चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हुए। नतीजे आए तो सबसे ज्यादा खुशी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को हुई। बीजेपी असम में अपनी सरकार बचाने में कामयाब रही। केरल में उसके तीन विधायक जीते, पुडुचेरी में सरकार बरकरार रही और पश्चिम बंगाल में उसने इतिहास रच दिया। इसी तरह केरल की सत्ता में वापसी कर पाने में सफल रही कांग्रेस भी खुश है। कांग्रेस की खुशी की एक छुपी वजह ममता बनर्जी की हार भी बताई जा रही है। लंबे समय से जो काम कांग्रेस नहीं कर पा रही थी वह बीजेपी ने कर दिखाया। बीते कुछ साल में कमोबेश ऐसा ही कुछ ओडिशा और दिल्ली में भी हो चुका है। माना जा रहा है कि इसे कांग्रेस इस तरह से देख रही है कि आने वाले समय में क्षेत्रीय दल सीमित हो जाएंगे और इसका फायदा उसे ही होगा।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्य ऐसे ही हैं जहां बीजेपी और कांग्रेस का मुकाबला होता है और कई राज्यों में कांग्रेस जीतती भी रही है। इसके उलट, पश्चिम बंगाल, झारखंड, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य ऐसे हो गए हैं जहां क्षेत्रीय दल मजबूत हुए तो कांग्रेस लगभग खत्म सी हो गई। मौजूदा वक्त में बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस बेहद कमजोर स्थिति में है। वहीं, झारखंड में वह जूनियर पार्टनर बनकर रह गई है।
केजरीवाल, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक की हार में कांग्रेस का फायदा?
दिल्ली में लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार थी लेकिन अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के उदय ने कांग्रेस को दिल्ली में लगभग खत्म सा कर दिया। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस दिल्ली की एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत पाई है। इसका प्रमुख कारण रहा कि लड़ाई ही AAP और बीजेपी के बीच हो गई थी। ऐसे में अरविंद केजरीवाल की हार से सबसे ज्यादा खुश कांग्रेस को हुई। 2025 के चुनाव में तो कई सीटों पर ऐसा भी देखा गया जहां कांग्रेस को मिले वोटों के चलते AAP को हार मिली।
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इसी तरह ओडिशा में लंबे समय से कांग्रेस सत्ता से बाहर चल रही थी। 25 साल से ओडिशा की सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस कई बार कोशिश कर चुकी लेकिन नवीन पटनायक के आगे उसकी एक नहीं चली। 2024 में नवीन पटनायक की हार के साथ एक और छत्रप का काम लगभग तमाम हो गया। नवीन पटनायक की बढ़ती उम्र और बिखरते बीजू जनता दल (बीजेडी) को देखकर कांग्रेस ने ओडिशा में खुद को मजबूत करने की दिशा में काम शुरू कर दिया है। कांग्रेस को उम्मीद है कि अगले चुनाव में उसका मुकाबला बीजेपी से सीधे तौर पर होगा और त्रिकोणीय चुनाव न होने की स्थिति में उसे फायदा हो सकता है।
पश्चिम बंगाल का हाल भी कमोबेश ऐसा ही रहा है। 1977 में सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार के बाद से अब तक कांग्रेस पार्टी कभी भी पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज नहीं हो पाई। ममता बनर्जी के उदय के बाद तो कांग्रेस के और बुरे दिन आ गए। तमाम कोशिशों और गठबंधनों के बावजूद कांग्रेस पार्टी ममता बनर्जी को नहीं हरा पाई। हालांकि, अब बीजेपी की जीत के बाद कांग्रेस को उम्मीद है कि टीएमसी कमजोर पड़ेगी और इस खाली जगह को वह भर पाएगी।
सिर्फ रास्ता साफ होने से काम चलेगा?
जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों की हार हुई है वहां कांग्रेस के लिए मौका जरूर है लेकिन उन राज्यों में बीजेपी को चुनौती देने क लिए उसे बहुत मेहनत करनी होगी। दिल्ली में AAP की हार के बावजूद वही मुख्य विपक्षी है और कांग्रेस अभी भी मजबूत स्थिति में नहीं दिखती। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अभी भी सपा के पीछे चलने को मजबूर है। तेलंगाना में बीआरएस की हार का फायदा जरूर कांग्रेस को मिला है लेकिन यहां उसने खुद सीधी जीत हासिल की है। इसी तरह केरल में भी कांग्रेस ने खुद ही लेफ्ट को हराकर जीत हासिल की है और सत्ता में वापसी की है।
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अब पंजाब में कांग्रेस के पास मौका है कि वह खुद को मजबूत करे और AAP को हरा सके। इसकी वजह यह है कि कांग्रेस का संगठन पंजाब में काफी मजबूत रहा है और इस राज्य में उसकी संभावनाएं भी बेहतर हैं। इसी तरह बंगाल, बिहार, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी कांग्रेस के पास भरपूर समय है कि वह संगठन के स्तर पर खुद को मजबूत करे और कम से कम प्रमुख विपक्षी दल की स्थिति में आने की कोशिश करे।
अगर इन राज्यों में कांग्रेस खुद को मजबूत कर पाती है तो 2029 या फिर 2034 के लोकसभा चुनाव में भी वह बीजेपी को सीधी चुनौती देने में सक्षम होगी और लोकसभा में उसकी स्थिति ऐसी बन सकती है कि बाकी के क्षेत्रीय दल उसके साथ चलने को मजबूर हों।
