उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघ मेला में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेला छोड़ कर जाने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि माघ मेले के दौरान हुई घटना से आहत होकर वह स्नान किए बिना वापस लौटने का फैसला कर रहे हैं। उनकी तरह से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि प्रयागराज हमेशा से परंपरा और विश्वास की जमीन रही है लेकिन यहां जो कुछ भी घटित हुआ उसने उनकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। 

 

उन्होंने कहा कि माघ मेले में स्नान करना उनके लिए केवल एक परंपरा नहीं बल्कि गहरी आस्था का विषय था लेकिन मौजूदा हालात में उनका मन इतना व्यथित है कि उन्होंने यह कठिन निर्णय लिया है। उनके अनुसार, संगम तट पर संतों का जिस तरह से अपमान किया गया, उसने न्याय और मानवता के सामूहिक विश्वास पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

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शंकराचार्य के आरोप

शंकराचार्य ने खुलासा किया कि प्रशासन ने उन्हें ससम्मान स्नान कराने और उन पर पुष्पवर्षा करने का प्रस्ताव भेजा था।  उन्होंने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि प्रशासन ने उस दिन की घटना के लिए माफी नहीं मांगी।

 

उन्होंने कहा, 'अगर मैं केवल स्नान करके और पुष्पवर्षा करवाकर लौट जाता, तो यह मेरे उन भक्तों और संतों के साथ अन्याय होता जिनका अपमान हुआ है।' उन्होंने बताया कि पिछले दस-ग्यारह दिनों से वह और उनके अनुयायी न्याय के लिए फुटपाथ पर बैठने को मजबूर थे। 

सरकार का 'दोहरा चरित्र'

गृहमंत्री के बयानों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार संतों के सम्मान की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ माघ मेले में संतों को उनकी चोटी और शिखा पकड़कर घसीटा और पीटा गया। उन्होंने इसकी तुलना मुगल काल के व्यवहार से करते हुए सरकार के दोहरे चरित्र पर निशाना साधा।

 

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'हत्या' का प्रयास

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि संगम तट पर न केवल उनकी भौतिक हत्या का प्रयास हुआ, बल्कि उनकी 'पीठ' की गरिमा को खत्म करने की कोशिश की गई। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे उत्तर प्रदेश सरकार का हाथ है और सनातन विरोधियों को सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

 

प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म करते समय उन्होंने दो मिनट का मौन रखा और कहा कि संतों का अपमान करने वालों को दंड देने के लिए वह भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह भले ही आज संगम से नहाए बिना जा रहे हैं लेकिन अपने पीछे कुछ सवालों को छोड़कर जा रहे हैं जो प्रयागराज में हमेशा गूंजते रहेंगे।