समुद्र पर अधिकार का सवाल समुद्री क्षेत्र को लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सबसे जटिल और संवेदनशील विषयों में से एक है। यह केवल सीमाओं का मामला नहीं है, बल्कि इसमें संप्रभुता, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक शक्ति इन सभी का गहरा संबंध है। खासकर होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य के संदर्भ में यह बहस और अधिक प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि यहां से गुजरने वाला समुद्री मार्ग न केवल क्षेत्रीय देशों बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समुद्र पर अधिकार को लेकर कौन से नियम लागू होते हैं और इन नियमों के अनुसार होर्मुज जैसे जलमार्गों पर किसी एक देश का कितना नियंत्रण वैध माना जाता है।

 

समुद्र पर अधिकार को नियंत्रित करने वाला सबसे व्यापक और मान्य ढांचा United Nations Convention on the Law of the Sea (UNCLOS) है, जिसे सामान्यतः 'समुद्र का संविधान' कहा जाता है। 1982 में अपनाए गए इस समझौते ने समुद्री क्षेत्रों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर यह स्पष्ट किया कि किसी भी देश को समुद्र के किस हिस्से पर कितना अधिकार होगा। इसका मूल उद्देश्य यह था कि समुद्री संसाधनों के उपयोग, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके। UNCLOS के तहत समुद्र को विभिन्न क्षेत्रों जैसे टेरिटोरियल वॉटर्स, कंटिग्यूस जोन, एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) और हाई सीज़में बांटा गया है, जिनमें प्रत्येक की कानूनी स्थिति अलग-अलग है।

टेरिटोरियल वॉटर्स

टेरिटोरियल वॉटर्स किसी देश के तट से 12 नॉटिकल मील तक का समुद्री क्षेत्र होता है। यह वह हिस्सा है जहां उस देश का लगभग पूर्ण संप्रभु अधिकार होता है। यहां उस देश के कानून उसी तरह लागू होते हैं जैसे उसकी जमीन पर लागू होते हैं। हालांकि, यहां भी एक महत्वपूर्ण सिद्धांत लागू होता है जिसे 'innocent passage' कहा जाता है। इसके अनुसार, विदेशी जहाज बिना किसी बाधा के इस क्षेत्र से गुजर सकते हैं, बशर्ते वे किसी प्रकार की सैन्य या असामान्य गतिविधि में शामिल न हों। यह सिद्धांत इस बात को दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने संप्रभुता के साथ-साथ वैश्विक आवागमन की स्वतंत्रता को भी महत्व दिया है।

कॉन्टिगुअस जोन

इसके आगे 12 से 24 नॉटिकल मील तक का क्षेत्र 'contiguous zone' कहलाता है, जहां तटीय देश को सीमित अधिकार प्राप्त होते हैं। इस क्षेत्र में वह देश कस्टम, टैक्सेशन, इमिग्रेशन और सुरक्षा से जुड़े नियमों को लागू कर सकता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण संप्रभुता जैसा नहीं होता। इसके बाद 200 नॉटिकल मील तक का क्षेत्र 'एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन' (EEZ) कहलाता है, जहां तटीय देश को प्राकृतिक संसाधनोंजैसे तेल, गैस और मछली के दोहन का अधिकार होता है। हालांकि, इस क्षेत्र में भी अन्य देशों को समुद्री आवागमन की स्वतंत्रता बनी रहती है। इसका मतलब यह है कि आर्थिक अधिकार और समुद्री नियंत्रण दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून ने स्पष्ट रूप से अलग रखा है।

क्या है अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र?

इन सभी क्षेत्रों से परे जो समुद्री भाग आता है, उसे 'high seas' कहा जाता है, जहां किसी एक देश का कोई अधिकार नहीं होता और यह पूरी दुनिया के सभी देशों के लिए खुला होता है। यहां मुक्त आवाजाही यानी कि 'freedom of navigation' का सिद्धांत लागू होता है, जिसके तहत सभी देशों के जहाज स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सकते हैं। यह व्यवस्था वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संपर्क को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि दुनिया का अधिकांश व्यापार समुद्री मार्गों के माध्यम से ही होता है।

