हर व्यक्ति अपने जीवन में एक न एक बार किसी न किसी परिस्थिति में असमंजस महसूस करता है। असमंजस एक ऐसा भाव है, जिसमें व्यक्ति को दो चीजों में से एक को चुनने में कठिनाई होती है। व्यक्ति अक्सर असमंजस की वजह से अशांत और चिंता में रहता है। इसी कारण लोग मन की शांति के लिए असमंजस से दूर होने की कोशिश करते हैं। इस असमंजस को भगवद्गीता के जरिए समझा जा सकता है। भगवद्गीता के उपदेश न केवल यह बताते हैं कि असमंजस क्यों होता है बल्कि यह भी समझाते हैं कि व्यक्ति इससे मुक्ति कैसे पा सकता है।
सनातन धर्म में भगवद्गीता बेहद खास ग्रंथ है, जिसमें व्यक्ति के जीवन से जुड़े हर सवाल का जवाब मिलता है। इस धर्म ग्रंथ में महाभारत के प्रसंगों के साथ खास तौर पर भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का वर्णन किया गया है। भगवद्गीता में बताया गया है कि पांडव पुत्र अर्जुन भी असमंजस से जूझ चुके थे। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें ऐसे उपदेश दिए, जिन्हें सुनकर अर्जुन का असमंजस के प्रति नजरिया ही बदल गया।
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क्यों होता है असमंजस ?
भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 62 और 63 में व्यक्ति के असमंजस भाव के बारे में बताया गया है। इसमें कहा गया है कि व्यक्ति को जीवन में किसी एक चीज को चुनने में तब समस्या आती है, जब उसे चीजों से अत्यधिक लगाव हो जाता है। इसी वजह से व्यक्ति सही चुनाव नहीं कर पाता है।
श्लोक 62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
श्लोक 63
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
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इन दोनों श्लोकों का अर्थ है कि व्यक्ति को असमंजस क्रोध और मोह की वजह से होता है। जब किसी चीज से जरूरत से ज्यादा लगाव हो जाता है, तो व्यक्ति की बुद्धि प्रभावित होने लगती है। बुद्धि के पतन के सात चरण बताए गए हैं, जिनके परिणामस्वरूप व्यक्ति का पतन भी हो सकता है। अब सवाल उठता है कि असमंजस के ये 7 चरण क्या हैं?
असमंजस के 7 चरण
भगवद्गीता के मुताबिक, श्रीकृष्ण ने बताया है कि असमंजस की स्थिति व्यक्ति के पतन का कारण बन सकती है। असमंजस की शुरुआत किसी विषय को चुनने में समस्या से होती है, जो आगे चलकर आसक्ति, कामना, क्रोध, भ्रम और बुद्धिनाश में बदल जाती है। आइए समझते हैं हर चरण क्या कहता है।
1. बार-बार सोचना - जब व्यक्ति किसी भोग-विलास की वस्तु के बारे में बार-बार सोचता है, तो वह वस्तु उसके मन में बस जाती है। यानी व्यक्ति को उस चीज से लगाव होने लगता है। यही व्यक्ति के पतन का पहला चरण है।
2. लगाव - जब व्यक्ति बार-बार एक ही वस्तु के बारे में सोचता है, तो उसे उससे लगाव हो जाता है। वह उस वस्तु को अपना समझने लगता है। यही लगाव आगे चलकर दुख का कारण बनता है।
3. कामना - लगाव की वजह से व्यक्ति के मन में इच्छा या कामना जागती है। इसके बाद उसका मन उस वस्तु को पाने के लिए बेचैन हो जाता है।
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4. क्रोध- जब व्यक्ति की इच्छा पूरी नहीं होती, तो उसके भीतर क्रोध पैदा होता है।
5. मोह- क्रोध के कारण व्यक्ति का उस वस्तु के प्रति लगाव और बढ़ जाता है। इस स्थिति में वह सही फैसला नहीं कर पाता। व्यक्ति प्रिय और अप्रिय के बीच अंतर करने में असमर्थ हो जाता है। इसी स्थिति में असमंजस पैदा होता है, जिससे वह गलत निर्णय ले सकता है।
6. सीख भूल जाना- मोह की वजह से व्यक्ति अपने जीवनभर की सीख भूलने लगता है। इस दौरान वह माता-पिता और गुरुओं द्वारा दी गई शिक्षा को भी नजरअंदाज कर देता है।
7. बुद्धि का नाश- जीवनभर की सीख भूल जाने के कारण व्यक्ति की बुद्धि का नाश होने लगता है और वह सही-गलत का फर्क नहीं कर पाता।
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असमंजस से कैसे पाएं मुक्ति?
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने बताया है कि असमंजस पर तभी काबू पाया जा सकता है, जब व्यक्ति अपने मन और भावनाओं पर नियंत्रण रखे। इसी बारे में भगवद्गीता के अध्याय 6 के सातवें श्लोक में बताया गया है।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥
इस श्लोक का अर्थ है कि जिसने अपने मन को जीत लिया, वह असमंजस से मुक्ति पा लेता है। ऐसा व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना भी शांत मन से कर सकता है। कुल मिलाकर, हर व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए। तभी वह असमंजस से बाहर निकलकर सही निर्णय ले पाएगा।
