वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2026, रविवार को देश का बजट पेश करेंगी। यह नौवां बजट होगा जो सीतारमण पेश करेंगी और इसमें सरकार को कई जटिल आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। वैश्विक अनिश्चितताओं, घरेलू मंदी के संकेतों और विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के बीच संतुलन बनाना होगा। जीडीपी वृद्धि दर में कमी, रुपये की घटती वैल्यू, बेरोजगारी, व्यापार घाटा और राजकोषीय दबाव जैसी समस्याएं इस बजट में प्रमुखता से रहेंगी जिन पर वित्त मंत्री को ध्यान देना होगा।

 

देश में अभी यूजीसी विवाद चल ही रहा है और ऐसे में बजट आने वाला है। यूजीसी को लेकर सरकार अभी बैकफुट पर नजर आ रही है। ऐसे में इस लेख में खबरगांव इस बात पर चर्चा करेगा कि आखिर इन परिस्थितियों में और खासकर देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सरकार को किन बातों का ख्याल रखने की जरूरत है?

 

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GDP दर बनाए रखना

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, लेकिन वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए अनुमानित जीडीपी वृद्धि दर 6.8-7.2% के बीच है, जो 'विकसित भारत 2047' के सपने को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। इसके लिए कम से कम 8% की निरंतर आर्थिक वृद्धि जरूरी बताई जा रही है। वैश्विक मंदी, अमेरिकी टैरिफ नीतियां और घरेलू मांग में कमी इसके पीछे के कारण हैं।

 

नॉमिनल जीडीपी वृद्धि भी चिंताजनक रूप से कम है, जो टैक्स रेवेन्यू को प्रभावित कर रही है। सरकार को अब या तो उधार बढ़ाना पड़ेगा या व्यय में कटौती करनी पड़ेगी, जो सामाजिक कल्याण योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। इकोनॉमिक सर्वे ने चेतावनी दी है कि यह ट्रेंड बिना सुधार के FY27 में और गहरा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश बढ़ाकर और उत्पादकता सुधारकर इस चुनौती से निपटा जा सकता है। तो, बजट में सरकार को इसे ध्यान रखकर प्रावधान करने होंगे।

रुपये में गिरावट

डॉलर के मुकाबले रुपया 90 से ऊपर के स्तर तक लुढ़क चुका है, जो कि पिछले एक साल में 5% से अधिक की कमजोरी को दिखाता है। इससे तेल और अन्य आयात महंगे हो गए हैं, जो भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए बड़ा झटका है। फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व मजबूत हैं, लेकिन निरंतर गिरती रुपये की वैल्यू की वजह से RBI को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।

 

बजट में विदेशी निवेश आकर्षित करने के उपाय जैसे टैक्स छूट या PLI स्कीम का विस्तार जरूरी होगा। साथ ही, निर्यात को बढ़ावा देने के लिए रुपये को कॉम्पटीटिव रखना चुनौतीपूर्ण रहेगा। बजट में उन प्रावधानों का ध्यान रखना होगा जो कि रुपये की गिरती कीमत पर लगाम लगा सकें।

IT सेक्टर की मंदी

युवा बेरोजगारी दर काफी उच्च बनी हुई है और आईटी सेक्टर में छंटनी का सिलसिला थम नहीं रहा। नई भर्तियां लगभग शून्य हैं। AI और ऑटोमेशन ने जूनियर जॉब्स को प्रभावित किया है।

 

ऐसे में सरकार को रोजगार को लेकर प्रावधान करने होंगे। बजट में युवा रोजगार गारंटी या स्टार्टअप फंडिंग बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है। मैन्युफैक्चरिंग में भारत चीन से बहुत पीछे है। मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से एक तरफ रोजगार बढ़ेगा तो दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा का आगमन होगा।

चीन-अमेरिका के साथ व्यापार

चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 8.39 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। चीन के आयात से घरेलू उद्योग, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और केमिकल्स, प्रभावित हैं। एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई गईं, लेकिन वह पर्याप्त नहीं हो सके।

 

बजट में कस्टम्स टैरिफ बढ़ाने या लोकल सामानों के लिए नियम सख्त करने पर विचार हो सकता है। बजट में इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि 'मेक इन इंडिया' को गति देने के लिए प्रोविजन किए जाएं।

अमेरिकी टैरिफ और निर्यात दबाव

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के 50% टैरिफ प्रस्ताव से भारत का 80 बिलियन डॉलर निर्यात जोखिम में है। इससे टेक्सटाइल्स, ज्वेलरी और फार्मा बड़े स्तर पर प्रभावित होंगे। इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे प्रतिद्वंद्वियों से मुकाबला कठिन है। बजट में एक्सपोर्ट इंसेंटिव्स या निर्यात को ध्यान में रखकर स्कीम बनाना जरूरी है।

 

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कृषि सेक्टर की चुनौती

कृषि उत्पादकता स्थिर है, लेकिन जलवायु परिवर्तन फसल चक्र बिगाड़ रहा है। साथ ही अभी कृषि क्षेत्र तकनीकी इनोवेशन और पैसे की कमी से जूझ रहा है। इसके अलावा प्रदूषण भी एक बड़ा कारण बन रहा है। ईवी कारों से लेकर ग्रीन बॉण्ड तक सरकार को इन सभी को साधने के लिए बजट बनाना होगा।

 

चुनौतियां कठिन हैं, लेकिन भारत की डेमोग्राफिक डिविडेंड और डिजिटल ताकत मजबूत है। बजट 2026 से 'अमृत काल' की शुरुआत हो सकती है, यदि साहसिक सुधार किए जाएं।