स्ट्रेट के लिए नियम

हालांकि, सबसे अधिक जटिल और महत्वपूर्ण श्रेणी 'international straits' की होती है। ये वे पतले या संकीर्ण जलमार्ग होते हैं जो दो बड़े समुद्री क्षेत्रों को जोड़ते हैं और जिनका उपयोग वैश्विक जहाजरानी के लिए किया जाता है। होर्मुज स्ट्रेट इसी श्रेणी में आता है। ऐसे जलडमरूमध्यों के लिए UNCLOS के तहत ट्रांजिट पैसेज (transit passage) का सिद्धांत लागू होता है। यह सिद्धांत 'innocent passage' से भी अधिक व्यापक है, क्योंकि इसमें जहाजों के साथ-साथ विमानों को भी बिना किसी बाधा के गुजरने की अनुमति होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तटीय देश इस आवागमन को न तो रोक सकते हैं और न ही इस पर कोई टोल या टैक्स लगा सकते हैं। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग किसी एक देश की मनमानी का शिकार न बनें।

 

यही वह बिंदु है जहां कानून और वास्तविकता के बीच टकराव देखने को मिलता है। सैद्धांतिक रूप से अंतरराष्ट्रीय कानून स्पष्ट है कि ऐसे जलडमरूमध्यों को खुला रहना चाहिए, लेकिन व्यवहार में क्षेत्रीय शक्तियां अक्सर इन नियमों को अपने सामरिक हितों के अनुसार व्याख्यायित करती हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है, जहां कानूनी स्थिति और भू-राजनीतिक वास्तविकता के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

होर्मुज की क्या स्थिति?

भौगोलिक रूप से देखें तो ईरान और ओमान इस जलडमरूमध्य के दोनों किनारों पर स्थित हैं। इस कारण इस क्षेत्र का कुछ हिस्सा दोनों देशों के टेरिटोरियल वॉटर्स में आता है। इसका मतलब यह है कि ईरान का इस क्षेत्र पर आंशिक भौगोलिक अधिकार है। लेकिन यह अधिकार सीमित है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है। क्योंकि होर्मुज एक अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य है, इसलिए यहां ट्रांजिट पैसेज का नियम लागू होता है, जो किसी भी देश को पूर्ण नियंत्रण का अधिकार नहीं देता।

टोल वसूलने का प्रावधान नहीं

कानूनी दृष्टि से स्पष्ट है कि ईरान इस जलमार्ग पर न तो टोल वसूल सकता है और न ही जहाजों के आवागमन को रोक सकता है। ऐसा करना UNCLOS के प्रावधानों का उल्लंघन माना जाएगा। हालांकि, व्यवहार में स्थिति इतनी सरल नहीं है। ईरान ने कई बार सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इस क्षेत्र में जहाजों की जांच की है या उनके आवागमन को प्रभावित करने की कोशिश की है। यह एक प्रकार का 'de facto control' है, जो कानूनी रूप से मान्य नहीं होते हुए भी व्यावहारिक रूप में प्रभाव डालता है।

 

इस प्रकार की कार्रवाइयों के पीछे केवल कानूनी तर्क नहीं, बल्कि गहरी भू-राजनीतिक रणनीति भी होती है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है, जो इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा बनाता है। ऐसे में इस मार्ग पर नियंत्रण स्थापित करना किसी भी क्षेत्रीय शक्ति के लिए एक बड़ा रणनीतिक हथियार बन सकता है। ईरान इस स्थिति का उपयोग अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिए करता है, खासकर तब जब उसके और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ जाता है।

 

इस संदर्भ में अमेरिका जैसे देश भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं, क्योंकि उनकी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होता है कि यह समुद्री मार्ग खुला और सुरक्षित रहे। अमेरिकी नौसेना की उपस्थिति इस क्षेत्र में इसी रणनीति का हिस्सा है। इससे स्पष्ट होता है कि होर्मुज का मुद्दा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ है।

 

अतः यह कहा जा सकता है कि समुद्र पर अधिकार के अंतरराष्ट्रीय नियम एक ओर देशों की संप्रभुता को मान्यता देते हुए, दूसरी ओर वैश्विक आवागमन और व्यापार की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करते हुए स्पष्ट रूप से संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन जब इन नियमों का सामना वास्तविक दुनिया की शक्ति राजनीति से होता है, तो अक्सर उनकी व्याख्या और क्रियान्वयन में अंतर आ जाता है। होर्मुज जलडमरूमध्य इसी द्वंद्व का प्रतीक है, जहां कानून एक बात कहता है, लेकिन भू-राजनीतिक वास्तविकताएं उसे चुनौती देती रहती हैं।