दुनिया में जब भी किसी बड़े युद्ध या भूराजनीतिक तनाव की चर्चा होती है तो आमतौर पर ध्यान पेट्रोल-डीजल या गैस की कीमतों पर जाता है लेकिन इन संघर्षों का एक कम चर्चा वाला पर बेहद महत्वपूर्ण असर खेती पर भी पड़ता है क्योंकि युद्ध की वजह से फर्टिलाइजर्स की आपूर्ति पर भी असर पड़ता है। फर्टिलाइजर आधुनिक खेती-किसानी की रीढ़ हैं खासतौर पर भारत जैसे देश में, जहां हरित क्रांति के बाद से खेती का बड़ा हिस्सा रासायनिक फर्टिलाइजर्स पर निर्भर हो गया है। यदि वैश्विक सप्लाई चेन में बाधा आती है तो इसका असर सीधे कृषि उत्पादन और अंततः खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है।

 

हाल के वर्षों में यह खतरा कई बार सामने आया है। उदाहरण के लिए, रूस‑यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक फर्टिलाइजर बाजार में भारी उथलपुथल देखी गई थी क्योंकि रूस और बेलारूस पोटाश और अन्य फर्टिलाइजर्स के प्रमुख निर्यातक हैं। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिम ने फिर से फर्टिलाइजर आपूर्ति पर चिंता बढ़ा दी है। इस समुद्री मार्ग से ऊर्जा के साथ-साथ फर्टिलाइजर के कच्चे माल का भी बड़ा हिस्सा गुजरता है।

 

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विदेशो से होता है आयात

भारत दुनिया के सबसे बड़े फर्टिलाइजर उपभोक्ताओं में से एक है लेकिन इसके लिए आवश्यक कच्चे माल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि वैश्विक संघर्ष लंबा खिंचता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो क्या भारत की खेती और खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है? इस प्रश्न का उत्तर भारत की आयात निर्भरता, सरकारी नीति और वैकल्पिक रणनीतियों को समझे बिना संभव नहीं है।

भारत की फर्टिलाइजर्स पर निर्भरता

भारत की कृषि व्यवस्था में फर्टिलाइजर्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। हरित क्रांति के बाद से देश में उत्पादकता बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश आधारित फर्टिलाइजर्स का व्यापक उपयोग हुआ है। आज भारत दुनिया में फर्टिलाइजर उपयोग के मामले में शीर्ष देशों में शामिल है।


देश में हर साल लगभग 60–65 मिलियन टन फर्टिलाइजर्स की खपत होती है। इनमें मुख्यतः तीन पोषक तत्वों पर आधारित फर्टिलाइजर शामिल हैं-

  • नाइट्रोजन (यूरिया)
  • फॉस्फेट (DAP और NPK)
  • पोटाश (MOP)

इनमें से यूरिया का बड़ा हिस्सा भारत में ही बन जाता है, लेकिन फॉस्फेट और पोटाश के मामले में भारत भारी आयात पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, पोटाश का लगभग 90 प्रतिशत और फॉस्फेट का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। इसका मतलब यह है कि वैश्विक आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा भारत की कृषि व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

युद्ध का असर

गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन  से भारत का यूरिया आयात 2024-25 में करीब 75% था। DAP में भी सऊदी अरब सबसे बड़ा स्रोत है। MOP में GCC देश कम हैं लेकिन जॉर्डन, इजराइल या तुर्कमेनिस्तान जैसे अन्य पश्चिम एशियाई देश महत्वपूर्ण हैं।


अब चल रहा अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान युद्ध भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। रूस (जो यूक्रेन से चार साल से लड़ रहा है) और चीन (जिससे भारत के ज्यादा दोस्तीपूर्ण संबंध नहीं हैं) को भी जोड़ें तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। रूस भारत का MOP का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है और यूरिया तथा DAP में तीसरा। 2023-24 तक चीन यूरिया और DAP का सबसे बड़ा स्रोत था।

 

खादों के अलावा कच्चे माल पर भी निर्भरता है। यूरिया प्लांट प्राकृतिक गैस पर चलते हैं। खाद क्षेत्र भारत की कुल प्राकृतिक गैस खपत का करीब 29% इस्तेमाल करता है। आधी से ज्यादा गैस आयात होती है। 2024-25 में 27 मिलियन टन LNG आयात हुआ, जिसमें कतर से 11.2 मिलियन टन, UAE से 3.5 मिलियन टन और ओमान से 1.8 मिलियन टन। अप्रैल-दिसंबर 2025 में 19.9 मिलियन टन आयात में कतर से 9 मिलियन टन, UAE से 2.1 मिलियन टन और ओमान से 1.2 मिलियन टन किया गया।

