सोना, तेल और खाद कम खरीदने की बात क्यों कर रहे PM मोदी? सच बताएंगे आंकड़े
PM मोदी ने देश के लोगों से अपील की है कि वे कम से कम एक साल तक सोना ना खरीदें। उन्होंने खाद और कच्चे तेल के आयात को लेकर भी चिंता जताई है। आइए इसकी वजह जानते हैं।

पीएम मोदी ने की अपील, Photo Credit: ChatGPT
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील अब चर्चा का विषय बन गई है। मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए पीएम मोदी ने देश के लोगों से अपील की है कि जितना संभव हो लोग वर्क फ्रॉम होम करें, स्वदेशी चीजें खरीदें, एक साल तक सोना न खरीदें और सार्वजनिक परिवहन के साधनों का इस्तेमाल करके तेल बचाएं। उनकी इस अपील पर तरह-तरह की चर्चा हो रही है। पीएम मोदी के इसी बयान को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी का कहना है कि यह पीएम मोदी की नीतियों की नाकामी का सबूत है।
पीएम मोदी ने रविवार को कहा था कि युद्ध की वजह से पेट्रोल और खाद की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि जब सप्लाई चेन पर दबाव होता है तो संकट से निपटने के विभिन्न उपायों के बावजूद मुश्किलें बढ़ जाती हैं। उन्होंने कहा, 'वैश्विक संकट के दौरान, देश को सर्वोपरि रखते हुए, हमें संकल्प लेने होंगे। इसीलिए, वैश्विक संकट के दौरान, देश को सर्वोपरि रखते हुए, हमें संकल्प लेने होंगे। हमने कोरोना काल में घर से काम करना, डिजिटल माध्यम से बैठक, वीडियो कॉन्फ्रेंस और कई अन्य तरीके विकसित किए हैं। हम इनके अभ्यस्त हो गए हैं। इस समय की आवश्यकता है कि हम इन तरीकों को फिर से शुरू करें।'
अब यहां यह समझने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री ने इन्हीं चीजों की ही बात क्यों की? इसका पहला कारण तो ईरान-अमेरिका के टकराव की स्थिति है लेकिन इसके दूरगामी लक्ष्य भी समझ आते हैं। एक वजह यह भी है कि इन्हीं चीजों पर भारत को खूब पैसे खर्च करने पड़ते हैं और लंबे समय से भारत की इकॉनमी इसे झेलती रही है। आइए इसे विस्तार समझते हैं कि आखिर पीएम मोदी की इस अपील को मान लेने से क्या फर्क पड़ेगा और वह इस तरह की अपील क्यों कर रहे हैं...
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सोने के आयात ने किया बेहाल
भारत के लोग सोना खूब खरीदते हैं। इकॉनमी के लिए यह अच्छी बात है कि लोग खरीदारी करें लेकिन सोने के मामले में भारत के लिए यह एक दिक्कत है। वजह है कि भारत में सोने की जितनी जरूरत है उसका लगभग 99 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए ही पूरा होता है। बीते कुछ साल में सोने के दाम में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है लेकिन सोने के आयात में मामूली कमी आई है। अगर पैसों के हिसाब से देखें तो बढ़ोतरी ही हुई है लेकिन मात्रा में कमी आई है। रुपये के हिसाब से देखें तो एक साल में सोने के आयात पर खर्च होने वाले पैसों में लगभग 24 प्रतिशत का इजाफा हुआ।
मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के मुताबिक, साल 2025-26 में भारत के लोगों ने कुल 71.98 अरब डॉलर यानी 6.69 लाख करोड़ के सोने का आयात किया। 3 साल में सोने के आयात पर होने वाले खर्च में दोगुने की बढ़ोतरी हुई है। यह तब है जब तीन साल में सोने की कीमत दोगुने से भी ज्यादा बढ़ी है।
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आयात होने वाले सोने की मात्रा में कमी आई है लेकिन दाम बढ़ने के चलते पैसे ज्यादा खर्च हुए हैं। 2025-26 में कुल 721.03 टन सोने का आयात हुआ जबकि 2024-25 में सोने का आयात 757.09 टन था। भारत अपने सोने का आयात स्विटजरलैंड और अरब के देशों से करता है जिसके चलते विदेशी मुद्रा खूब खर्च होती है और देश की इकॉनमी भी इससे प्रभावित होती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कम से कम एक साल तक सोना ना खरीदने की अपील कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो देश की इकॉनमी पर असर पड़ेगा और दूसरे देशों में जाने वाला पैसा भारत में ही रहेगा और लोग इसी पैसे को दूसरी जगहों पर खर्च कर सकते हैं। हालांकि, इस स्थिति में गहनों से जुड़े कारोबारियों और अन्य लोगों पर बुरा असर पड़ सकता है।

तेल पर इतना जोर क्यों?
