उत्तर प्रदेश में पंचायतों का कार्यकाल इसी महीने खत्म होने वाला लेकिन अभी तक नए चुनाव की गुंजाइश नहीं दिख रही है। इस बीच उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने पंचायत चुनावों के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग के गठन को सोमवार को मंजूरी दे दी है। मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ की अध्यक्षता में सोमवार को हुई कैबिनेट मीटिंग में UP राज्‍य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।

 

पंचायती राज विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी की ओर से जारी प्रस्ताव के मुताबिक,  पांच सदस्यों वाले इस आयोग की अध्यक्षता हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज करेंगे। प्रस्ताव के मुताबिक, इस आयोग में पांच सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार की ओर से ऐसे व्यक्तियों में से की जाएगी, जो पिछड़े वर्गों से संबंधित मामलों का ज्ञान रखते हों। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन पांच सदस्यों में से एक सदस्य हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज होंगे, जिन्हें आयोग का अध्यक्ष बनाया जाएगा।  इस आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल सामान्य तौर पर नियुक्ति से छह महीने तक होगा। 

क्यों बनाना पड़ा पिछड़ा वर्ग आयोग?

प्रस्‍ताव के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन में सरकार ने UP राज्य के त्रिस्तरीय पंचायत निकायों में आरक्षण देने के लिए राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का फैसला लिया है। आयोग को अन्‍य पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को निकायवार आनुपातिक आरक्षण दिए जाने की जिम्मेदारी दी गई है। इसमें त्रिस्तरीय ग्रामीण निकायों (पंचायत) के पदों पर आरक्षण निर्धारण की कार्यवाही की जानी है।प्रस्ताव के अनुसार, राज्य सरकार एक आदेश जारी करके त्रिस्तरीय पंचायतों के स्थानों और पदों को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित करेगी।

 

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क्या काम करेगा आयोग?

राज्य सरकार यह काम इसी पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर करेगी। यह आयोग एक-एक पंचायत की स्टडी करके पता लगाए कि किस क्षेत्र में पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी कितनी है। उसी के अनुपात के आधार पर आरक्षण दिया जागा। बता दें कि यूपी में उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1947 और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत अधिनियम, 1961 के तहत आरक्षण व्यवस्था लागू की जाती है।

 

इन्हीं कानूनों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश पंचायती राज (स्थानों और पदों का आरक्षण और आवंटन) नियमावली, 1994 और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत (स्थानों और पदों का आरक्षण और आवंटन) नियमावली, 1994 लागू हैं। इन दोनों नियमावलियों के जरिए ही यह तय होता है कि ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के सदस्य और अध्यक्ष के कितने पद कहां और कैसे आरक्षित किए जाएंगे।

 

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राज्य सरकार, संविधान के अनुच्छेद 243D और अन्य नियमों का इस्तेमाल करते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए भी आरक्षण निर्धारित करती है। यह आरक्षण भी जनसंख्या के अनुपात में ही निर्धारित की जाएगी। बता दें कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण त्रिस्तरीय पंचायतों के पदों की कुल संख्या के 27 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगा। अगर पिछड़े वर्गों की जनसंख्या के आंकड़े उपलब्ध न हों तो नियत रीति से सर्वेक्षण करके उनकी जनसंख्या निर्धारित की जा सकती है। 

कितना बड़ा है पंचायत का सिस्टम?

यूपी में जिला पंचायत अध्यक्ष के 75, जिला पंचायत सदस्य के 3051, क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष के 826, जिला पंचायत सदस्य के 75855 और ग्राम पंचायत अध्यक्ष के कुल 57695 पद हैं। आमतौर पर इनमें रोटेशन के आधार पर आरक्षण लागू होता है। उदाहरण के लिए- किसी ग्रामसभा में एक बार प्रधान की सीट सामान्य वर्ग के लिए होती है तो अगली बार ओबीसी या एससी के लिए आरक्षित हो जाता है। इसी तरह महिलाओं के लिए भी सीट आरक्षित होती है। हालांकि, कितनी सीटें आरक्षित होनी हैं यह पहले से तय होता है।