अजित पवार 28 जनवरी, 2026 तक महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री (Maharashtra Deputy CM) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर आसीन थे, लेकिन इसी दिन सुबह 8:45 बजे हुए विमान दुर्घटना में उनकी दर्दनाक मौत हो गई। इसके अलावा विमान में सवार चार और लोगों की मौत हो गई। इस दुर्घटना से देश के पूरे राजनीति बिरादरी को सन्न करके रख दिया। अजित पवार असमय और आकस्मिक निधन के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
ऐसे में महाराष्ट्र की सियासत से अजित पवार अचानक से अलविदा कहना सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि राज्य में सत्तारूढ़ महायुति के पावर संतुलन में बड़ा बदलाव है। उनकी राज्य की राजनीति में कितनी अहमियत थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गृह मंत्री अमित और बीजेपी अध्यक्ष खुद पवार के अंतिम संस्कार में पहुंचे और वहां समय बिताया।
फडणवीस ने अपना दोस्त खोया
अजित पवार की मौत के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, 'व्यक्तिगत तौर पर मैंने अपना बेहद करीबी दमदार और बड़े दिल वाले दोस्त को खो दिया। दादा हमेशा में मेरे सच्चे मित्र रहे। हमने बहुत करीबी तालमेल के साथ काम किया।' फडणवीस का यह बयान अजित पवार के प्रति उनके सम्मान और उनकी अहमियत को दर्शा रहे हैं। मगर इस हादसे के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि 'अजित पवार' के बिना महायुति (BJP-Shiv Sena-NCP) का भविष्य कैसा रहेगा?
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फडणवीस-पवार का मजबूत रिश्ता
दरअसल, अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस के बीच रिश्ते 2019 की उस सुबह से प्रगाड़ हो गए थे, जब दोनों ने उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। हालांकि, यह सरकार 72 घंटों में ही गिर गई और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में नई सरकार बनी। बाद में अजित पवार ठाकरे सरकार में उपमुख्मंत्री बने। मगर, इसके बाद भी फडणवीस और पवार के रिश्तों में कड़वाहट नहीं आई, बल्कि यह रिश्ता समय के साथ और मजबूत होता गया।
यही वजह है कि फडणवीस ने पवार के लिए भावुक शब्दों का प्रयोग किया। इसके अलावा साल 2023 में जब अजित पवार ने शरद पवार से बगावत करके सरकार का साथ दिया, तो सीएम फडणवीस को एक ऐसा रणनीतिकार मिला जो एकनाथ शिंदे जैसे सख्त मोलभाव करने वाले नेता को नियंत्रित रख सके।
अजित पवार की खासियत
अजित पवार महाराष्ट्र में 'दादा' के नाम से मशहूर थे। वह सांप्रदायिक राजनीति से कोसों दूरी बनाकर रहते थे। बीजेपी-शिवसेना जैसी दो कट्टर हिंदुत्व की पार्टियों के बीच भी उन्होंने अपनी धर्मनिर्पेक्षता बचाकर रखी हुई थी। उनकी बड़ी खासियत थी कि वे वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर काम करने वाले नेता थे। अजित पवार बीजेपी, कांग्रेस और शिवसेना, तीनों के साथ सत्ता में काम कर चुके थे। ऐसे में वह देवेंद्र फडणवीस के लिए एक पुल की रह काम करने वाले सहयोगी थे। फडणवीस उनपर भरोसा भी करते थे।
पवार ने फडणवीस का दबाव कम किया
दरअसल, 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी-शिवसेना-एनसीपी ने 'महायुति' के बैनर तले एक साथ चुनाव लड़ा। महायुति ने महाविकास अघाड़ी (कांग्रेस-शिवसेना (UBT)- एनसीपी, शरद पवार) हरा दिया। महायुति को चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन बाद में मुख्यमंत्री पद को लेकर तनाव खुलकर सामने आ गया। एकनाथ शिंदे चुनाव तक मुख्यमंत्री थे, मगर चुनाव में बीजेपी 132 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी थी, ऐसे में एकनाथ शिंदे ने 57 सीटें जीतकर एक बार फिर से मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी ठोंकी। शिंदे ने फडणवीस के सामने कड़ा रुख अपनाया।
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यही वह समय था जब सत्ता में भारीदारी को लेकर फडणवीस, शिंदे और अजित पवार ने एक साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की। मुख्यमंत्री को लेकर अभी भी नाम तय नहीं था, क्योंकि शिंदे दबाव बना रहे थे। ऐसे में अजित पवार ने संकट के समय आगे आकर बिना शर्त अपने 41 विधायकों का बीजेपी को समर्थन दिया, जिससे बीजेपी-एनसीपी सरकार बनाने का आंकड़ा पार कर गए। यह स्थिती बनते ही एकनाथ शिंदे को मजबूरन मुख्यमंत्री पद की जिद छोड़कर उपमुख्यमंत्री पद स्वीकारना पड़ा। आखिरकार दो हफ्ते बाद फडणवीस ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर पद की शपथ ली।
फडणवीस के सामने मजबूत होंगे शिंदे?
अजित पवार की मौजूदगी से देवेंद्र फडणवीस सरकार में संतुलन बना रहता था और गठबंधन के भीतर संवाद आसान होता था। इनके रहने से एकनाथ शिंदे कभी भी बीजेपी और फडणवीस पर हावी नहीं हो पाते थे। अजित पवार के निधन के बाद महायुति में एनसीपी का ऐसा कोई सर्वमान्य और मजबूत नेता नहीं बचा, जो बीजेपी के लिए संतुलन वाली भूमिका निभा सके। ऐसे में फडणवीस को अब एकनाथ शिंदे से सीधे और अकेले निपटना होगा। माना जा रहा है कि शिंदे की सौदेबाजी की ताकत समय के साथ मजबूत होगी। यही नहीं अजित पवार के बिना महायुति में अब एकनाथ शिंदे की आवाज मजबूत होगी।
