ग्रीन इकॉनमी और डिजिटल इकॉनमी जैसे शब्द तो सुने होंगे लेकिन कुछ सालों में एक नई टर्म उभरी है, जिसे 'ऑरेंज इकॉनमी' नाम दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल मई में 'ऑरेंज इकॉनमी' का जिक्र किया था। अब हाल में प्रसार भारती ने डिजिटल क्रिएटरों को सशक्त बनाने के लिए डीडी न्यूज पर 'क्रिएटर्स कॉर्नर' लॉन्च किया है। सरकार का कहना है कि इससे 'ऑरेंज इकॉनमी' मजबूत होगी।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल मई में जब वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट (WAVES 2025) का उद्घाटन किया था, तब उन्होंने कहा था कि यह भारत में 'ऑरेंज इकॉनमी' के उदय का समय है। तब उन्होंने कहा था कि ऑरेंज इकॉनमी के तीन स्तंभ- कंटेंट, क्रिएटिविटी और कल्चर हैं।

 

ऑरेंज इकॉनमी को बढ़ाने के मकसद से अब सरकार ने डीडी न्यूज पर 'क्रिएटर्स कॉर्नर' शुरू किया है। यह एक प्रोग्राम है, जिसे सोमवार से शुक्रवार तक शाम 7 बजे डीडी न्यूज पर टेलीकास्ट किया जाएगा। इस प्रोग्राम के हर एक एपिसोड में अलग-अलग विषयों से जुड़ी 4 से 6 रील या वीडियो दिखाए जाएंगे।

 

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यह ऑरेंज इकॉनमी है क्या?

इस टर्म का सबसे पहले इस्तेमाल कोलंबिया के पूर्व राष्ट्रपति इवान ड्यूक मारक्वेज और पूर्व संस्कृति मंत्री फेलिप बुइत्रागो ने किया था। उनका मानना था कि 'ऑरेंज कलर' दुनिया की सांस्कृतिक और क्रिएटिविटी का प्रतीक है।

 

उनका मानना था कि जब आप फिल्में, म्यूजिक, गेम्स, फैशन, थिएटर, डिजाइन और क्राफ्ट जैसी चीजों की बात करते हैं तो आप असल में हमारी पहचान की बात कर रहे होते हैं। यही 'ऑरेंज इकॉनमी' है। एक ऐसी दुनिया जहां सपने देखने वाले, बनाने वाले और बदलने वाले एक साथ काम करते हैं।

 

आसान भाषा में समझें तो यह वह अर्थव्यवस्था है जहां क्रिएटिविटी, आर्ट, कल्चर, मीडिया, डिजाइन, फिल्म, म्यूजिक, सॉफ्टवेयर, फैशन और एंटरटेनमेंट की चीजें शामिल हैं। मतलब, ऐसी इकॉनमी जहां आइडिया और टैलेंट से वैल्यू बनती है, न कि फैक्ट्री और मशीनों से। इसे क्रिएटिव इकॉनमी भी कहते हैं और इसे 'ऑरेंज इकॉनमी' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसे क्रिएटिविटी का रंग माना जाता है। यह नई तरह की इकॉनमी है जो जॉब्स पैदा करती है और विकास को बढ़ावा देती है।

 

इससे इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का इस्तेमाल करके पैसा कमाया जाता है। इसे ऐसे समझ लीजिए कि इंस्टाग्राम पर कोई रील बनाकर कमा रहा है, तो वह 'ऑरेंज इकॉनमी' का हिस्सा है।

 

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कितनी बड़ी है इकॉनमी?

सोशल मीडिया और इंटरनेट के आने के बाद ऑरेंज इकॉनमी खूब बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र की 'क्रिएटिव इकॉनमी आउटलुक 2024' की रिपोर्ट बताती है कि क्रिएटिव इकॉनमी हर साल 2 ट्रिलियन डॉलर का रेवेन्यूज जनरेट करती है। इससे दुनियाभर में लगभग 5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है।

 

वहीं, भारत में अब क्रिएटिव इकॉनमी अब 30 अरब डॉलर की है। भारत में जितने लोग काम करते हैं, उनमें से 8 फीसदी इसी इकॉनमी से जुड़े हैं।

 

2023 में भारत में क्रिएटिव इकॉनमी में 20% की बढ़ोतरी हुई है, जिससे 11 अरब डॉलर से ज्यादा का प्रोडक्शन हुआ था। 2023 तक भारत में 10 करोड़ से ज्यादा कंटेंट क्रिएटर्स थे।

 

भारत में अब तेजी से यह इकॉनमी बढ़ रही है। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने इसे और बढ़ा दिया है। अब तक कंटेंट क्रिएटर्स टियर-1 शहरों में थे लेकिन कुछ सालों में टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी फल-फूल रहे हैं।

 

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भारत में इसका भविष्य क्या है?

दुनिया की जितनी जीडीपी है, उसमें 3.1% हिस्सेदारी इसी क्रिएटिव इकॉनमी या ऑरेंज इकॉनमी की है। दुनियाभर में 6% से ज्यादा रोजगार इसी इकॉनमी में है। अनुमान है कि 2030 तक ये शेयर बढ़कर 10% तक पहुंच जाएगा।

 

UN कमेटी ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UNCTAD) के अनुसार, क्रिएटिव इकॉनमी क्रिएटिव इंडस्ट्रीज के सभी हिस्सों का कुल जोड़ है, जिसमें ट्रेड, लेबर और प्रोडक्शन शामिल हैं। इन इंडस्ट्रीज में एडवर्टाइजिंग, आर्किटेक्चर, आर्ट, क्राफ्ट, डिजाइन, फैशन, फिल्म, वीडियो, फोटोग्राफी, म्यूजिक, परफॉर्मिंग आर्ट्स, पब्लिशिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, सॉफ्टवेयर, कंप्यूटर गेम्स, इलेक्ट्रॉनिक पब्लिशिंग और टीवी-रेडियो शामिल हैं।

 

रही बात भारत की तो यहां कई सालों में ऑरेंज इकॉनमी काफी तेजी से बढ़ी है। कुछ स्टडीज में अनुमान लगाया गया है कि भारतीय कंटेंट क्रिएटर्स 300 से 400 अरब डॉलर से ज्यादा के कंज्यूमर खर्च को प्रभावित करते है। इसका मतलब हुआ कि भारत में 300 से 400 अरब डॉलर का सामान इसलिए बिकता है, क्योंकि कंटेंट क्रिएटर्स उनका प्रमोशन कर रहे हैं।

 

अर्न्स्ट एंड यंग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में क्रिएटिव इकॉनमी हर साल 18 फीसदी की दर से बढ़ रही है। 2023 तक यह इकॉनमी 19 अरब रुपये की थी, जो 2026 तक 34 अरब रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।