पिछले कुछ दिनों से सेना के पूर्व जनरल मनोज नरवणे की किताब काफी चर्चा में बनी हुई है। राहुल गांधी ने उनकी अप्रकाशित किताब के कुछ अंशों को कथित तौर पर संसद में पढ़ने की कोशिश की और सवाल उठाया कि आखिर यह किताब अब तक पब्लिश क्यों नहीं हुई। उनका कहना था कि आखिर उनकी किताब को रक्षा मंत्रालय से अब तक क्लियरेंस क्यों नहीं मिली।

 

भारत में सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्तियों, विशेष रूप से सेना, सरकारी कर्मचारियों और पैरा मिलिट्री फोर्स के सदस्यों के लिए किताब प्रकाशन एक संवेदनशील विषय है। यह इसलिए क्योंकि सरकारी कर्मचारी और सैन्य बलों के लोग राष्ट्रीय सुरक्षा, गोपनीयता और  अनुशासन से जुड़े होते हैं। किताब प्रकाशन की प्रक्रिया में फ्रीडम ऑफ स्पीच (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होता है।

 

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कई नियमों से बंधे

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो प्रदान की गई है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और गोपनीयता के आधार पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। मनोज नरवणे की किताब को पब्लिश होने से सरकार के स्तर पर रोक लगाए जाने के आरोप ने इस पर बहस छेड़ दी है। इस लेख में खबरगांव विस्तार से चर्चा करेेगा कि सरकारी कर्मचारी, सेना के सदस्य और पैरा मिलिट्री फोर्स के लिए किताब छपवाने के क्या क्राइटेरिया हैं, क्या प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती हैं, और क्या जोखिम जुड़े हैं।

 

भारत सरकार के विभिन्न नियमों जैसे सेंट्रल सिविल सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1964, ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1968, आर्मी रूल्स, 1954 और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के आधार पर ये क्राइटेरिया निर्धारित होते हैं। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रकाशित सामग्री से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा न हो, सरकारी नीतियों की अनुचित आलोचना न हो, और गोपनीय जानकारी का दुरुपयोग न हो। उदाहरण के लिए, यदि किसी किताब में सरकारी डेटा या सैन्य रणनीतियों का उल्लेख है, तो पूर्व अनुमति अनिवार्य है।

सरकारी कर्मचारियों के लिए नियम

सरकारी कर्मचारी, जैसे सिविल सर्वेंट्स या केंद्र/राज्य सरकार के कर्मी, सेंट्रल सिविल सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1964 के अंतर्गत आते हैं। रूल 8 के अनुसार, कोई सरकारी कर्मचारी किसी न्यूज पेपर, पत्रिका या अन्य मीडिया के संपादन या प्रबंधन में भाग नहीं ले सकता, जब तक कि सरकार की पूर्व अनुमति न हो। हालांकि, यदि किताब प्रकाशन ऑफिशियल ड्यूटी के दौरान नहीं है और यह साहित्यिक, कलात्मक या वैज्ञानिक प्रकृति की है, तो पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन किताब में स्पष्ट रूप से उल्लेख करना जरूरी है कि विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, न कि सरकार के।

 

ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1968 में भी इसी तरह के प्रावधान हैं। रूल 6 के अनुसार, किताब प्रकाशन के लिए पूर्व सैंक्शन की जरूरत नहीं अगर यह साहित्यिक या वैज्ञानिक है और ऑफिशियल ड्यूटी से सहायता प्राप्त नहीं है, लेकिन यदि किताब में सरकारी नीतियों की आलोचना है या गोपनीय जानकारी है, तो अनुमति अनिवार्य है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु सरकार ने 2025 में अपने कंडक्ट रूल्स में संशोधन किया, जिसमें कर्मचारियों को सरकारी नीतियों की आलोचना वाली किताबें प्रकाशित करने से रोका गया है। अब उन्हें किताब प्रकाशन से पहले सक्षम प्राधिकारी को सूचित करना पड़ता है और स्व-घोषणा देनी पड़ती है कि किताब में कोई आलोचना या राज्य विरोधी सामग्री नहीं है।

क्या है प्रक्रिया?

यदि अनुमति की जरूरत है, तो कर्मचारी को अपने विभाग प्रमुख को आवेदन देना होता है, जिसमें किताब का ड्राफ्ट, विषय और उद्देश्य शामिल हो। विभाग इसे मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल, पब्लिक ग्रीवांस एंड पेंशन्स (DoPT) को फॉरवर्ड करता है। अनुमति मिलने पर प्रकाशन संभव है। यदि किताब में ऑफिशियल डेटा है, तो ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट लागू होता है, जो दंडनीय है। 

 

नियम के उल्लंघन पर निलंबन, पदावनति या बर्खास्तगी हो सकती है। हाल के बदलावों में, 2025 में DoPT ने स्पष्ट  के किया कि साहित्यिक कार्यों के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य नहीं, लेकिन सोशल मीडिया या किताब में सरकारी आलोचना प्रतिबंधित है। यह कर्मचारियों को रचनात्मकता की स्वतंत्रता देता है, लेकिन राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है।

 