 

DAP, MOP और कॉम्प्लेक्स खादों के लिए भारत के पास रॉक फॉस्फेट, पोटाश (K) या सल्फर (S) के खदान नहीं हैं। DAP और कॉम्प्लेक्स के लिए अमोनिया आयात होता है। 2024-25 में 2.5 मिलियन टन अमोनिया आयात में ओमान से 1 मिलियन टन, सऊदी अरब से 0.9 मिलियन टन और कतर से 0.2 मिलियन टन आयात होता है।


DAP के लिए फॉस्फोरिक एसिड जॉर्डन, सेनेगल, मोरक्को, चीन और ट्यूनीशिया से आता है। कुछ भारतीय कंपनियों के पास अपना प्लांट है लेकिन रॉक फॉस्फेट और सल्फर आयात होते हैं। सल्फर के दाम रूस-यूक्रेन युद्ध से बढ़कर 550 डॉलर प्रति टन हो गए हैं जो पहले 250 डॉलर प्रति टन थे।

भारत का क्या स्थिति?

अभी भारत के पास खाद का अच्छा स्टॉक है। फरवरी अंत में यूरिया का स्टॉक 5.5 मिलियन टन था जो पिछले साल 4.9 मिलियन टन से ज्यादा है। DAP 2.5 मिलियन टन (पिछले 1.3 मिलियन टन) और कॉम्प्लेक्स 5.4 मिलियन टन (पिछले 3.2 मिलियन टन) था।

 


रबी सीजन की शुरुआत में स्थिति खराब थी लेकिन बड़े आयात से स्टॉक बढ़ा। अगला खरीफ सीजन जून से शुरू होगा तब तक स्टॉक तैयार करने का समय है।

आयात निर्भरता, बड़ा जोखिम

भारत की फर्टिलाइजर सुरक्षा का सबसे कमजोर पहलू उसकी आयात निर्भरता है। भारत, पोटाश का लगभग पूरा, फॉस्फेट का बड़ा हिस्सा और प्राकृतिक गैस का भी एक हिस्सा आयात करता है।


इसका मतलब यह है कि वैश्विक बाजार में कीमतों या आपूर्ति में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर भारत पर तुरंत पड़ता है। यदि युद्ध के कारण निर्यात प्रतिबंध लगते हैं या समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो भारत को पर्याप्त मात्रा में फर्टिलाइजर उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

सरकार की रणनीतियां

भारत सरकार ने इस जोखिम को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। पहला, फर्टिलाइजर सब्सिडी प्रणाली। भारत में किसानों को सस्ती दरों पर फर्टिलाइजर उपलब्ध कराने के लिए
सरकार हर साल बड़ी मात्रा में सब्सिडी देती है। कई बार यह सब्सिडी दो लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो जाती है।


दूसरा, अंतरराष्ट्रीय साझेदारी। भारत ने विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक फर्टिलाइजर आपूर्ति समझौते किए हैं। उदाहरण के लिए, कनाडा, मोरक्को और रूस जैसे देशों से फर्टिलाइजर आयात के लिए समझौते किए गए हैं।


तीसरा, घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश। सरकार ने बंद पड़े कई यूरिया संयंत्रों को फिर से शुरू किया है और नई उत्पादन क्षमता विकसित की जा रही है। चौथा, वैकल्पिक फर्टिलाइजर्स को बढ़ावा। सरकार नैनो यूरिया और जैविक फर्टिलाइजर्स के उपयोग को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है ताकि आयात निर्भरता कम हो सके।

 

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क्या होगा असर?

यदि वैश्विक युद्ध या तनाव के कारण फर्टिलाइजर आपूर्ति बाधित होती है तो इसका असर कई स्तरों पर पड़ सकता है। सबसे पहले, फर्टिलाइजर की कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि भारत में सब्सिडी के कारण किसानों पर तत्काल असर सीमित रहता है लेकिन सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ जाता है।

 

दूसरा, यदि पर्याप्त फर्टिलाइजर उपलब्ध नहीं होते तो किसान कम फर्टिलाइजर का उपयोग कर सकते हैं। इससे फसल की उत्पादकता घट सकती है। तीसरा उत्पादन कम होने से खाद्य कीमतों में वृद्धि हो सकती है। इससे खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा रहता है।