भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में से एक है लेकिन क्या दुनिया की कारोबार में भारत की हिस्सेदारी भी सबसे ज्यादा है? आंकड़े भारत के पक्ष में नहीं हैं। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) के आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल कार्यबल का 43.0% हिस्सा सीधे तौर पर कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में रोजगार पा रहा है। आर्थिक सर्वे 2025-2026 के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक कृषि निर्यात बाजार में भारत की हिस्सेदारी मात्र 2.2 फीसदी के आसपास है। देश में खाद्यान्न और बागवानी उत्पादन निरंतर नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन निर्यात के मामले में भारत अभी भी 'सुपरपावर' नहीं बन सका है। यह विरोधाभास भारत की कृषि क्षमता और वास्तविक वैश्विक प्रदर्शन के बीच की गहरी खाई को दिखा रही है।
ऐसा नहीं है कि भारत में कृषि उत्पादन खराब स्तर पर है। साल 2024-25 में खाद्यान्न उत्पादन अनुमानित 3,577 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। यह बीते साल से 254 लाख टन अधिक है। बागवानी उत्पादन खाद्यान्न से आगे निकलकर 362-367 मिलियन टन हो गया। चीन की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान करीब 1270 अरब अमेरिकी डॉलर है, वहीं भारत की कृषि अर्थव्यवस्था 639 अरब अमेरिकी डॉलर है।
भारत कहां बेहतर है?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक है और सब्जी, फल और आलू उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे सहायक क्षेत्रों में भारत अब बेहतर कर रहा है। कुल कृषि और संबद्ध क्षेत्र की वृद्धि औसतन 4.4% रही। इन उपलब्धियों के बाद वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति मजबूत नहीं है। वित्त वर्ष 2025 में कृषि और खाद्य निर्यात लगभग 49.43 अरब डॉलर रहा, जो कुल निर्यात का सिर्फ 11.2 फीसदी है। प्रॉसेस्ड का हिस्सा बढ़ा है, लेकिन कुल वैश्विक साझेदारी कम है। वजह यह है कि गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे में सुधार की जरूरत है।
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पिछले 11 सालों में बागवानी उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2013-14 में यह 280.70 मिलियन टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 367.72 मिलियन टन हो गया। इसमें फलों का उत्पादन 114.51 मिलियन टन, सब्जियों का 219.67 मिलियन टन और अन्य बागवानी फसलों का 33.54 मिलियन टन शामिल है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा सूखा प्याज उत्पादक देश है और दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग 25% हिस्सा अकेला भारत पैदा करता है। इसके अलावा भारत सब्जी, फल और आलू के उत्पादन में दुनिया में दूसरे नंबर पर है। हर श्रेणी में भारत दुनिया के कुल उत्पादन का 12-13% हिस्सा पैदा करता है।
ऐसा अंतर क्यों है?
आर्थिक सर्वे 2025-2026 के मुताबिक देश में कई प्रमुख फसलों की उपज अभी भी वैश्विक औसत से कम है। छोटे-बिखरे खेत, भंडारण और कोल्ड चेन की कमी, कटाई के बाद होने वाले नुकसान, उत्पादन की गुणवत्ता, बीजों और उर्वरकों तक सीमित पहुंच और असमान सिंचाई सुविधाएं कुछ ऐसी बाधाएं हैं, जिनसे भारत जूझता है। जिसका उत्पादन और निर्यात पर असर पड़ता है।
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किस देश से कितना निर्यात होता है?
- संयुक्त राज्य अमेरिका: 172.36 बिलियन डॉलर
- ब्राजील: 141.89 बिलियन डॉलर
- नीदरलैंड: 133.90 बिलियन डॉल
- जर्मनी: 102.21 बिलियन डॉलर
- चीन: 84.33 बिलियन डॉलर
- फ्रांस: 83.45 बिलियन डॉलर
- स्पेन: 74.30 बिलियन डॉलर
- इटली: 70.53 बिलियन डॉलर
- कनाडा: 65.30 बिलियन डॉलर
- बेल्जियम: 62.42 बिलियन डॉलर
- पोलैंड: 53.84 बिलियन डॉलर
- इंडोनेशिया: 49.86 बिलियन डॉलर
- मेक्सिको: 49.45 बिलियन डॉलर
- ऑस्ट्रेलिया: 46.13 बिलियन डॉलर
- थाईलैंड: 45.32 बिलियन डॉलर
भारत इस लिस्ट में 15वें पायदान है। ये आंकड़े 'फूड एंड एंग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन ऑफ यूनाइएटेड नेशन पर आधारित हैं।
खराब हो रही है मिट्टी की सेहत?