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सेना के के लिए क्राइटेरिया

सेना के सदस्यों के लिए नियम अधिक सख्त हैं, क्योंकि वे राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े होते हैं। आर्मी रूल्स, 1954 के सेक्शन 21 के अनुसार, सर्विंग ऑफिसर या जवान को कोई किताब, लेख या दस्तावेज प्रकाशित करने के लिए सेंट्रल गवर्नमेंट की पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है, यदि वह सर्विस सब्जेक्ट, पॉलिटिकल मुद्दे या गोपनीय जानकारी से संबंधित है। यह नियम आर्मी एक्ट, 1950 के अंतर्गत लागू होता है। सर्विंग सदस्यों को किताब का ड्राफ्ट आर्मी हेडक्वार्टर्स के इंटेलिजेंस विंग को भेजना पड़ता है, जहां तीन स्तरों पर रिव्यू होता है: एडिट्स, अप्रूवल या रिजेक्शन।

रिटायर्ड ऑफिसर के लिए नियम

रिटायर्ड ऑफिसर्स की बात करें तो आर्मी रूल्स सीधे लागू नहीं होते, लेकिन ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 जीवन भर लागू रहता है। 2021 में CCS (पेंशन) रूल्स में संशोधन से रिटायर्ड ऑफिसर्स को इंटेलिजेंस या सिक्योरिटी से संबंधित सामग्री प्रकाशित करने के लिए पूर्व क्लियरेंस लेना पड़ता है। यदि इसका उल्लंघन होता है, तो पेंशन रोकी जा सकती है। उदाहरण के लिए पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे की किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' 2024 से पेंडिंग है, क्योंकि मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस से क्लियरेंस नहीं मिला। किताब में LAC स्टैंडऑफ और अग्निपथ स्कीम के बारे में लिखा गया है, जो काफी संवेदनशील मामला है। इस केस में, किताब का अनपब्लिश्ड ड्राफ्ट लीक होने पर दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की, क्योंकि यह कॉपीराइट उल्लंघन और गोपनीयता भंग था।

 

प्रक्रिया के मुताबिक सर्विंग सदस्यों को ड्राफ्ट को आर्मी HQ भेजना होता है। रिटायर्ड सदस्यों को रक्षा मंत्रालय या पूर्व संगठन से क्लियरेंस लेना पड़ता है। यदि किताब साहित्यिक है (जैसे उपन्यास), तो अनुमति आसान है, लेकिन यदि सैन्य अनुभवों पर आधारित, तो कठिन। इसका उल्लंघन करने पर कोर्ट मार्शल या पेंशन में कटौती हो सकती है।

पैरा मिलिट्री फोर्सेस के लिए क्राइटेरिया

पैरा मिलिट्री फोर्सेस जैसे BSF, CRPF, ITBP आदि केंद्र सरकार के अंतर्गत आते हैं और उनके कंडक्ट रूल्स सिविल सर्विसेज जैसे हैं, लेकिन सैन्य प्रकृति के कारण सख्त हैं। BSF एक्ट, 1968 और CRPF एक्ट, 1949 में प्रकाशन संबंधी स्पष्ट प्रावधान नहीं, लेकिन CCS (कंडक्ट) रूल्स लागू होते हैं। सदस्यों को किताब प्रकाशित करने के लिए पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है यदि सामग्री गोपनीय या नीतिगत आलोचना वाली है।

 

सर्विंग सदस्यों के लिए यदि किताब में सेवा से संबंधित कुछ लिखा गया है तो किताब छपवाने के पहले आर्मी जैसा पूर्व सैंक्शन जरूरी है। वहीं रिटायर्ड सदस्यों के लिए ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट लागू होता है। यानी कि रिटायर्ड सदस्यों को रक्षा मंत्रालय या होम मिनिस्ट्री से क्लियरेंस लेनी होती है। पैरा मिलिट्री में किताबें आमतौर पर सैन्य इतिहास या व्यक्तिगत अनुभवों पर होती हैं, लेकिन क्लियरेंस अनिवार्य है। प्रक्रिया का पालन न करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है।

पहले भी हुआ है विवाद

इससे पहले करीब 19 साल पहले मेजर जनरल वीके सिंह की किताब को लेकर भी विवाद हुआ था। साल 2002 में रिटायमेंट के बाद उन्होंने एक किताब 'इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलिजेंस:सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग' नाम से लिखी थी। लेकिन इसके पब्लिश होते ही सीबीआई ने उनके खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट्स ऐक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया था। 


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इसके बाद उनके गुरुग्राम स्थित घर पर छापेमारी की गई और उनका कंप्यूटर, पासपोर्ट और डायरी जब्त कर ली गई। हालांकि, उनके खिलाफ अभी तक न तो ट्रायल शुरू हुआ है और न ही कोई अंतिम कार्रवाई हुई है।


सरकारी और सैन्य सदस्यों के लिए किताब प्रकाशन क्राइटेरिया राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन इनका उद्देश्य अनावश्यक की रोक लगाना नहीं है। इसे इस तरह से लागू करने की कोशिश की जाती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और फ्रीडम ऑफ स्पीच के बीच एक संतुलन बना रहे।