भारत में गर्मी का मौसम चल रहा है। गेहूं की कटाई के बाद जायद की फसलों की बुवाई हो रही है और कई राज्यों में खरीफ की फसलों के लिए खेत तैयार किए जा रहे हैं। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील ने हर किसी का ध्यान खींचा है। स्वदेशी चीजों का इस्तेमाल करने, सोना ना खरीदने और तेल का इस्तेमाल करने से जुड़ी पीएम मोदी की अपील में ऑर्गैनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ाने की अपील भी शामिल थी। इसकी बड़ी वजह है कि भारत में रासायनिक खाद का या तो आयात होता है या फिर उन्हें बनाने वाले कच्चे माल को दूसरे देशों से खरीदा जाता है। यह आयात हर साल बढ़ता जा रहा है और देश का बहुत सारा पैसा इस पर खर्च हो रहा है। ऐसे में पीएम मोदी की अपील ने इस ओर भी ध्यान खींचा है।

 

हर साल चीन, सऊदी अरब और मोरक्कों जैसे देशों से लाखों टन रासायनिक खाद खरीदने वाले भारत को इसके लिए भारी भरकम मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इस तरह मंगाई गई खाद पर ही भारत सरकार सब्सिडी भी देती है ताकि किसानों को कम दाम में खाद उपलब्ध हो सके। इस सब्सिडी पर भी सरकार का अच्छा-खासा बजट खर्च होता है। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझें और यह जानें कि विदेशी खाद आखिर देश की जेब को कितनी ढीली करती है।

भारत की खेती को समझिए

भारत में प्रमुख तौर पर दो फसलें ली जाती हैं और कुछ इलाकों में तीन या चार फसलें भी ली जाती हैं। धान, गेहूं, कपास और गन्ना जैसी फसलों के लिए खाद की भरपूर जरूरत पड़ती है। पूर्व में गोबर की खाद और अन्य पारंपरिक खादों पर निर्भर रहे भारत में बीते कई दशकों से रासायनिक उर्वरकों जैसे कि यूरिया, डीएपी और पोटाश पर निर्भरता बढ़ गई है। बीते कुछ साल में बारिश के बदलते पैटर्न के चलते उत्पादन बढ़ाने और फसल जल्दी तैयार करने के लिए भी खाद की जरूरत बढ़ी है।

 

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भारत में कई खाद फैक्ट्रियां हैं लेकिन उनमें खाद बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल जैसे कि फॉस्फोरिक एसिड, रॉक फॉस्फेट आदि दूसरे देशों से मंगाया जाता है। यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ने, गैस और कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित होने से खाद तैयार करने की लागत बढ़ जाती है और सप्लाई प्रभावित होती है। बीते रबी सीजन में देश के कई राज्यों में यह देखा गया कि खाद की कमी के चलते सरकारी दुकानों पर लंबी-लंबी लाइनें लगीं फिर भी कई किसान बिना खाद के ही खेती करने पर मजबूर हुए।

कितनी है खाद की खपत?

संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक, पिछले साल रबी सीजन में यूरिया की जरूरत 192.20 लाख मीट्रिक टन, DAP की 52.80 लाख मीट्रिक टन, पोटाश की जरूरत 15.23 लाख मीट्रिक टन और NPK की जरूरत 80.57 लाख मीट्रिक टन थी। आंकड़ों के मुताबिक, उस वक्त भारत में स्टॉक पर्याप्त था और किसानों को पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध भी कराई गई।

 

बता दें कि बीते कुछ साल में खाद की जरूरत में तेजी से इजाफा हुआ है जिसके चलते आयात भी बढ़ा है और भारत का खर्च भी बढ़ा है। भारत की मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2022-23 में भारत ने खाद के आयात पर रिकॉर्ड 17.21 बिलियन डॉलर यानी लगभग 1.45 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। अगले दो साल इसमें कमी आई लेकिन 2025-26 में इसके 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