भारत में रसायन और उर्वरकों के खराब इस्तेमाल की वजह से मिट्टी की भी सेहत खराब हो रही है। फसलों के विकास के लिए तीन तत्वों की जरूरत पड़ती है। आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम की। इनका आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए लेकिन अब वह बिगड़कर 10.9:4 हो गया है। आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि यूरिया सब्सिडी की वजह से नाइट्रोजन का ज्यादा इस्तेमाल, जिसकी वजह से मिट्टी की उर्वरता पर असर आ रहा है।
किसान अलग-अलग फसलों की जगह ज्यादा मुनाफे वाली फसलों पर जोर दे रहे हैं। मक्का जैसे फसलों के उत्पादन पर लोग जो रहे हैं, जिसकी वजह से दाल और सरसो जैसी फसलों की जमीन छिन रही है। एथेनॉल उत्पादन की वजह से लोग मक्के की खेती कर रहे हैं। अब खाने वाले तेल में आयात की निर्भरता इसलिए ही बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन, क्षेत्रीय असमानताएं उत्पादन को अस्थिर कर रही हैं।
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सरकार क्या कर रही है?
सरकार ने अब पीएम किसान, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, एकीकृत बागवानी विकास मिशन, इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार, किसान उत्पादक संगठन, डिजिटल कृषि मिशन, सहकार से समृ्द्धि जैसी कुछ योजनाएं चला रही है। न्यूतनम समर्थन मूल्य को 1.5 गुना लागत पर तय करने, सूक्ष्म सिंचाई, मृदा की सेहत पर जोर दे रही है। अभी इन्हें बड़े स्तर पर लागू नहीं किया जा रहा है।
वजहें जिनकी वजह से निर्यात प्रभावित है
- घरेलू सुरक्षा: भारत 140 करोड़ की आबादी वाला देश है। प्राथमिकता है कि पहले अपनी जरूरतें पूरी हों, फिर निर्यात हो। कुछ साल में गैर-बासमती चावल, चीनी और प्याज के निर्यात पर लगाई गई या भारी कर लगाया गया। एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के तौर पर भारत की छवि पर असर पड़ा। दुनिया ने वियतनाम, ब्राजील, थाइलैंड और चीन का रुख किया।
- कमजोर प्रॉसेसिंग: भारत कपास, चावल और मसाले तो बेचता है लेकिन पैकेटबंद खाद्य पदार्थ बेचने में फिसड्डी है। कच्चे माल पर मुनाफा कम होता है, वैश्विक बाजार में कीमतें गिरती ही नुकासन पहुंचना है। ये सामान, जल्द खराब भी हो जाते हैं। अगर हम टमाटर और आलू की जगह चिप्स, आलू पाउडर बेचें तो निर्यात का मूल्य बढ़ेगा, सामान सुरक्षित भी रहेंगे।
- वैश्विक मानकों में चूक: अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के देश उत्पाद की गुणवत्ता और मानकों पर जोर देते हैं। भारत की खेती कीटनाशक और उर्वरक आधारित हैं। अंतराष्ट्रीय स्तर पर इन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है। हमारे वैज्ञानिक और किसान वैश्विक स्टैंडर्ड के लिहाज से खेती नहीं कर रहे हैं।
- खराब कोल्ड स्टोरेज: भारत में उत्पादों के रखरखाव पर होने वाला खर्च ज्यादा है। आधुनिक कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रीजरेटेड वैन कम हैं। डेयरी प्रोडक्ट ज्यादा दिन रखे नहीं जा सकते हैं। ऐसे में जरूरत के वक्त दुनिया तक हमारी सप्लाई नहीं पहुंच पाती है।
आंकड़ों में कहां पिछड़ रहे हैं हम?
आर्थिक सर्वे 2025-26 की रिपोर्ट बता रही है कि साल 2000 में भारत की वैश्विक बाजार में कृषि साझेदारी 1.1 प्रतिशत थी, जो 24 साल बाद बढ़कर सिर्फ 2.2 फीसदी तक पहुंच पाई है। साल 2020 में 34.5 बिलियन डॉलर से साल 2025 में 51.1 बिलियन डॉलर के बीच निर्यात पहुंचा है। असली चिंता की बात यह है कि 2023 से लेकर 2025 तक भारत का कृषि निर्यात ठहरा हुआ है। दुनिया हमसे काफी आगे निकल गई है। वैश्विक कृषि बाजार का निर्यात 2.3 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2.4 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया, दुनिया में मांग बढ़ रही है लेकिन भारत फायदा हासिल नहीं कर पा रहा है।


