होली के अलग-अलग रंगों की तरह ही देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से होली मनाई जाती है। हरियाणा में ज्यादातर हिस्से में कोड़ा मार होली होती है। होली के दिन भाभी कोड़ों से अपने देवरों की पीटती हैं और देवर भाभी पर रंग और पानी फेंकते हैं। भीगे हुए कपड़े से बना कोड़ा काफी मजबूत होता है। इसकी काफी वीडियो भी आपको सोशल मीडिया पर दिखाई दे जाएंगे लेकिन हरियाणा के पंचकूला में स्थित शिवालिक हिल्स (मोरनी हिल्स) के गांवों में इससे बिल्कुल अलग तरह से होली मनाई जाती है।
मोरनी हिल्स हरियाणा के पंचकूला जिले में स्थित राज्य का एकमात्र हिल स्टेशन है। यह चंडीगढ़ और पंचकूला शहर से करीब 1 घंटे की दूरी पर स्थित है। यह हिल स्टेशन प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों, और झीलों के लिए प्रसिद्ध है और इन पहाड़ों की ऊंचाई लगभग 1220 मीटर है। इसकी सीमा हिमाचल के सिरमौर जिले से लगती हैं। इसलिए इस इलाके में हिमाचल और हरियाणा का मिला झूला रूप देखने को मिलता है। चहल-पहल से दूर हरियाणा में स्थित इन पहाड़ों की होली पूरे हरियाणा से अलग है।
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गांवों में कैसे मनाई जाती है होली?
मोरनी हिल्स में सैंकड़ों छोटे-छोटे गांव स्थित हैं। गांवों की आबादी बहुत कम है इसलिए यहां भीड़ में होली मनाने का चलन नहीं है। होलिका दहन के दिन इन गांवों में सूखी होली मनाई जाती है। यानी इस दिन कोई भी एक-दूसरे पर पानी में रंग मिलाकर नहीं डालेगा। इस दिन एक दूसरे पर रंग लगाकर होली की बधाई देते हैं। इसके अलगे दिन गांवों में होली का अलग ही माहौल होता है। बच्चे तो सुबह से अपनी पिचकारियां लेकर पानी और रंगों से खेलने लगते हैं। कुछ देर में बड़े भी इसमें शामिल हो जाते हैं और एक दूसरे पर रंगों को पानी में मिलाकर डालते हैं।
देवर-भाभी का त्योहार
होली को खासकर देवर-भाभी के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। मोरनी के गांवों में भी इस दिन देवर और भाभी होली खेलते हैं। एक दूसरे को रंग लगाना और रंग लगे पानी को एक दूसरे के ऊपर डाला जाता है। गांवों की आबादी छोटी होने के कारण यह त्योहार सिर्फ अपने ही गांव तक सीमित नहीं रहता है। आपपास के गांवों में भी लोग जाते हैं और होली खेलते हैं। इस दौरान देवर-भाभी के बीच मजाक और रंग से बचने की कोशिशें होती हैं।
देवर भाभी के साथ-साथ जीजा साली भी इस त्योहार पर एक दूसरे को रंग लगाते हैं। सबसे ज्यादा मजा तो किसी व्यक्ति को जाल बिछाकर फंसाने में आता है। अगर कोई व्यक्ति रंग से बचने की कोशिश करता है तो उसके लिए किसी एक निर्धारित जगह पर इंतजार किया जाता है। किसी बहाने से उसे बुलाया जाता है और फिर ऐसा हाल कर दिया जाता है कि दूसरी बार वह चुपचाप होली खेलने आ जाए। कुछ घरों में होम थिएटर पर गाने बजते हैं जहां सारे लोग इकट्ठा होकर डांस करते हैं।
लोग टोलियां बनाकर आसपास के सभी गांवों में घूमते हैं। होली खेलते हैं, बधाई देते हैं और एक दूसरे के हाल-चाल जानते हैं। जिस गांव में जाते हैं वहां चाय-नाश्ता या मिठाई खाकर दूसरे गांव की तरफ निकल जाते हैं। इस तरह अपने आसपास के सभी गांवों में लोग घूमते हैं। घूमते-घूमते काफिले में और ज्यादा लोग जुड़ते जाते हैं। कुछ लोग मोटरसाइकिल पर तो कुछ लोग पहाड़ी रास्तों से पैदल एक गांव से दूसरे गांव जाते हैं।
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शहर से दूर शांत होली
मोरनी चंडीगढ़ और पंचकूला जैसे शहरों से कुछ ही दूरी पर स्थित है। ऐसे में होली के दिन कई लोग यहां अपने परिवार और दोस्तों के साथ होली मनाने आते हैं। यहां छोटे-छोटे होटल बने हैं जिनमें लोग आकर होली पर रूकते हैं और होली मनाते हैं। इसके अलावा पहाड़ों पर कई जगह लोग इकट्ठा होते हैं और होली का जश्न मनाते हैं। टिक्करताल जैसे टूरिस्ट प्लेस पर तो डीजे और रंगों का इंतजाम भी होता है। लोग यहां आते हैं और पहाड़ों की ऊंचाई पर रंगों से खेलते हैं और नाचते गाते हैं।
हालांकि, होली के दिन पंचकूला और चंडीगढ़ से कुछ पर्यटक आकर माहौल भी खराब कर देते हैं।
