पॉन्जी योजना सिर्फ साधारण धोखाधड़ी नहीं होती बल्कि यह लोगों के पैसों पर चलने वाला एक नकली कमाई का सिस्टम होता है। इसमें लोगों को ज्यादा रिटर्न, हर महीने तय कमाई और जल्दी पैसा डबल होने का लालच दिया जाता है। शुरुआत में लोगों को समय पर पैसा भी दिया जाता है ताकि भरोसा बना रहे। असल में वहां कोई मजबूत बिजनेस नहीं चल रहा होता। पुराने लोगों को पैसा नए लोगों से लिए गए पैसों में से दिया जाता रहता है।
यही वजह है कि जब तक नए लोग जुड़ते रहते हैं तब तक पूरा सिस्टम सही दिखाई देता है। धीरे-धीरे यह एक बड़े नेटवर्क में बदल जाता है, जहां एजेंट, सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप और रेफरल सिस्टम के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ा जाता है। जैसे ही नया पैसा आना कम होता है, पेमेंट रुकने लगती है और पूरा नेटवर्क टूटने लगता है। भारत में पिछले कुछ सालों में ऐसे कई बड़े मामले सामने आए हैं जहां हजारों करोड़ रुपये जुटाए गए और लाखों लोग प्रभावित हुए।
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भारत में कितना बड़ा है जाल
साल 2019 से 2022 के बीच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने पॉन्जी योजनाओं से जुड़ी 132 कंपनियों और संस्थाओं पर मामले दर्ज किए थे। इसी दौरान एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) ने 87 धन शोधन जांच शुरू की थीं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पर जमा योजनाओं और पैसा वापस न मिलने से जुड़ी 1,540 शिकायतें भी दर्ज हुई थीं। यह दिखाता है कि बड़ी संख्या में लोग ऐसे जाल में फंस चुके हैं।
कई योजनाएं खुद को डिजिटल कॉइन, फॉरेक्स ट्रेडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या ऑनलाइन निवेश प्लेटफॉर्म बताकर लोगों को जोड़ रही हैं। मोबाइल स्क्रीन पर लोगों को बढ़ती कमाई दिखाई जाती है ताकि भरोसा बना रहे और लोग ज्यादा पैसा लगाते रहें।
रोज वैली बनी बड़ी उदाहरण
भारत में सामने आए सबसे बड़े पॉन्जी मामलों में रोज वैली चिटफंड का नाम भी शामिल है। ईडी के मुताबिक रोज वैली दल ने पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और दूसरे राज्यों के लोगों से करीब 17,520 करोड़ रुपये जुटाए थे। जांच में पता चला कि करीब 6,666 करोड़ रुपये लोगों को वापस नहीं मिले।
इस मामले में लाखों लोग प्रभावित हुए थे। अप्रैल 2026 तक ईडी ने करीब 1.73 लाख लोगों को 127.69 करोड़ रुपये लौटाने की प्रक्रिया पूरी होने की जानकारी दी थी। रोज वैली का नेटवर्क गांवों और छोटे शहरों तक फैल गया था। एजेंट लोगों को ज्यादा कमाई और सुरक्षित निवेश का भरोसा देते थे। इसी भरोसे में कई लोगों ने अपनी सालों की बचत तक इसमें लगा दी थी।
फाल्कन से बढ़ी चिंता
हाल के वर्षों में पर्लवाइन और फाल्कन जैसे मामले भी काफी चर्चा में रहे। साल 2025 में ईडी की जांच में सामने आया कि पर्लवाइन नाम की योजना ने करीब 1,575 करोड़ रुपये जुटाए थे। जांच के मुताबिक करीब 395 करोड़ रुपये लोगों को वापस नहीं मिले। कंपनी का दावा था कि उसके करीब 80 लाख सदस्य हैं। इसी तरह फाल्कन इनवॉइस डिस्काउंटिंग प्लेटफॉर्म पर भी बड़ा नेटवर्क चलाने के आरोप लगे। जांच एजेंसियों के मुताबिक इस प्लेटफॉर्म ने करीब 1,700 करोड़ रुपये जुटाए थे और लोगों को 11 प्रतिशत से 22 प्रतिशत तक रिटर्न देने का वादा किया गया था।
जांच एजेंसियों के सामने चुनौती
जांच एजेंसियों का कहना है कि अब कई योजनाएं खुद को विदेशी बिजनेस, नई तकनीक या ऑनलाइन निवेश प्लेटफॉर्म बताकर लोगों को जोड़ रही हैं। कुछ मामलों में बिना किसी सरकारी मंजूरी के काम किया गया जबकि कई जगह अलग-अलग कंपनियों और खातों के जरिए पैसों को घुमाने के आरोप भी लगे।
बाहर से ये योजनाएं काफी मजबूत और भरोसेमंद दिखाई देती हैं लेकिन अंदर से पूरा सिस्टम सिर्फ नए लोगों के पैसों पर चलता है। वहां कोई ऐसा मजबूत बिजनेस नहीं होता जिससे लगातार कमाई हो सके। यही वजह है कि जैसे ही नया पैसा आना कम होता है पेमेंट रुकने लगती है और पूरा नेटवर्क टूटने लगता है।
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ऐसे मामलों से कैसे बचे?
एक्सपर्ट का कहना है कि लोगों को ज्यादा रिटर्न और जल्दी पैसा डबल होने वाले वादों से सावधान रहना चाहिए। किसी भी योजना में पैसा लगाने से पहले यह देख लेना जरूरी है कि कंपनी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) या आरबीआई जैसी सरकारी एजेंसियों में रजिस्टर्ड है या नहीं। सिर्फ सोशल मीडिया प्रचार, एजेंटों की बातों या कमाई के स्क्रीनशॉट देखकर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि कई मामलों में इसी तरह लोगों का भरोसा जीतकर बड़ा नेटवर्क बनाया गया।।
