कोलकाता से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने यह साबित कर दिया है कि खून के रिश्ते आज के दौर में भी कितने मजबूत होते हैं। कोलकाता की रहने वाली अनूपा ने अपने बांग्लादेशी भाई को किडनी दान की है। अनुपा का भाई स्वपन बांग्लादेश में मछली का व्यापार करता था। किडनी फेल होने की वजह से वह नौकरी छोड़ चुका था और नियमित डायलिसिस के सहारे जिंदगी जी रहा था।
43 साल के स्वपन को कुछ समय पहले डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी थी, लेकिन किडनी डोनेट करने के लिए कोई व्यक्ति नहीं मिल रहा था। तभी बड़ी बहन अनूपा ने अपने भाई को किडनी दान करने का फैसला किया। इसके बाद 3 जनवरी को डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट का ऑपरेशन किया। यह ऑपरेशन कोलकाता के एक अस्पताल में हुआ।
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1971 में बिछड़े थे भाई-बहन
1971 में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच युद्ध हुआ था। उस दौरान कई परिवार बांग्लादेश से भारत आ गए थे, जिनमें से एक अनूपा का परिवार भी था। उस समय अनूपा की मां गर्भवती थीं। कुछ साल तक परिवार भारत में रहा, फिर वापस बांग्लादेश लौट गया। जब अनुपा शादी के लायक हुईं, तो उनके परिवार ने भारत के बर्दवान में उनकी शादी कराई।
शादी के बाद अनूपा बर्दवान में रहने लगीं, जबकि छोटा भाई स्वपन बांग्लादेश में ही रहा। दो अलग-अलग देशों में रहने के बावजूद दोनों के रिश्ते में कभी कोई दरार नहीं आई। स्वपन की तबीयत खराब होने पर जब उसने नौकरी छोड़ी, तब अनुपा ने उसकी आर्थिक मदद भी की थी।
स्वपन ने खुद बताया कि 'जब देश के हालात सुधरे तो वे बांग्लादेश लौट आए। उस समय वह बच्चा ही था और अपनी बहन को भारत में ही छोड़ आए थे, क्योंकि तब तक उसकी शादी हो चुकी थी।'
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कैसे हुआ किडनी ट्रांसप्लांट
साल 2018 में स्वपन की किडनी पूरी तरह खराब हो गई थी। तब से वह डायलिसिस के सहारे जीवन जी रहे थे। बाद में डॉक्टरों ने जल्द से जल्द किडनी ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी। 55 साल क अनूपा ने डॉक्टरों से कहा कि वह अपने भाई को किडनी देना चाहती हैं। जांच के दौरान डॉक्टरों ने भाई-बहन के बीच 100 प्रतिशत किडनी मैच हो गया।
किडनी ट्रांसप्लांट से पहले अनूपा को कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह प्रक्रिया बेहद लंबी थी, इसलिए अनूपा और स्वपन को काफी समय तक इंतजार करना पड़ा। इस पर अनूपा की बेटी और भतीजी शर्मिता ने बताया कि 'कानूनी कागजात तैयार करने में काफी वक्त लगा, क्योंकि यह किडनी डोनेशन का पहला सीमा-पार (क्रॉस बॉर्डर) मामला था। हालांकि अस्पताल की टीम, खासकर डॉक्टर प्रतीक दास और जयंता मुखर्जी, जो अंतरराष्ट्रीय मरीजों का इलाज करते हैं, ने एनओसी दिलाने के लिए काफी मदद की।'
भारत में किडनी ट्रांसप्लांट का यह पहला मामला नहीं है, लेकिन इस मामले में यह पहली बार हुआ है जब विदेश में रह रहे भाई को एक भारतीय बहन ने किडनी दान की है। ऑपरेशन के बाद अनुपा को एक हफ्ते में छुट्टी दे दी गई, जबकि स्वपन को उसके एक दिन बाद छुट्टी मिली। ऑपरेशन के बाद स्वपन कुछ दिनों तक कोलकाता में ही रुके थे।