 

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आयात पर निर्भर है खाद का काम

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश में खाद के उत्पादन के लिए जरूरी रॉक फॉस्फेट का 86 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से आता है। इसी तरह सल्फर का 52 प्रतिशत, यूरिया के लिए नेचुरल गैस का 78 प्रतिशत, अन्य खादों के लिए अमोनिया का 75 पर्सेंट, फॉस्फोरिक एसिड का 52 प्रतिशत और म्यूरिएट ऑफ पोटाश का 100 प्रतिशत हिस्सा विदेश से ही आता है।

 

इन केमिकल्स का सबसे ज्यादा आयात चीन से होता है। संसद में दिए गए जवाब के मुताबिक, भारत इन केमिकल्स का 73.71 प्रतिशत चीन से आयात करता है और इस पर 3204 मिलियन डॉलर यानी लगभग 30 हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यूरोपियन यूनियन से 13.64 प्रतिशत, सिंगापुर से 2.49 प्रतिशत और अमेरिका से 1.96 प्रतिशत केमिकल का आयात होता है। 

 

अगर प्रमुख खादों के आयात की बात करें तो साल 2024-25 में 56.47 लाख मीट्रिक टन यूरिया, 45.69 लाख मीट्रिक टन DAP, 35.41 लाख मीट्रिक टन पोटाश और 22.72 लाख मीट्रिक टन NPK का आयात किया गया। यूरिया के आयात को देखें तो 2020-21 में यह 98.28 लाख मीट्रिक टन था यानी इसके आयात में कमी आई है। हालांकि, इन पांच साल में NPK का आयात तेजी से बढ़ा है। 2020-21 में NPK का आयात 13.90 लाख मीट्रिक टन था जो 2024-25 में बढ़कर 22.72 लाख मीट्रिक टन हो गया। यहां यह बताना जरूरी है कि इन केमिकल के अलावा कुछ खादें भी दूसरे देशों से मंगाई जाती हैं।

 

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सब्सिडी पर कितना होता है खर्च?

बीते संसद सत्र में सांसद एम के विष्णु प्रसाद ने खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी से जुड़ा एक सवाल लोकसभा में पूछा था। उन्होंने पूछा था पिछले चार साल में यूरिया के लिए सरकार ने कितनी सब्सिडी दी? साथ ही, यह भी पूछा था कि सब्सिडी में कितनी बढ़ोतरी हुई है और सप्लाई सुचारु रूप से जारी रखने के लिए क्या प्रयास किए गए हैं? इसका जवाब केमिकल्स और फर्टिलाइजर्स मंत्रालय की राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने दिया।

 

अनुप्रिया पटेल की ओर से दिए गए जवाब के मुताबिक, केंद्र सरकार डायरेक्टर बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के तहत सब्सिडी ट्रांसफर करती है। यह सब्सिडी खाद कंपनियों को अलग-अलग ग्रेड के आधार पर दी जाती है। आंकड़ों के मुताबिक, 2021-22 में कुल 1.04 लाख करोड़, 2022-23 में 1.68 लाख करोड़, 2023-24 में 1.3 लाख करोड़, 2024-25 में 1.24 लाख करोड़ और 2025-26 में 23 मार्च तक कुल 1.36 लाख करोड़ रुपये सब्सिडी के रूप में दिए गए।

 

यह भी बताया गया कि खाद की सप्लाई बनाए रखने के लिए सरकार ने भारतीय खाद कंपनियों और कई देशों के बीच लॉन्ग टर्म एग्रीमेंट और मेमोरैंडा ऑफ अंडरस्टैंडिंग साइन कराने की मांग की गई है। इसी के चलते कई कंपिनयों ने सऊदी अरब, मोरक्को और रूस से समझौते किए हैं। इसी तरह जोर्डन, रूस, तुर्कमेनिस्तान, इजरायल, कनाडा और बेलारुस से भी समझौते किए गए हैं।