यह कहानी गुजरात के एक सीधे-सादे इंसान बाबूभाई प्रजापति की है, जिनके लिए ईमानदारी सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि जीने का आधार थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। साल 1994 में उन पर मात्र 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। आज के दौर में 20 रुपये की कीमत शायद कुछ भी न हो, लेकिन बाबूभाई के लिए यह उनके चरित्र पर लगा वह काला दाग था, जिसने उनकी पूरी दुनिया उजाड़ कर रख दी। पिछले तीन दशकों से वह इस उम्मीद में जी रहे थे कि एक दिन कानून उन्हें निर्दोष मानकर उनके माथे से भ्रष्टाचार का यह कलंक मिटा देगा।

 

गुजरात हाई कोर्ट ने आखिरकार 30 साल बाद बाबूभाई को बेगुनाह करार देते हुए बरी कर दिया। जब कोर्ट रूम में जज ने उन्हें बरी किया, तो बाबूभाई के चेहरे पर एक ऐसी राहत थी जो शब्दों में बयान नहीं की जा सकती। वह भावुक हो गए और अपने वकील को गले लिया।

 

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फैसला सुन रो पड़े बाबूभाई

जब गुजरात हाई कोर्ट ने इस केसा का फैसला सुनाया तो फैसला सुनते ही बाबूभाई की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने अपने वकील से दिल छू लेने वाली बात कही। उन्होंने कहा, 'वकील साहब, आज मेरे माथे से कलंक हट गया है। अब अगर भगवान मुझे ले भी जाए, तो मुझे कोई दुख नहीं होगा। मैं अब चैन से मर सकता हूं।'

 

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अगले दिन ही हुई मौत

हालांकि, ऐसा लगता है जैसे नियति को ऐसा ही कुछ मंजूर था और बाबूभाई की कही हुई बात सच हो गई। फैसला आने के ठीक अगले ही दिन बाबूभाई प्रजापति का निधन हो गया। उन्होंने 30 साल तक अपनी बेगुनाही की जंग लड़ी और जैसे ही वह जंग जीत ली, उन्होंने अपनी आंखें हमेशा के लिए मूंद लीं। वह इस दुनिया से चले गए, लेकिन एक अपराधी के तौर पर नहीं बल्कि एक बेगुनाह और सम्मानित इंसान के रूप में।