मौजूदा वक्त में भारत में वामपंथी दलों का वजूद सिर्फ केरल तक सीमित रह गया है। एक समय पर देश के दर्जन भर राज्यों में सरकार, विपक्ष या अन्य संगठनों में अहम भूमिका रखने वाले वामपंथी दलों की पहली चुनी हुई सरकार भी केरल में ही बनी थी। इसी को भारत में लेफ्ट का उदय माना जाता है। आजादी से पहले भी लेफ्ट विचारधारा वाले सक्रिय थे लेकिन अपने दम पर वे कोई सरकार नहीं बना पाए थे। साल 1956 में केरल जब नया राज्य बना तो पहली सरकार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने बनाई। ई एम एस नंबूदरीपाद केरल के पहले चुने हुए मुख्यमंत्री बने। रोचक बात है कि पहले चुनाव तक केरल में CPI एक ही थी और तब तक पार्टी में विभाजन नहीं हुआ था।

 

आगे चलकर यही पार्टी पहले बंट जाती है, टकराती है और फिर कांग्रेस से सत्ता छीनने के लिए एकजुट भी होती है। मौजूदा वक्त में भी CPI और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) की अगुवाई में ही लेफ्ट डेमोक्रैटिक फ्रंट (LDF) की सरकार है। अब यह भारत की इकलौती वापमंथी सरकार बची है। 

भारत और लेफ्ट का उदय

भारत में आजादी के पहले से ही वैचारिक स्तर पर कई तरह के विभाजन थे। कांग्रेस में ही पंडित नेहरू समाजवादी विचारधारा थे। कुछ कांग्रेसी लेफ्ट विचाराधारा के थे और शुरुआत से ही गर्म दल के समर्थक रहे कई नेता दक्षिणपंथी झुकाव भी रखते थे। आजादी के आंदोलन में भी वामपंथी नेताओं की भूमिका रही  और साल 1951-52 में जब देश में पहली बार चुनाव हुए तो कांग्रेस के बाद CPI ही दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। तब CPI को 16 सीटों पर जीत मिली थी जबकि कांग्रेस ने 364 लोकसभा सीटें जीती थीं।

 

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इस सबसे पहले 26 दिसंबर 1925 को ही भारत में CPI का गठन हो चुका था। साल 1917 में रूस में हुई क्रांति से प्रभावित होकर दुनिया के कई देशों में लेफ्ट का उदय हो रहा था और भारत में भी अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे माहौल ने लेफ्ट को जमीन दे दी। सबसे पहले ट्रेड यूनियनों के जरिए CPI को मौका मिला कि वह अपने विचारों को उतार सके। पार्टी के गठन से पहले अलग-अलग राज्यों में एम एन रॉय, एस ए डांगे, मुजफ्फर अहमद, शौकत उस्मानी जैसे नेता लेफ्ट के विचारों का हिसाब से काम करने लगे थे।

 

लेफ्ट ने शुरुआत से ही सामाजिक न्याय, अछूत प्रथा के खिलाफ, महिला अधिकार, मजदूर अधिकार आदि के लिए आवाज उठाई। दिसंबर 1939 में CPI की केरल यूनिट का गठन हुई। जगह थी आज के कन्नूर जिले में स्थित तलेसरी का पिनराई। तब पी कृष्ण पिल्लई केरल में सीपीआई के पहले स्टेट सेक्रेटरी बने।

 

उस समय केरल में कुलीन वर्ग बहुत हावी था और कथित निचली जाति के लोगों का दमन जोरों पर था। मिलों और कारखानों में काम करने वाले लोगों की स्थिति दयनीय थी और अंग्रेजों के जमाने के कानूनों से दमन करने वालों को ही मदद मिलती थी। ऐसे में लेफ्ट के दलों की मदद से त्रावणकोर लेबर असोसिएशन और केरल कर्षक संघम के आंदोलनों ने कम्युनिस्टों को ताकत दी। इन्हीं आंदोलनों से पी कृष्ण पिल्लई, ई एम एस नंबूदरीबाद, ए के गोपालन, सी अच्युतानंदन, टीवी थॉमस और के दामोदनर जैसे नेता निकले। 

 

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केरल में कैसे जीत गया लेफ्ट?

आजादी से पहले भी मजदूरों, मिल मजदूरों, कामगारों और किसानों की समस्या उठाने के मामले में लेफ्ट के मजदूर संगठन आगे थे। यही वजह है कि लेफ्ट का अच्छा-खासा जनाधार पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र-गुजरात में था। इन राज्यों की मिलों के कामगारों के साथ खड़े होने से लेफ्ट की पहचान तो थी। हालांकि, यह पहचान इतनी बड़ी कभी नहीं हो पाई थी कि लेफ्ट अपने दम पर कहीं भी सरकार बना सके। जब केरल का गठन हुआ और चुनाव हुए तो लेफ्ट ने भूमि सुधार का वादा किया। लेफ्ट ने जातिगत समानता के मुद्दे को भी खूब उछाला। पूर्व में ब्राह्मण बनाम अन्य सा संघर्ष देख चुके केरल के लिए यह चुनाव बेहद भावनात्मक बन गया है।

 

चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री बने EMS नंबूदरीबाद ने खांटी वामपंथी विचारधारा से प्रभावित फैसले लागू करने शुरू किए। भूमि सुधार का वादा करके सत्ता में आई लेफ्ट सरकार ने किसानों का जमीन का अधिकार देना शुरू कर दिया। किसान मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय की गई और जिस जमीन पर किसान लंबे समय से काम करते आ रहे थे, उन्हें वहां से हटाने के बजाय बसाया जाने लगा। इससे केरल का कुलीन वर्ग और जमींदार वर्ग नाराज हो गया। लोग नंबूदरीपाद की सरकार के खिलाफ उतर आए, हिंसक आंदोलन होने लगे और आखिरकार 1959 में ही पंडित जवाहर लाल नेहरू की केंद्र सरकार ने केरल की सरकार को ही बर्खास्त कर दिया।

 

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1960 में जब चुनाव हुए तो लेफ्ट की सीटें कम हो गईं। CPI में आपसी टकराव होने लगा और यहीं से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPM बनी। 1970 के दशक में CPI ने इंदिरा गांधी के फैसलों का समर्थन किया और CPI और CPM का टकराव बढ़ता गया।

कैसे रहे थे चुनाव के नतीजे?

1957 यानी केरल के पहले विधानसभा चुनाव में विधानसभा सीटों की संख्या 114 थी और समय के साथ यह बढ़ती गई। 75 लाख से ज्यादा मतदाता थे जिसमें से 58 लाख से ज्यादा मतदाताओं ने अपने वोट डाले। तब कुल 12 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रखी गई थीं। CPI ने कुल 100 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 60 सीटों पर जीत हासिल करके एकतरफा जीत हासिल की थी। CPI को 35.28 प्रतिशत वोट मिले थे।

 

रोचक बात है कि तब कांग्रेस ने सभी 124 सीटों पर चुनाव लड़ा और 37.85 प्रतिशत वोट के साथ उसकी 43 सीटें आई थीं। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 9 सीटें जीती थीं। उस चुनाव में भी कुछ सीटें ऐसी थीं जिन पर एक के बजाय दो प्रतिनिधि चुने जाते थे। यही वजह है कि इस चुनाव में कुल 14 निर्दलीय उम्मीदवार भी चुने गए थे। दोहरे उम्मीदवारों वाली सीटें कुल 12 थीं।