पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी का जनाधार, अपनी ही पार्टी में खिसकता जा रहा है। जिस तृणमूल कांग्रेस की नींव उन्होंने 1 जनवरी 1998 को रखी थी, वह अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पश्चिम बंगाल में हुए हालिया विधानसभा चुनावों में 80 विधानसभा सीटें जीतने के बाद भी उनके पास 21 विधायक भी नहीं बचे।

ममता बनर्जी की पार्टी, विधानसभा में टूट गई है। तृणमूल कांग्रेस के निकाले गए नेता ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी पर कब्जा जमा लिया है। 58 विधायकों के साथ वह ममता बनर्जी पर उनकी ही पार्टी में भारी पड़ गए हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी से बगावत कर अपने लिए विधानसभा में नेता विपक्षी की भूमिका स्वीकारी है। उनकी की पसंद शोभन भट्टाचार्य थे लेकिन उन्हें, तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने ही स्वीकार नहीं।

यह भी पढ़ें: 'सर कटेगा लेकिन झुकेगा नहीं', TMC की बागी सांसद ने ममता बनर्जी के लिए क्या कहा?

ममता बनर्जी के अपने ही उनकी नहीं सुन रहे 

चुने गए विधायकों में फूट पड़ी, ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर चर्चा के लिए अपने घर जीते हुए तृणमूल कांग्रेस के विधायकों में 8 विधायक भी नहीं पहुंचे थे। ममता बनर्जी की यह सियासी मुश्किल और बढ़ने वाली है। अब राज्यसभा और लोकसभा के 20 से ज्यादा सांसद, पार्टी में अलग धड़ा बना रहे हैं। ममता बनर्जी की बात न तो उनके विधायक मान रहे हैं, न ही सांसद मान रहे हैं।

ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी में दरकिनार

तृणमूल कांग्रेस में गहरा संकट पैदा हो गया है। विद्रोही सांसदों का कहना है कि पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद अब अलग ब्लॉक बना चुके हैं और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ जुड़ने वाले हैं। विद्रोह की अगुवाई कर रही काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि 20 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को चिट्ठी लिखकर अलग सीट करने की मांग की है। विद्रोही सांसदों का कहना है कि यह ब्लॉक एनडीए का समर्थन करेगा और बंगाल के विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकार के साथ काम करेगा। 

यह भी पढ़ें: 'इस्तीफा दो, BJP के टिकट पर लड़कर दिखाओ', TMC के बागियों पर भड़कीं महुआ मोइत्रा

TMC की नई आफत आई कैसे?

सोमवार को 14 विद्रोही केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पहुंचे। वहां पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। 8 बागी सांसदों ने शताब्दी रॉय के घर पर बैठक की। विद्रोहियों की सूची में काकोली घोष दस्तीदार, सताब्दी रॉय, देव, शर्मिला सरकार समेत कई नाम शामिल हैं। उन्होंने दावा किया कि 6 और सांसद उनके साथ हैं। एंटी-डिफेक्शन कानून से बचने के लिए उन्हें कम से कम 19 सांसदों की जरूरत है।

इस्तीफों से भी परेशान हैं ममता बनर्जी

TMC के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी में लंबे समय से खराब स्थिति बनी हुई थी। ममता बनर्जी के करीबी लोगों ने बागी गुट के दावे को खारिज किया। उन्होंने कहा कि केवल 12-13 सांसद ही उनके साथ गए हैं, 20 नहीं। 

महुआ मोइत्रा ने विद्रोहियों से इस्तीफा देकर बीजेपी टिकट पर चुनाव लड़ने की चुनौती दी है। यह घटना ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका है। पिछले महीने विधानसभा चुनाव हारने के बाद टीएमसी में बगावत तेज हो गई थी। अब लोकसभा में भी पार्टी टूटने की कगार पर है।

यह भी पढ़ें: 'हम 20 सांसद NDA के साथ', काकोली घोष ने कर दिया TMC में टूट का एलान

पार्टी में विद्रोह को संभालने की कोशिश ममता ने कैसे की?

ममता बनर्जी ने पार्टी संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत करने और असंतोष को दबाने के लिए हाल ही में टीएमसी के संगठनात्मक स्तर पर कुछ बड़े फेरबदल किए हैं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के पुराने चेहरों को संगठन में ज्यादा तरजीह दी है, अभिषेक बनर्जी का पद बरकरार है लेकिन प्रतीकात्मक तौर पर कुछ बदलाव भी हुए हैं। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पार्टी में बड़े संगठनात्मक बदलाव किए हैं।

लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद उन्होंने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव पद पर बरकरार रखा, लेकिन उनकी शक्तियां सीमित कर दीं। अब डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को संयुक्त महासचिव बनाया गया है।डोला सेन को ममता की सबसे करीबी मानी जाती हैं। अभिषेक बनर्जी के वफादार त्रिनांकुर भट्टाचार्य को छात्र विंग तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। उनकी जगह प्रियंका अधिकारी को नियुक्त किया गया। ऐसा माना जा रहा है कि इससे अभिषेक बनर्जी के एकाधिकार को खत्म किया गया है, पार्टी में कुछ और लोगों को ताकत दी गई है। 

यह भी पढ़ें: INDIA गठबंधन की मीटिंग में गईं ममता, इधर TMC के राज्यसभा सांसद ने दिया इस्तीफा

फेल क्यों हो गईं ममता बनर्जी?

अभिषेक बनर्जी के खिलाफ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में भीषण असंतोष है। वह पुराने चेहरों को दरकिनार कर रहीं हैं और अभिषेक बनर्जी को ज्यादा ताकत दे बैठी हैं। पार्टी के सांसदों को सबसे ज्यादा ऐतराज इसी बात का है। उन्होंने कई पुराने चेहरों को दरकिनार कर नए और वफादार नेताओं को आगे बढ़ाया है, जिसे लेकर अंसतोष बढ़ता गया। जब तक सत्ता थी, पार्टी के भीतर असंतोष दबा रहा, अब बगावत बाहर आ रही है। अब तृणमूल कांग्रेस में स्थितियां संभल नहीं रहीं हैं।