छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चंपा जिले में एक ऐसी सुबह हुई जिसे कोई कभी नहीं भूल पाएगा। दो साल पहले अपना बेटा गंवाने वाले इस परिवार के दो लोगों ने अपनी जान दे दी। सुबह दोनों की लाश घर के आंगन में लगे नीम के पेड़ से लटकती मिली। जान देने वाले लोगों ने एक सुसाइड नोट में लिखकर बताया है कि उन्होंने ऐसा फैसला क्यों लिया। इस परिवार के लेटर से ऐसा लग रहा है कि दो साल पहले हुई घटना से सब सदमे में थे और उसके लिए खुद को जिम्मेदार मान रहे थे।
धारदेई गांव के इस एक परिवार की रौनक तब से खो गई थी जब से उनके बेटे की मौत हुई थी। अब कृष्ण पटेल और उनकी पत्नी रमा बाई के शव एक साथ मिले। अपने इकलौते बेटे आदित्य की मौत के बाद से उनके घर की रौनक खो गई थी।
कृष्ण पटेल पेशे से राजमिस्त्री थे और रमाबाई घर संभालती थीं। उनका 21 साल का बेटा ही उनकी दुनिया था। साल 2024 में एक सड़क हादसे ने सब कुछ बदल दिया। कृष्ण को हमेशा इस बात का पछतावा रहा कि उन्होंने ही आदित्य को मंदिर के काम के लिए बाहर भेजा था। अपने आखिरी खत में कृष्ण ने इसे अपनी 'जिंदगी की सबसे बड़ी गलती' बताया।
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गम में था परिवार
आदित्य की मौत के बाद यह कपल पूरी तरह टूट गया था। पड़ोसियों का कहना है कि पिछले एक से उन्होंने मुस्कुराना छोड़ दिया था। वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे और खुद में ही सिमटकर रह गए थे। कृष्ण ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है, 'आदित्य हमारी जिंदगी की बुनियाद था। उस बुनियाद के गिरते ही हमारा पूरा संसार खत्म सा हो गया। एक साल तक दर्द सहने का बाद हमें लगा कि अब इस दुनिया में उनके लिए अब कुछ नहीं बचा है।'
आखिरी वीडियो और वसीयत की इच्छा
अपनी जान देने से पहले पति-पत्नी ने एक वीडियो रिकॉर्ड किया और चार पन्नों का सुसाइड नोट लिखा। बड़े ही शांत मन से उन्होंने अपने वकील को संदेश दिया कि आदित्य की मौत के बाद मिलने वाले मुआवजे का पैसा उनके बड़े भाइयों, जिनका नाम कुलभारा और जलभारा पटेल है उनको दिया जाएगा। वे नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद किसी तरह का विवाद हो।
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कृष्णा ने अपने खत में लिखा कि अब उनका मन शांत है और उन्हें भगवान की आवाज सुनाई दे रही है। उन्होंने लिखा कि वे अपनी मर्जी से भगवान शिव को खुद को सौंप रहे हैं। उन्होंने गांव वालों और परिवार से गुजारिश की है कि उनके लिए कोई दुखी न हो, बल्कि उन्हें खुशी-खुशी विदा किया जाए। सोमवार की सुबह जब पुलिस पहुंची, तो पूरे गांव की आंखें नम थीं।
