एकता दिखाई, अंग्रेजों से लड़े फिर सब भगवान को सौंपा, त्रावणकोर की पूरी कहानी
दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में शुमार श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर त्रावणकोर रियासत के संरक्षण में है। क्या आप इस राजघराने की कहानी जानते हैं?

त्रावणकोर साम्राज्य की कहानी, Photo Credit: Khabargaon
केरल एक ऐसा राज्य है जिसकी राजधानी बीच में नहीं बल्कि बिल्कुल किनारे पर है। उत्तर-दक्षिण दिशा में विस्तार लिए इस राज्य की राजधानी प्रदेश के दक्षिणी छोर यानी तिरुवनंतपुरम में है। इसी को पहले त्रिवेंद्रम या त्रावणकोर कहा जाता है। वही त्रावणकोर जिसके राजा ने कभी सबकुछ भगवान श्री पद्मनाभ के नाम कर दिया और खुद को उनका दास घोषित किया। श्री पद्मनाभ स्वामी का जो मंदिर तिरुवनंपुरम में आज स्थित है, त्रावणकोर के राजा ने इसी को अपना सबकुछ सौंप दिया और खुद उनके दास के रूप में सत्ता चलाई। एक समय पर बेहद ताकतवर बननकर उभरा त्रावणकोर साम्राज्य केरल के इतिहास का बेहद अहम अध्याय है।
जैसे ना तो पहले केरल राज्य था, ठीक वैसे ही त्रावणकोर साम्राज्य भी एकजुट नहीं था। इसे एकजुट करने और इसे मजबूत साम्राज्य में बदलने का श्रेय मार्तंड वर्मा को जाता है। अनिजम तिरुनाल मार्तंड वर्मा का जन्म साल 1706 में हुआ था। श्रीधर मेनन अपनी किताब 'अ सर्वे ऑफ केरल हिस्ट्री' में लिखते हैं कि किल्लीमनूर राजघराने की रानी कार्तिका तिरुनाल और राजा राघव वर्मा के बेटे मार्तंड वर्मा जब पैदा हुए तब त्रिप्पपूर स्वरूपम या तिरुवितमकूर या त्रावणकोर एक छोटा इलाका था जो उत्तर में एदावा से दक्षिण में अरलवैमोजी तक फैला हुआ था।
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जैसे किल्लीमनूर एक राजघराना था वैसे ही तब त्रावणकोर में कई राजघराने हुआ करते थे। मार्तंड वर्मा ने सत्ता संभाली तो बाकी के 8 राजघरानों के नायरों का दमन शुरू किया। मार्तंड वर्मा को छोटे-छोटे इलाकों में बंटी सामंती व्यवस्था पसंद नहीं थी और वह इसे एकीकृत करके एक मजबूत राजशाही बनाना चाहते थे।
सत्ता का संघर्ष
इसी क्रम में मार्तंड वर्मा ने पद्मनाभन तांपी और रमन तांपी को मरवा डाला और इसके जरिए बाकियों को संदेश भी दिया। जो कोई भी चुनौती दे सकता था सब निशाने पर था। किलोन (अब के कोल्लम) और कायमकुलम के खिलाफ युद्ध छेड़ा गया। इतिहासकार एम ओ कोशी अपनी कितनाब 'डच पावर इन केरल' में लिखते हैं कि मार्तंड वर्मा जिस रफ्तार से अपने आसपास के राजाओं को डरा-धमका रहे थे और कब्जा करते जा रहे थे, उससे उनके पड़ोसियों में डर का माहौल था। इसका फायदा अंग्रेजों ने उठाया। अपने पांव जमाने की कोशिश कर रही डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने उठाया। दरअसल, डच कारोबारियों ने कई राजाओं के साथ व्यापार पर एकाधिकार वाला समझौता किया था लेकिन मार्तंड वर्मा ने इसे मानने से ही इनकार कर दिया। ऐसे में डचों ने तैयारी कर डाली कि अब मार्तंड के खिलाफ युद्ध होगा।
कोचीन और कायमकुलम के राजा तो पहले से मार्तंड वर्मा को रास्ते से हटाना चाहते थे तो वे भी डच सेना के साथ हो गए। हालांकि, यह गठबंधन सफल नहीं हुआ। त्रावणकोर की सेना ने डच सेना को तो हराया ही कोलाचेल किले पर कब्जा भी कर लिया। यह पहली बार हुआ था जब एक एशियाई सेना ने किसी अंग्रेजी सेना को हरा दिया था। मार्तंड वर्मा जोश में थे और उन्होंने एलान कर दिया काली मिर्च के कारोबार पर सिर्फ उनका ही एकाधिकार होगा।
कैसे बनता गया साम्राज्य?
