हिन्दू धर्म में कई भक्तों का मानना है कि भगवान की भक्ति सिर्फ घोर तपस्या के जरिए ही की जा सकती है, जबकि सनातन धर्म में भक्ति को लेकर अलग बातें बताई गई हैं। हिन्दू धर्म के कुछ ग्रंथों में 9 प्रकार की भक्ति परंपरा का उल्लेख मिलता है। शिव पुराण में बताया गया है कि जो भक्त सच्चे मन से शिव की भक्ति करता है, उसे भगवान शिव का आशीर्वाद अवश्य मिलता है। इसी वजह से 9 प्रकार की भक्ति परंपरा बताई गई है। इस प्रकार की भक्ति को नवधा भक्ति परंपरा कहा जाता है। शिव पुराण के अलावा विष्णु पुराण में भी नवधा भक्ति परंपरा का वर्णन मिलता है।

 

सनातन धर्म में देवी-देवताओं की आराधना और भक्ति का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भक्तों की भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। अब सवाल उठता है कि शिव पुराण और विष्णु पुराण में बताई गई नवधा भक्ति परंपरा क्या है?

 

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क्या है नवधा भक्ति परंपरा?

 

सतयुग में सबसे पहले विष्णु पुराण में नवधा भक्ति का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण के एक प्रसंग के अनुसार, जब हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद के बीच संवाद हो रहा था, तब प्रह्लाद ने भक्ति के बारे में महत्वपूर्ण बातें बताईं। उन्होंने कहा

 

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥

 

इसका मतलब है कि श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन ये नौ प्रकार की भक्ति हैं। इसी प्रकार शिव पुराण में भी कहा गया है कि शिव भक्ति करने के लिए भक्तों को कठोर तपस्या करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय नवधा भक्ति परंपरा को अपनाकर भी भगवान शिव की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

 

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9 प्रकार की भक्ति परंपरा कैसे निभाएं?

 

1. श्रवण भक्ति - इसका अर्थ है कि भक्तों को धार्मिक ग्रंथों का श्रवण और अध्ययन करना चाहिए। इससे धर्म और भगवान के प्रति जुड़ाव बढ़ता है तथा मन को शांति मिलती है।

2. स्मरण भक्ति - जो भक्त सुख और दुख, दोनों परिस्थितियों में हर समय भगवान को याद करता है, वही स्मरण भक्ति कहलाती है।

3. कीर्तन भक्ति - इस प्रकार की भक्ति में मंत्र जाप, भजन-कीर्तन और भगवान की आरती करना शामिल है।

4. वंदन भक्ति - इसका अर्थ है भगवान को सच्चे मन से प्रणाम करना। भक्तों को प्रतिदिन सुबह और शाम भगवान की वंदना करनी चाहिए।

5. अर्चन भक्ति - भक्तों को प्रतिदिन भगवान को फूल, फल और प्रसाद अर्पित कर श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए।

 

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6. सख्य भक्ति - भगवान को अपना सबसे प्रिय मित्र मानकर अपने मन की हर बात उनसे कहना सख्य भक्ति कहलाती है।

7. दास्य भक्ति - इसमें भक्त स्वयं को भगवान का सेवक और भगवान को अपना स्वामी मानकर उनकी सेवा और पूजा करता है।

8. पादसेवन भक्ति -इसका अर्थ है भगवान के चरणों में स्वयं को समर्पित करना। यह समर्पण पूरी तरह निस्वार्थ होना चाहिए।

9. आत्मनिवेदन भक्ति - भगवान के सामने अपना सब कुछ समर्पित कर देना या स्वयं को पूर्ण रूप से उनके प्रति अर्पित कर देना ही आत्मनिवेदन भक्ति है। धार्मिक ग्रंथों में कीर्तन और श्रवण भक्ति को सबसे श्रेष्ठ भक्ति परंपराओं में माना गया है।