ओडिशा का चारबतिया एयरबेस फिर से एक बार चर्चा में है। हाल ही में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने एक बार फिर से इसका जिक्र करते हुए कहा कि जवाहरलाल नेहरू सरकार ने इसे अमेरिका को 'दे दिया' था। हालांकि, यह दावा ऐतिहासिक रूप से सही है या नहीं यह चर्चा का विषय है? या फिर यह कुछ ऐसा है कि कोल्ड वॉर के एक जटिल अध्याय को आज की राजनीति में सरल तरीके से पेश किया जा रहा है? खबरगांव इसी पर चर्चा करेगा लेकिन इसे समझने के लिए 1960 के दशक की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में फिर से जाना होगा।
इस मामले में ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक पर आरोप लगाते हुए दुबे ने कहा कि वह अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए और तत्कालीन प्रधानमत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच लिंक के रूप में काम कर रहे थे। उन्होंने कहा था कि नेहरू ने चीन से 1962 का युद्ध अमेरिका के समर्थन और सीआईए के साथ मिलकर लड़ा था और इसके लिए ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने अमेरिकन एयरक्राफ्ट को चारबतिया एयरबेस से ऑपरेट होने दिया था।
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क्या था चारबतिया एयरबेस?
सबसे पहले, यह समझना जरूरी है कि चारबतिया एयरबेस क्या था? ओडिशा के कटक के पास स्थित यह एयरबेस मूल रूप से भारतीय खुफिया एजेंसी एविएशन रिसर्च सेंटर (Aviation Research Centre, ARC) से जुड़ा था, जो चीन और पाकिस्तान की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बनाया गया था। यह पूरी तरह भारत के नियंत्रण में था।
अब आते हैं उस मुद्दे पर, जिसने विवाद खड़ा किया अमेरिका की Central Intelligence Agency (CIA) और U-2 जासूसी विमानों का इस्तेमाल। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत की सुरक्षा चिंताएं तेजी से बढ़ गई थीं। चीन ने न केवल युद्ध में भारत को पराजित किया, बल्कि वह परमाणु कार्यक्रम भी तेजी से आगे बढ़ा रहा था। उस समय भारत के पास चीन की सैन्य और परमाणु गतिविधियों की निगरानी के लिए पर्याप्त तकनीकी क्षमता नहीं थी।
यहीं से अमेरिका के साथ सीमित सहयोग की शुरुआत हुई। Cold War के दौर में अमेरिका भी चीन पर नजर रखना चाहता था। ऐसे में दोनों देशों के हित कुछ हद तक मिल गए। इसी संदर्भ में CIA के U-2 जासूसी विमानों को भारत के कुछ ठिकानों जिनमें चारबतिया भी शामिल था, से ऑपरेट करने की अनुमति दी गई। इन मिशनों का उद्देश्य चीन के परमाणु परीक्षण स्थलों और सैन्य गतिविधियों की निगरानी करना था।
अमेरिकी फाइलों में जिक्र
चारबतिया के बारे में अमेरिकी CIA की डीक्लासिफाई की गई फाइलों में लिखा हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक 2013 में डीक्लासिफाई हुई CIA फाइलों में अमेरिका द्वारा 1962 के युद्ध के बाद भारत की जमीन से चीन पर जासूसी करने के लिए पहली आधिकारिक स्वीकृति मिली थी।
फाइलों में लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिकी U-2 जासूसी विमानों को चीन के ऊपर जासूसी करने की इजाजत दी थी। ये विमान भारत के ऊपर से उड़ान भरते थे और भारत में ठहर भी सकते थे। इसके बदले में भारत को भी जासूसी की रिपोर्ट मिलती थी, जिनका इस्तेमाल नेहरू संसद को भारत-चीन सीमा की स्थिति बताने के लिए करते थे।
U-2 नाम का ये मशहूर अमेरिकी जासूसी विमान पहले थाईलैंड से उड़ान भरता था और भारत के ऊपर से गुजरकर चीन की सैन्य जगहों की तस्वीरें लेता था। बाद में इसे ओडिशा के चारबतिया एयरबेस पर स्थायी रूप से रखा गया। इस एयरबेस को खास तौर पर इसी काम के लिए तैयार किया गया था।
दोनों को थी जरूरत
उस समय अमेरिका और भारत दोनों को चीन के परमाणु हथियार कार्यक्रम की चिंता थी। नेहरू के अपने पत्र में भी इस बारे में लिखा था। यह पत्र नेहरू आर्काइव में उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, 5 मई 1963 को रक्षा मंत्री वाई.बी. चव्हाण को लिखे एक पत्र में नेहरू ने कहा कि खुफिया ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक बी.एन. मल्लिक ने उन्हें बताया था कि अमेरिकियों ने कई एयरफील्ड देखने के बाद चारबतिया को सबसे अच्छा माना है।
उन्होंने लिखा कि चारबतिया के फायदे थे, यह एक अच्छा एयरफील्ड है, किसी भी एयर सर्विस से जुड़ा नहीं है और आम आवाजाही से अलग है। नेहरू ने पत्र में लिखा: 'इसलिए मैं फाइल में नोट कर रहा हूं कि चारबतिया एयरफील्ड को इस काम के लिए चुना जाएगा और इस्तेमाल किया जाएगा।'
नेहरू ने पत्र में लिखा
अगले दिन (6 मई 1963) एक और पत्र में नेहरू ने चारबतिया पर काम करने वाले स्टाफ के बारे में लिखा। उन्होंने चव्हाण को बताया, 'मैं आपसे सहमत हूं कि चारबतिया पर भारतीय वायुसेना (IAF) के लोगों को रखना बेहतर होगा। जैसा आपने बताया, IAF के लोगों को दूसरों के साथ मिलाने में कुछ दिक्कतें हो सकती हैं।'
नेहरू की 1964 में मौत हो गई। उसके बाद भी चारबतिया से कुछ और जासूसी उड़ानें हुईं, लेकिन धीरे-धीरे ये पूरा ऑपरेशन बंद हो गया लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी यह 'बेस देना' नहीं था, बल्कि सीमित और गोपनीय सहयोग था। एयरबेस का नियंत्रण भारतीय अधिकारियों के पास ही रहा। अमेरिका को वहां स्थायी सैन्य मौजूदगी या स्वामित्व नहीं दिया गया था। यह सहयोग भी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं था, क्योंकि उस समय भारत अपनी ‘गुटनिरपेक्ष’ छवि बनाए रखना चाहता था।
फिर विवाद किसा बात का?
तो फिर यह मुद्दा आज इतना विवादित क्यों है? इसकी वजह है राजनीतिक नैरेटिव। आज के संदर्भ में 'CIA को बेस देना' एक गंभीर आरोप की तरह लगता है, जो राष्ट्रीय संप्रभुता पर सवाल खड़ा करता है। लेकिन 1960 के दशक में यह फैसला एक अलग संदर्भ में लिया गया था जहां भारत एक बड़े सैन्य खतरे का सामना कर रहा था और उसके पास सीमित संसाधन थे।
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इसमें बीजू पटनायक का नाम भी जुड़ता है, जो उस समय एक प्रमुख नेता और एविएशन से जुड़े व्यक्तित्व थे। कुछ रिपोर्ट्स में यह कहा जाता है कि उन्होंने इस तरह के सहयोग में भूमिका निभाई थी लेकिन इसे लेकर कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं।