भारत में एक छोटी सी मोटरसाइकिल से लेकर हवाई जहाज और बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में लगे इंजन तक तेल से ही चलते हैं। यही वजह है कि भारत को भारी मात्रा में तेल और गैस जैसी चीजें खरीदनी पड़ती हैं। भारत में तेल और गैस का उत्पादन नहीं होता तो उसे दूसरे देशों से ये चीजें खरीदनी पड़ती हैं और इसके लिए भी भारत की विदेशी मुद्रा खूब खर्च होती है। भारत की तेल जरूरतों में से लगभग 87 प्रतिशत की आपूर्ति आयात से ही पूरी होती है।
मौजूदा वक्त में भारत हर साल लगभग 11.32 लाख करोड़ रुपये सिर्फ कच्चा तेल और इससे जुड़े उत्पाद खरीदने पर खर्च कर रहा है। ईरान-अमेरिका के बीच बिगड़े हालात, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने और अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है और भारत का पैसा खूब खर्च हो रहा है। भारत में आम ग्राहकों के लिए डीजल और पेट्रोल के दाम तो नहीं बढ़े हैं लेकिन तेल कंपनियों की जेब ढीली हो रही है। यही वजह है कि पीएम मोदी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बात कर रहे हैं ताकि तेल पर निर्भरता में थोड़ी-बहुत कमी लाई जा सके।
खाद पर कितना खर्च करता है भारत?
भारत में खेती ही सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देती है। ज्यादातर लोग अपने खाने-पीने की जरूरतों और व्यवसाय के लिए भी इसी पर निर्भर हैं। खेतों में उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत खाद का आयात खूब करता है। घरेलू उत्पादन के बावजूद भारत को बड़ी मात्रा में खाद का आयात करना पड़ता है। इसके लिए भारत चीन, रूस, मोरक्को और सऊदी अरब जैसे देशों से खाद का आयात करता है।
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सरकारी अनुमान के मुताबिक, इस साल भारत में खाद के आयात पर होने वाला खर्च 18 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है यानी लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये खाद पर खर्च हो सकते हैं।
स्वदेशी पर इतना जोर क्यों?
इसी तरह भारत खाने वाले तेल का भी खूब आयात करता है। कच्चा तेल, खाद, सोना और खाने वाले तेल के अलावा केमिकल, मशीनी, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक आइटम के आयात पर भी भारत हर साल एक बड़ी रकम खर्च करता है क्योंकि इनका कोई विकल्प मौजूद नहीं है। मौजूदा स्थिति के मुताबिक, अगर कीमतें बढ़ती रहीं तो कच्चे तेल जैसी चीजों पर ही अगले एक साल में भारत का खर्च एक-दो साल में काफी बढ़ जाएगा।
चिंता की बात यह है कि इन सभी चीजों के आयात में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। सोने के आयात में 24 प्रतिशत तो खाद के आयात में 77 पर्सेंट की बढ़ोतरी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। इसके अलावा, कच्चे तेल के आयात में 17.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। बीते कुछ साल में इन चीजों का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है।
सिर्फ कच्चा तेल, सोना, खाने वाले तेल और खाद पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो भारत 2026 में कम से कम 240 बिलियन डॉलर यानी लगभग 20 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगा। अगर बजट की तुलना में देखें तो यह राशि काफी ज्यादा है क्योंकि 2026-27 में भारत का बजट 53.5 लाख करोड़ रुपये रखा गया था। वहीं, भारत की कुल जीडीपी लगभग 350 लाख करोड़ रुपये की है।
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