पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी को एक जुझारू और संघर्षशील नेता के तौर पर देखा जाता है। लेकिन उनके करीब तीन दशक लंबे राजनीतिक करियर में कई ऐसे मौके आए, जब वह राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ती नजर आईं। कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाने से लेकर राष्ट्रीय गठबंधनों से दूरी और अब अपनी ही पार्टी में उभरे विद्रोह तक, ममता को कई बार कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है।

 

ताजा घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बड़ी हार के बाद पार्टी के अंदर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। 58 विधायकों ने बगावती रुख अपना लिया है जिससे पार्टी नेतृत्व के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। राजनीतिक हलकों में इसे ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के सबसे बड़े अंदरूनी संकटों में से एक माना जा रहा है। हालांकि इससे पहले भी कई बार ऐसे मौके आए हैं जब उनकी नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक ताकत पर सवाल उठते रहे हैं।

 

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चार बड़े मौके, जब ममता बनर्जी दिखीं अलग-थलग

  • 1997-98: कांग्रेस से बगावत और नई पार्टी का गठन
    ममता बनर्जी के अकेले सफर की शुरुआत दिसंबर 1997 को हुई, जब पश्चिम बंगाल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से वैचारिक मतभेदों के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। बिना किसी बड़े सांगठनिक ढांचे या दिल्ली के समर्थन के वह बिल्कुल अकेली थीं, जिसके बाद उन्होंने 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना की।
  • 2004: आम चुनाव में पराजय
    साल 2004 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और वह लगभग पूरी तरह से हार गई। बंगाल में TMC ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन सिर्फ एक ही सीट जीत पाई। उस चुनाव में ममता बनर्जी खुद ही पार्टी की एकमात्र सांसद बनकर बचीं। उन्होंने CPM के रबिन देब को 98,429 वोटों से हराया था।
  • 2006: विधानसभा चुनाव में पराजय
    इसके बाद बंगाल विधानसभा चुनाव 2006 में भी TMC को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। उस समय पार्टी ने 257 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन सिर्फ 30 सीटें ही जीत पाई थी। इसके बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने मान लिया था कि ममता अब पूरी तरह अप्रासंगिक और अलग-थलग हो चुकी हैं।
  • 2012: यूपीए सरकार से अलग होने का फैसला
    साल 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालने के बाद ममता बनर्जी मनमोहन सिंह की केंद्र सरकार में एक बहुत अहम सहयोगी थीं। हालांकि, सितंबर 2012 में उन्होंने खुदरा कारोबार में FDI और डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध में सरकार से समर्थन वापस ले लिया। ममता को लगा था कि बाकी क्षेत्रीय पार्टियां भी उनका साथ देंगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बड़े दलों ने उनका समर्थन नहीं किया। जिससे वह राष्ट्रीय राजनीति में काफी हद तक अकेली पड़ गईं।