जब भी इकॉनमी खराब होने या मंदी आने की बात शुरू होती है तब ज्यादातर लोग शेयर मार्केट को देखने लगते हैं। अगर मार्केट गिरने लगे तो लोगों को लगने लगता है कि शायद आगे दिक्कत आ सकती है लेकिन बड़े इन्वेस्टर्स और इकॉनमी एक्सपर्ट्स सबसे पहले शेयर मार्केट नहीं बल्कि बॉन्ड मार्केट को देखते हैं। इसकी वजह यह है कि कई बार बॉन्ड मार्केट पहले ही बता देती है कि आगे इकॉनमी स्लो हो सकती है। इसी बॉन्ड मार्केट में एक चीज होती है जिसे 'बॉन्ड यील्ड कर्व' कहा जाता है। यह बस इतना दिखाती है कि अलग-अलग समय वाले सरकारी बॉन्ड्स पर कितना रिटर्न मिल रहा है और इन्वेस्टर्स आगे की इकॉनमी को लेकर क्या सोच रहे हैं। अगर सबकुछ ठीक चल रहा हो तो लंबे समय वाले बॉन्ड्स पर ज्यादा रिटर्न मिलता है लेकिन जब लोगों को डर लगने लगता है कि आगे इकॉनमी कमजोर पड़ सकती है तब यह पूरा पैटर्न बदल जाता है।

 

सरकार जब पैसा जुटाती है तो वह अलग-अलग समय के लिए बॉन्ड जारी करती है। कुछ बॉन्ड 3 महीने के होते हैं कुछ 2 साल, 10 साल और 30 साल तक के भी होते हैं। इन बॉन्ड्स पर सरकार जो ब्याज देती है, उसे 'यील्ड' कहा जाता है। जब इन सभी बॉन्ड्स की यील्ड को एक ग्राफ में दिखाया जाता है तो उसे बॉन्ड यील्ड कर्व कहा जाता है। आमतौर पर लंबे समय वाले बॉन्ड्स पर ज्यादा रिटर्न मिलता है क्योंकि पैसा ज्यादा समय तक फंसा रहता है। इसलिए नॉर्मल हालत में यील्ड कर्व ऊपर जाती हुई दिखाई देती है।

 

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नॉर्मल यील्ड कर्व क्या बताती है?

जैसे 2 साल वाले बॉन्ड पर 6% रिटर्न मिल रहा है और 10 साल वाले बॉन्ड पर 7% रिटर्न मिल रहा है तो इसे नॉर्मल माना जाता है। इसका मतलब होता है कि आगे इकॉनमी ठीक चलेगी और ग्रोथ बनी रहेगी। ऐसे समय में बैंक आसानी से लोन देते हैं, कंपनियां नए प्रोजेक्ट्स शुरू करती हैं और मार्केट में भरोसा बना रहता है। इसलिए इसे अच्छी इकॉनमी का संकेत माना जाता है।

 

परेशानी तब शुरू होती है जब छोटे समय वाले बॉन्ड्स का रिटर्न, लंबे समय वाले बॉन्ड्स से ज्यादा हो जाता है। इसे 'इनवर्टेड यील्ड कर्व' कहा जाता है। जैसे अगर 2 साल वाले बॉन्ड पर 7% रिटर्न मिल रहा हो और 10 साल वाले बॉन्ड पर 6.5% मिल रहा हो तो यह नॉर्मल स्थिति नहीं मानी जाती। इसका मतलब होता है कि इन्वेस्टर्स को लग रहा है कि आगे इकॉनमी कमजोर पड़ सकती है। लोगों को डर होता है कि बिजनेस की ग्रोथ कम हो सकती है और आगे चलकर इंटरेस्ट रेट्स भी नीचे आ सकते हैं।

भारत में अभी बॉन्ड यील्ड कर्व क्या संकेत दे रही है?

भारत की स्थिति अमेरिका जैसी पूरी तरह 'इनवर्टेड' नहीं मानी जा रही है लेकिन बॉन्ड मार्केट में लगातार बदलाव जरूर दिख रहे हैं। 2025 और 2026 में RBI ने कई बार ब्याज कीमतों में बदलाव किए लेकिन उसके बाद भी लंबे समय वाले बॉन्ड्स की यील्ड बहुत तेजी से नीचे नहीं आई। इसका मतलब यह है कि मार्केट सिर्फ RBI के फैसलों को नहीं बल्कि दुनिया की पूरी स्थिति को देखकर चल रही है।

 

इकॉनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की यील्ड कर्व अभी पूरी तरह खतरे का संकेत नहीं दे रही लेकिन मार्केट काफी सावधानी से चल रही है। 1 साल वाले बॉन्ड्स की यील्ड करीब 5.4% के आसपास रही जबकि 10 साल वाले बॉन्ड्स की यील्ड करीब 6.6% के आसपास बनी रही। इसका मतलब है कि मार्केट को अभी भारत की लॉन्ग टर्म ग्रोथ पर भरोसा है लेकिन दुनिया में चल रही दुविधा को लेकर चिंता भी बनी हुई है।

अभी भारत के बॉन्ड मार्केट में क्या दिख रहा है?

हाल के महीनों में भारत के 10 साल वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड फिर से बढ़ने लगी है। इसकी वजह सिर्फ भारत नहीं बल्कि अमेरिका की बॉन्ड यील्ड, डॉलर की मजबूती और ग्लोबल डर भी है। कई मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी भारत की यील्ड कर्व पूरी तरह रिसेशन का संकेत नहीं दे रही लेकिन मार्केट काफी सतर्क जरूर है। RBI लगातार लिक्विडिटी और बॉन्ड खरीद के जरिए मार्केट को संभालने की कोशिश कर रहा है ताकि बॉन्ड यील्ड बहुत तेजी से ऊपर न जाए।

 

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आम लोगों को इससे क्या फर्क पड़ सकता है?

अगर बॉन्ड यील्ड लगातार बढ़ती है या मार्केट में डर बढ़ता है तो उसका असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है। होम लोन और दूसरे लोन महंगे हो सकते हैं। कंपनियां खर्च कम कर सकती हैं और नई भर्ती भी स्लो हो सकती है। शेयर मार्केट और म्यूचुअल फंड्स में भी उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। इसी वजह से दुनिया के बड़े इन्वेस्टर्स, बैंक और सरकारें बॉन्ड यील्ड कर्व को बहुत ध्यान से देखते हैं। क्योंकि कई बार यह शेयर मार्केट से पहले ही बता देती है कि आगे इकॉनमी में क्या होने वाला है।