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थोक महंगाई 8% के पार, क्या रोटी, कपड़ा और मकान भी महंगे होने वाले हैं?

कंपनियों के लिए सामान बनाना महंगा हो गया है लेकिन आम लोगों तक इसका असर अभी नहीं पहुंचा है। अगर यह हालात लंबे समय तक रही तो आने वाले दिनों में महंगाई और आपकी EMI बढ़ सकती है।

AI Generated of Rising Inflation

प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

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भारत में इस समय महंगाई को लेकर एक बहुत अलग तरह की स्थिति देखने को मिल रही है। एक तरफ फैक्ट्री और बिजनेस का खर्च तेजी से बढ़ रहा है लेकिन दूसरी तरफ आम लोगों को अभी उसका पूरा असर महसूस नहीं हो रहा। यही वजह है कि इस समय होलसेल और रिटेल इन्फ्लेशन के बीच बड़ा गैप बन गया है। अप्रैल 2026 में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) करीब 3.48% रहा जबकि होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) अचानक बढ़कर 8.3% तक पहुंच गया। मतलब कंपनियों और प्रोड्यूसर्स पर महंगाई का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ चुका है लेकिन दुकानों और बाजार में उसका पूरा असर अभी नहीं दिख रहा।

 

कंपनियों को सामान बनाने में पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। तेल महंगा हो चुका है, ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ गया है और फैक्ट्री कॉस्ट भी ऊपर चली गई है लेकिन अभी कंपनियां उस पूरे को सीधे ग्राहकों पर नहीं डाल रही हैं। यही वजह है कि फिलहाल रिटेल इन्फ्लेशन कंट्रोल में दिख रही है। एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि अगर यही हालात लंबे समय तक बनी रही तो आने वाले महीनों में इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।

 

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खुदरा महंगाई क्या होती है?

खुदरा महंगाई वह है जहां आम लोगों को रोजमर्रा की चीजें महंगी मिलने लगती हैं। खाने-पीने का सामान, किराया, बिजली बिल, ट्रांसपोर्ट, स्कूल फीस और रोजमर्रा की जरूरत की चीजें कितनी महंगी हो रही हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जाता है। अप्रैल 2026 में ओवरऑल रिटेल इन्फ्लेशन यानी खुदरा महंगाई की दर करीब 3.48% रही। वहीं फूड इन्फ्लेशन की दर करीब 4.20% और हाउसिंग इन्फ्लेशन की दर लगभग 2.15% रही। इसका मतलब यह है कि फिलहाल आम लोगों के खर्च में बहुत तेज बढ़ोतरी नहीं दिख रही। यही वजह है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) अभी महंगाई को लेकर बहुत ज्यादा परेशान नहीं दिख रहा क्योंकि उसका ध्यान खुदरा महंगाई पर रहता है।

थोक महंगाई इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?

थोक महंगाई बिजनेस और फैक्ट्री स्तर की महंगाई को दिखाता है। इसमें यह देखा जाता है कि कंपनियों को सामान बनाने में कितने का खर्च आ रहा है। इसमें ईंधन, कच्चा माल, बिजली, ट्रांसपोर्ट, इंडस्ट्रियल इनपुट और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट जैसी चीजें शामिल होती हैं। इसका असर फ्यूल एंड पावर कैटेगरी में देखने को मिला, जहां महंगाई की दर करीब 24.71% रही। वहीं पेट्रोलियम और नेचुरल गैस से जुड़े प्रोडक्ट्स में करीब 67.2% तक की तेजी देखने को मिली। इसका सीधा मतलब है कि कंपनियों का खर्च बहुत तेजी से बढ़ रहा है और सामान बनाना पहले के मुकाबले काफी महंगा हो चुका है।

अभी असर क्यों नहीं दिख रहा?

रॉयटर्स कि रिपोर्ट बताया है कि सरकार और ऑयल कंपनियां अभी पूरा बोझ सीधे लोगों पर पास नहीं कर रही हैं। इसके अलावा कई कंपनियां भी अपने मुनाफे का मार्जिन कम करके काम चला रही हैं ताकि ग्राहकों पर ज्यादा असर न पड़े और बिक्री बनी रहे। यानी फिलहाल कारोबारी खुद कुछ दबाव झेल रहे हैं। इसी वजह से खुदरा महंगाई अभी कंट्रोल में दिखाई दे रही है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो कंपनियां धीरे-धीरे सामान की कीमतें बढ़ाना शुरू कर सकती हैं और फिर उसका असर सीधे आम लोगों पर दिखाई देगा।

 

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RBI के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?

अभी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इसलिए थोड़ी राहत में दिखाई दे रही है क्योंकि खुदरा महंगाई की दर उसके 4%  के टारगेट के नीचे बनी हुई है। वहीं, थोक महंगाई आने वाले समय के दबाव का संकेत दे रही है। अगर आने वाले महीनों में CPI भी तेजी से बढ़ना शुरू करती है तो आरबीआई ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। इसका असर सीधे लोन और EMI पर पड़ सकता है। होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन लंबे समय तक महंगे रह सकते हैं और लोगों को सस्ती EMI के लिए ज्यादा इंतजार करना पड़ सकता है।

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