7वीं और 8वीं शताब्दी में पांड्य शासक बार-बार अय राजवंश पर हमला कर रहे थे। नतीजा यह हुआ कि अय राजवंश कमजोर हो रहा था। इसी का हिस्सा हुआ वेनाड हुआ करता था। एक समय पर दक्षिण में नागरकोइल से उत्तर में तिरुवल्ला तक राज करने वाले अय समय के साथ कमजोर हो गए थे। अय के कमजोर होने के साथ ही वेनाड शक्तिशाली हुआ। 12वीं शताब्दी में जब चेर साम्राज्य कमजोर हो गया तब वेनाड का उदय हुआ।
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12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अय के दो गुट त्रिप्पपुर और चिरावा का विलय वेनाड में हुआ। चिरावा मूपन को राजा बनाया गया। त्रिप्पपुर मूपन को त्रिप्पपुर में रहने को दिया गया जो कि त्रिरुवनंतपुरम से 9 मील उत्तर की तरफ था। आगे चलकर चिरावा मूपन कोल्लम के राजा बने और त्रिप्पापुर मूपन वेनाड के राजा बने। उस वक्त वेनाड कमजोर था और उसे मदुरै के नायकों को सालाना भेंट देनी पड़ती थी। तब राजधानी पद्मनाभपुरम में नायकों के प्रतिनिधि आते थे और भेंट लेकर जाते थे। उस वक्त मंदिर के ट्रस्टी और सामंत भी काफी शक्तिशाली थे और वेनाड के शासक इतनी आसानी से उन पर अपना शासन नहीं चला सकते थे।
केरल में जब चेर साम्राज्य खत्म हुआ तो राज्य अलग-अलग क्षेत्रों में बंट गया था। आखिरी चेर राजा ने अपनी राजधानी वेनाड में बना ली थी आय साम्राज्य से अपना साम्राज्य मिला लिया था। यह राज्य वेनाड से ही चलता था। 14वीं शताब्दी में वेनाड में कुछ राजकुमारों को कोलतू नाडु और उत्तरी मालाबार से गोद लिया गया। कोलतू नाडू में तब मुशिका राजाओं का राज था। यहां से वेनाड में पिता और उनके बेटों की सत्ता के बजाय मां और उनकी बेटियों की सत्ता चलने लगी। बाद में यह अलग-अलग हिस्सों में बंट गई। त्रिप्पपुर, इलयादातु स्वरूपम आदि ऐसे ही हिस्से थे।

अंग्रेजों में था त्रावणकोर का खौफ
स्थानीय नायर जमींदारों (पिल्लई) ने इसका फायदा उठाया और सारी सत्ता त्रावणकोर में केंद्रित कर ली। इन लोगों ने श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर भी अपने कब्जे में कर लिया। सत्ता बरकरार रखने के लिए इन लोगों ने कई गलत काम किए। आखिर में 18वीं शताब्दी में मार्तंड वर्मा के आने के बाद स्थिति बदली। सत्ता के लिए नए राजकुमारों को मार डालने वाले पिल्लई ने मार्तंड वर्मा को भी रास्ते से हटाने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए। एक लोककथा प्रचलित है कि पिल्लई से बचने के लिए भगवान कृष्ण ने मार्तंड वर्मा की मदद की और एक पेड़ की कोटर में छिपने के लिए कहा। इसी के चलते मार्तंड वर्मा ने श्री कृष्णास्वामी मंदिर बनवाया। सत्ता में आते ही मार्तंड वर्मा ने पिल्लई राजाओं को खत्म कर दिया।
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मार्तंड वर्मा ने एक तमिल ब्राह्णण रमैय्या दलवा को अपना दीवान बनाया और अपनी सेना के कमांडर का पद भी दिया। जब मार्तंड वर्मा ने सारे इलाकों पर कब्जा कर लिया तब जाकर उन्होंने इसे श्री पद्मनाभ स्वामी के चरणों में समर्पित कर दिया और खुद पद्मनाभ स्वामी के दास के तौर पर काम करने लगे। मार्तंड वर्मा की आर्मी में 10 हजार नायर हुआ करते थे। माना जाता था कि ये लोग जन्म से ही योद्धा होते हैं। जब ब्रिटिश शासन आया तब भी यह सेना त्रावणकोर के महाराज के ही अंतर्गत रही। आगे चलकर जब देश आजाद और इंडियन आर्मी बनी तो यही सेना मद्रास रेजीमेंट की 9वीं बटालियन बनी।
