उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला 2018 में हुए ट्रेन हादसे को लेकर है, जहां गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत के बाद 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। इस ट्रेन हादसे में एक गर्भवती महिला की मौत हुई थी। यह आदेश देते वक्त कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि गर्भ में पल रहे बच्चे को भी जीवित बच्चा मानना चाहिए।
यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार को सुनाया। यह महिला 2018 में ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गई थी, जिस वजह से उनकी मौत हो गई। साथ ही उनके गर्भ में पल रहे 5 महीने के बच्चे की भी जान चली गई थी। रेलवे दावा अधिकरण ने सिर्फ महिला को मुआवजा दिया था। गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत पर मुआवजा देने से मना कर दिया था। इसके बाद महिला के परिवार वालों ने बच्चे के मुआवजे के लिए कोर्ट में अपील दर्ज कराई।
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इस मामले पर कोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले में जब कोर्ट को पता चला कि महिला के गर्भ में पल रहा बच्चा 8 से 9 महीने का था, तब जज ने कहा कि अगर गर्भ में पल रहा बच्चा 5 महीने से ज्यादा का है, तो उसे भी जीवित व्यक्ति माना जाना चाहिए।
बेंच ने आगे कहा, 'अजन्मे बच्चे को, जिसका अभी जन्म नहीं हुआ है, उसे एक 'व्यक्ति' माना जाता है, जिसकी मृत्यु के लिए मुआवजे का दावा किया जा सकता है।' अपीलकर्ता गर्भस्थ शिशु को एक बच्चे के रूप में मानते हुए उसके नुकसान के लिए अलग से मुआवजा लेने के हकदार हैं। बता दें, यह फैसला जस्टिस प्रशांत कुमार ने सुनाया है।
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क्यों तारीफ हो रही है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला एक मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है। कहीं न कहीं कोर्ट ने अजन्मे बच्चों के 'जीने के अधिकार' को अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता दी है। इस फैसले से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अब ऐसी किसी भी दुर्घटना (सड़क या रेल) में गर्भस्थ शिशु की मृत्यु होने पर परिवार कानूनी तौर पर मुआवजे का हकदार होगा।
