिसाव की घटना के बाद पर्यावरण को बचाने पर लोगों का ध्यान गया। इसको लेकर अमेरिकी सीनेटर गेइलॉर्ड नेल्सन ने पर्यावरण जागरूकता के लिए एक बड़ा अभियान शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने लोगों को साफ हवा, पानी और मिट्टी के लिए एकजुट करने की कोशिश की।
22 अप्रैल ही क्यों?
इसी कड़ी में 22 अप्रैल 1970 को पहला अर्थ डे मनाया गया, जिसमें 2 करोड़ से ज्यादा अमेरिकियों ने हिस्सा लिया। एक घटना से और विचार से शुरू हुआ आंदोलन बड़े पर्यावरण आंदोलन का रूप ले चुका था। वर्ल्ड अर्थ डे के लिए 22 अप्रैल के दिन को चुनने के पीछे भी एक खास वजह है। यह दिन अमेरिका में कॉलेज के स्प्रिंग ब्रेक और फाइनल परीक्षा के बीच पड़ता था। उस समय आंदोलन में ज्यादा से ज्यादा छात्रों को शामिल करने के लिए इस दिन को पर्यावरण दिवस के रूप में चुना गया।
क्यों होता जा रहा महत्वपूर्ण?
अमेरिका से शुरू होकर आज अर्थ डे पूरी दुनिया में मनाया जा रहा है। इसके पीछे के कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं। जिस धरती पर हम रह रहे हैं उस धरती पर हमारी आने वाली पीढ़ियों का रहना मुश्किल हो सकता है। वैज्ञानिकों की ओर से जारी डेटा इसी और संकेत करता है।
यह भी पढ़ें: 'गेट आउट', BJP मंत्री सड़क पर कर रहे थे प्रदर्शन, गुस्साई महिला ने लगा दी क्लास
पिछले 10 साल में अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा गर्मी पड़ी है। इस समस्या को हम ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं और यह आज के समय की सबसे बड़ी ग्लोबल समस्या बनती जा रही है। इसके अलावा समंदर हमारी पृथ्वी का एक अहम हिस्सा हैं लेकिन समंदर में प्लास्टिक बढ़ता जा रहा है। हर साल करीब 80 लाख टन कचरा समंदर को प्रदूषित कर रहा है।
अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ इतनी तेजी से पिघल रही है कि समुद्र का जलस्तर हर साल औसतन 3.5 मिलीमीटर बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा असर समुद्र के किनारे बसी दुनिया पर पड़ने वाला है। मुंबई जैसे कई शहर आने वाले सालों में डूब सकते हैं।
दिल्ली के प्रदूषण के बारे में तो हम सब जानते हैं लेकिन इसके दूरगामी परिणामों के बारे में सचेत नहीं हैं। WHO के मुताबिक दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जो हेल्थ के लिए खतरनाक है। हर साल हजारों लोगों की मौत का कारण खराब हवा बन रही है।
इतना ही नहीं हमारी मिट्टी प्रदूषित हो रही है। पीने का पानी प्रदूषित हो गया है और भूजल खत्म हो रहा है। जंगल कम हो रहे हैं और भी बहुत बड़े खतरे मानव सभ्यता के सामने खड़े हैं। इन सभी खतरों का एक ही समाधान है कि विकास की दौड़ में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के क्रम को रोका जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले सालों में इस धरती पर मानव का रहना मुश्किल हो जाएगा।