पुर्तगालियों के रिकॉर्ड में यह दर्ज है कि मार्तंड वर्मा ने पूरे केरल को जीतने भगवान परशुराम की पूरी जमीन पर अपना साम्राज्य स्थापित करने की योजना बनाई थी। पुर्तगाली इससे डरे हुए थे। वे अपने दस्तावेजों में लिखते हैं, 'मौजूदा राजा की उम्र 37 साल है जो कि एक काबिल राजकुमार है। वह बेहद निर्दयी और घमंडी है और किसी भी कीमत पर पूरा मालाबार जीतना चाहता है। इसी के लिए हिरण्यगर्भ नाम का अनुष्ठान किया जो चेर राजाओं के मुकुट चेर मुडी को धारण किया। राजा मार्तंड ने खुद को कुलशेखर पेरुमल की उपाधि दी। यह उपाधि चेर राजाओं को दी जाती थी।

दुश्मनों से घिरे होने के चलते मार्तंड वर्मा और उनके बेटे धर्म राज ने अंग्रेजों से भी हाथ मिलाया। इसके बावजूद ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण नहीं कराने दिया। वह किसी भी हाल में यह चाहते थे कि उनका राज्य हिंदू राज्य रहे। धर्मांतरण की कोशिश करने वालों को मौत की सजा दे दी जाती थी। उनके ही राज दरबार के एक अधिकारी नीलम पिल्लई ने ईसाई धर्म अपना लिया था, जब उन्हें फिर से हिंदू बनने को कहा गया और उन्होंने इससे इनकार कर दिया तो उन्हें गोली मार दी गई।
भगवान के सामने समर्पण
इन्हीं मार्तंड वर्मा ने दिसंबर 1749 में एक और रोचक एलान किया। मार्तंड वर्मा ने अपना पूरा साम्राज्य भगवान श्री पद्मनाभ को समर्पित कर दिया और खुद का नाम पद्मनाभ दास मार्तंड वर्मा रख लिया। बाद के जो राजा आए उनके नाम में भी पद्मनाभ दास जोड़ा गया। मार्तंड वर्मा ने ही मशहूर पद्मनाभ स्वामी मंदिर का विस्तार करवाया। कहा जाता है कि यह मंदिर तो 9वीं शताब्दी का है लेकिन जिस रूप में अभी दिखता है वह मार्तंड वर्मा ने ही बनवाया था। मार्तंड वर्मा के बाद अगले शासक बने धर्मराज मार्तंड। धर्मराज के शासन काल में ही टीपू सुल्तान और उनके बेटे हैदर अली ने त्रावणकोर पर हमला किया। इसी को तीसरा एंग्लो-मैसूर युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध में त्रावणकोर को अंग्रेजों का साथ मिला और टीपू सुल्तान की हार हुई।
साल 1808 में त्रावणकोर में वेलु थंपी दलवा यानी त्रावणकोर के प्रधानमंत्री की अगुवाई में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हुआ। हालांकि, अंग्रेजों ने इसका आसानी से दमन कर दिया। आगे चलकर व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई थी राजघराने का एक शख्स त्रावणकोर का शासन होता था। वहीं, एक प्रधानमंत्री भी हुआ करता था। त्रावणकोर के आखिरी राजी यानी चितिरा तिरुनाल ने हिंदू मंदिरों में निचली जातियों के प्रवेश पर लगी रोक को साल 1936 में खत्म हो गए। तब चितिरा तिरुनाल के प्रधानमंत्री सी पी रामास्वामी अय्यर थे।

जब अंग्रेज भारत छोड़ने को तैयार हुए तब चितिरा तिरुनाल ने 18 जून 194 को अपनी आजादी का एलान कर दिया। इसका मतलब था कि त्रावणकोर खुद को अलग देश मान रहा था। भारत सरकार को यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं था। कई बार इसको लेकर चर्चा हुई। सी पी रामास्वामी अय्यर को कम्युनिस्टों ने जान से मारने की कोशिश की और आखिर में 23 जुलाई 1947 को त्रावणकोर ने भारत में शामिल होना स्वीकार किया। 1 जुलाई 1949 को त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर त्रावणकोर-कोचीन राज्य बनाया गया। इसके बारे में हम विस्तार से बता चुके हैं कि केरल राज्य कैसे बना।
मौजूदा स्थिति क्या है?
यह परिवार आज भी मौजूद है लेकिन अब स्वरूप बदल गया है। भारत में राजशाही के खत्म होने के साथ ही राजपरिवार अपनी कुछ संपत्तियों तक ही सीमित रह गया है। मौजूदा वक्त में मूलम तिरुनाल राम वर्मा त्रावणकोर राजघराने के मुखिया हैं। साल 2013 से अब तक वही राजघराने का काम देखते हैं। वह और उनका परिवार कोवडियार पैलेस में रहता है और वही श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर के संरक्षक हैं।
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