पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में इस हफ्ते माहौल उस समय गर्म हो गया जब पंजाब के छात्र संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पदाधिकारी को एक कार्यक्रम में चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाने का विरोध किया। पंजाब से जुड़े छात्र संगठनों ने इस कार्यक्रम में RSS से जुड़े लोगों को बुलाने पर आपत्ति जताई। विरोध कर रहे छात्रों और पुलिस आमने सामने आ गए और इस दौरान कई छात्रों को हिरासत में भी लिया गया। इस दौरान छात्रों ने आरोप लगाया कि कुछ अमृतधारी सिख छात्रों की कृपाणें भी छीनी गईं और कुछ छात्रों के केशों की बेअदबी भी की गईं। इस हफ्ते यह मामला पूरे पंजाब में चर्चा का विषय बन गया।
पंजाब यूनिवर्सिटी में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की शहादत और 'पंज प्यारे' विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया जा रहा था। इस कार्यक्रम में बीजेपी नेता इकबाल सिंह लालपुरा को मुख्य वक्ता और RSS से जुड़े बनवीर सिंह को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इसी को लेकर कई छात्र संगठनों ने विरोध जताया था। छात्रों को हिरासत में लेने के बावजूद कार्यक्रम के दौरान विरोध देखने को मिला। एक छात्रा ने कार्यक्रम में नेताओं से तीखे सवाल किए और RSS के खिलाफ नारेबाजी भी की। सुरक्षा कर्मियों ने छात्रो को तो कार्यक्रम से बाहर निकाल दिया लेकिन एक सवाल सबके मन में रह गया कि आखिर पंजाब में RSS का इतना विरोध क्यों होता है।
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छात्रों का विरोध क्यों?
यूनिवर्सिटी में इस तरह के कार्यक्रम आए दिन होते रहते हैं और कई बार RSS के वक्ता भी यूनिवर्सिटी में आए लेकिन इस बार छात्रों ने इसका विरोध किया। इसके पीछे मुख्य वजह सिख धर्म और RSS के संबंध हैं। विरोध कर रहे छात्रों ने अकाल तख्त की ओर से साल 2004 में जारी हुक्मनामे का हवाला देते हुए कहा कि इसमें सिख धार्मिक मामलों में आरएसएस की भागीदारी के खिलाफ सलाह दी गई थी।
इस मामले में अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह ने भी यूनिवर्सिटी प्रशासन के साथ बातचीत की थी। छात्रों की मांग थी कि इस कार्यक्रम में संघ से जुड़े लोगों को ना बुलाया जाए। हालांकि, छात्रों के विरोध के बावजूद यह कार्यक्रम हुआ, जिसमें छात्रों और पुलिस के बीच भी संघर्ष देखने को मिला।
पंजाब में RSS का विरोध क्यों?
माना जाता है कि विनायक दामोदर सावरक सिख गुरुओं से प्रेरित थे। संघ भी अपने विचारों को सिख गुरुओं से प्रेरित बताते हैं। सिख गुरुओं की जयंती पर संघ कार्यक्रम भी करता है खासकर पंजाब में। इन सभी दावों और कोशिशों के बावजूद सिख संघ का विरोध करते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मोहन भागवत समेत तमाम लोगों की मेहनत के बावजूद संघ का पंजाब में अन्य राज्यों की तरह सक्रिय संगठन नहीं है।
सिखों की सबसे बड़ी संस्था अकाल तख्त साहिब संघ की विचारधारा को गलत मानती है जिसमें सभी देसी धर्मों को हिंदू राष्ट्र का हिस्सा माना जाता है। जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब संघ ने सिख समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी। संघ की इस कोशिश में कई विवाद पैदा हुए और वह बुरी तरह नाकाम रही। संघ के इन प्रयासों का नतीजा यह निकला की श्री अकाल तख्त साहिब ने सिखों को संघ और उससे जुड़े संगठनों के प्रति सतर्क रहने का आदेश दे दिया था।
संघ कई मौकों पर तर्क देती है कि सिख गुरुओं ने मुगलों से लड़ाई लड़ी और हिंदुओं के लिए जान भी दी। संघ के इस तर्क पर सिख लेखक और इतिहासकार सुखप्रीत सिंह उधोके कहते हैं कि RSS को लगता है कि सिख धर्म ने मुगलों से लड़ाई लड़ी और देसी संस्कृति की रक्षा की। इसलिए RSS सिखों को जैन और बोद्धों की तरह हिंदू राष्ट्र का हिस्सा मानता है, जबकि ईसाइयों और मुस्लमानों को अलग मानता है।
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सिख विचारों से अलग RSS के विचार
सिख समुदाय को RSS के उस विचार से परहेज है जिसमें वह कहते हैं कि सिख गुरुओं ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और देश की संस्कृति की रक्षा की। श्री अकाल तख्त साहिब से जुड़े उधोक सिंह ने बताया कि सिख समुदाय इस विचार का विरोध करता है। सिख समुदाय का इतिहास केवल मुसलमानों के खिलाफ लड़ाई का नहीं है, बल्कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने का है। सिख धर्म के लोग खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं और वे अपनी इस पहचान को बनाए रखना चाहते हैं। सिख समुदाय को डर है कि अगर RSS अपने पैर जमाती है तो सिखों को भी हिंदू धर्म में शामिल कर लिया जाएगा। यही कारण है कि तमाम कोशिशों के बावजूद सिख RSS को पंजाब में पैर जमाने नहीं देते।
