उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में सुरा देवी मंदिर स्थित है, जो देहरादून के पहाड़ों के बजाय राजपुर गांव के पास घने जंगलों में स्थित है। सुरा देवी मंदिर के दर्शन करने दूर-दूर से लोग आते हैं। नवरात्रों के दिनों में हजारों लोग सुरा देवी मंदिर पहुंचते हैं। इस मंदिर में देवी वरुणी की पूजा-अर्चना की जाती है, जिन्हें देहरादून में सुरा देवी के नाम से जाना जाता है। सुरा देवी के बारे में मान्यता है कि उनका जन्म समुद्र मंथन से उत्पन्न चार अप्सराओं में से एक के रूप में हुआ था।
कई धार्मिक जानकारों का मानना है कि जो लोग सच्चे मन से अपनी मनोकामना पूरी होने की आशा लेकर आते हैं, उनकी मनोकामना पूरी होती है। इसके अलावा सुरा मां को भक्तों की रक्षा करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। अब सवाल उठता है कि सुरा देवी मंदिर की यात्रा किस महीने में करनी चाहिए, इसके अलावा यह भी सवाल उठता है कि इस मंदिर तक कैसे पहुंचें।
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क्या है सुरा देवी मंदिर का इतिहास?
सुरा देवी मंदिर की स्थापना महंत नारायण दास ने कराई थी, जो साल 1854 से 1874 के बीच बनी थी। माना जाता है कि मंदिर की मूर्ति किसी कारीगर द्वारा बनाई नहीं गई थी बल्कि स्वयं प्रकट हुई थी। इस मंदिर के पास ही महंत नारायण दास का आश्रम है। माना जाता है कि समुद्र मंथन में चार अप्सराएं उत्पन्न हुई थीं, जिनमें से एक सुरा देवी थीं। उन्होंने राक्षस जालंधर से इंद्रदेव की रक्षा की थी, जिस वजह से उन्हें रक्षा की देवी के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर बेहद खूबसूरत है क्योंकि इसके आसपास सुंदर जंगल हैं, जहां अनेक पेड़-पौधे हैं।
मंदिर का दर्शन कब करें?
सुरा देवी मंदिर के दर्शन के लिए भक्त पूरे साल आते हैं लेकिन मंदिर के दर्शन का सबसे अच्छा समय शारदीय नवरात्र होता है। इस दौरान मंदिर के पास भव्य मेला लगता है और मंदिर को फूलों और लाइटों से सजाया जाता है। सितंबर और अक्टूबर के दौरान न ज्यादा गर्मी होती है और न ही ज्यादा ठंड होती है, इस वजह से भक्तों को मंदिर आने में ज्यादा थकान नहीं होगी।
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सुरा देवी मंदिर कैसे पहुंचें?
सुरा देवी मंदिर के दर्शन के लिए आपको सबसे पहले अपने राज्य से बस, कार या ट्रेन द्वारा देहरादून पहुंचना होगा। उसके बाद आप राजपुर गांव बस या कार से जा सकते हैं, जो देहरादून से लगभग 3 घंटे दूर है। राजपुर गांव से सुरा देवी मंदिर 4.6 किलोमीटर दूर है, जहां जाने के लिए आप साइकिल, कार या बाइक का उपयोग कर सकते हैं। मंदिर जंगल के बीच स्थित है इसलिए कार और बाइक से जाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है क्योंकि रास्ता ऊबड़-खाबड़ और उतार-चढ़ाव से भरा है।
जिन लोगों को ट्रेकिंग का शौक है, वे राजपुर गांव से मंदिर तक पैदल ट्रेकिंग करके जा सकते हैं। मंदिर जाने से पहले ट्रेकिंग का अभ्यास कर लेना चाहिए ताकि रास्ते में कठिनाई का सामना न करना पड़े। राजपुर गांव से मंदिर तक पैदल जाने में लगभग 1.5 घंटा लग सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं की जाती है।
