संजय सिंह, पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है। चनपटिया से कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन के एक बयान ने सत्ता और विपक्ष के बीच नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने दावा किया कि राज्यसभा चुनाव के दौरान उन्हें बीजेपी की ओर से ऑफर मिला था, जिसे उन्होंने साफ तौर पर ठुकरा दिया। रंजन ने इसे सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई बताया और कहा कि उनके लिए पार्टी सर्वोपरि है।

 

यह बयान ऐसे समय में आया है जब राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं। मतदान के दौरान चार विधायक में तीन कांग्रेस और एक आजेडी के गैरहाजिर रहे, जिससे सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई। फोन बंद रहने और संपर्क से बाहर रहने की घटनाओं ने ऑपरेशन लोटस जैसे आरोपों को फिर हवा दे दी है। 

NDA पांचों सीट जीती

इधर, एनडीए ने पांचों सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी रणनीतिक बढ़त साबित की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत सभी उम्मीदवारों की जीत ने विपक्ष के लिए यह झटका और गहरा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव भी है।

गैरहाजिर रहे विधायक

रंजन के बयान ने गैरहाजिर विधायकों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन इशारों में प्रलोभन और हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई। इससे गठबंधन के भीतर भरोसे और समन्वय पर बहस तेज हो गई है। 

 

उधर, नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और सदस्यता छोड़ने के तकनीकी पेंच ने भी अटकलों को हवा दी है। उनके राजनीतिक इतिहास को देखते हुए ‘अब क्या होगा’ का सवाल फिर गूंज रहा है। बिहार की राजनीति में फिलहाल सस्पेंस, रणनीति और शक तीनों चरम पर हैं।'