केरल की एक बड़ी आबादी ईसाई है। राज्य में सैकड़ों साल पुराने चर्च हैं और आज भी ये चर्च राजनीतिक असर भी रखते हैं। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे दल केरल में अपनी जड़ें मजबूत करने की कोशिश में ईसाइयों को लुभाने की कोशिश लगातार कर रहे हैं। हर चुनाव में राजनीतिक दलों के मुखिया चर्च के चक्कर लगाने लगते हैं। इसके पीछे की वजह हजारों साल पुरानी है। यह वजह केरल में आए उस पहले मिशनरी से भी जुड़ी है जिसने पूरे राज्य में न सिर्फ चर्च बनाए बल्कि ईसाइयित को भी जमकर फैलाया। लगभग 2 हजार साल पहले आए सेंट थॉमस के चलते ही केरल न सिर्फ अच्छी-खासी ईसाई आबादी वाला राज्य बना बल्कि राज्य के समाज पर भी इस धर्म और उससे जुड़ी संस्कृति का असर दिखता है।

 

ईसाई धर्म में यह मान्यता है जीसस क्राइस्ट ने अपने 12 शिष्यों को धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए चुना था। इन्हीं को अपॉसल (Apostle) या यूं कहें कि धर्मदूत कहा जाता है। सिमॉन, एंड्रयू, जेम्स, जॉन, फिलिप और थॉमस आदि इसी तरह के धर्मदूत थे। इसी में से थॉमस यानी सेंट थॉमस साल 52 में यानी आज से लगभग 1975 साल पहले केरल के क्रैंगानूर (कोडुनगल्लूर) शहर पहुंचे। हालांकि, सेंट थॉमस के आने के समय को लेकर एकमत या स्पष्टता नहीं है। फिर भी सेंट थॉमस का मकसद साफ था कि लोगों को ईसाई धर्म में लाना है। 

सेंट थॉमस ने केरल में क्या काम किया?

 

केरल पहुंचने के बाद सेंट थॉमस ने सबसे पहले उच्च कुलीन हिंदू परिवारों को अपने प्रभाव में लेना शुरू किया। मिशनरी के रूप में आए सेंट थॉमस ने इन लोगों के ईसाई धर्म की बातें समझाईं और उनका धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें ईसाई बनाया। मलियनकारा, पालायुर, कोट्टाकवू, कोक्कामंगलम, नीरानम, कोल्लम और चायल जैसे इलाकों के तमाम हिंदू परिवार कुछ ही समय में ईसाई बन गए थे। सेंट थॉमस ने ही केरल में कई ऐसे घर बनाए जहां प्रार्थना की जा सके। बाद में यही घर चर्च बना दिए गए। 

 

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शुरुआत में कल्ली, कलियनकल, पकालोमट्टम और शंकरपुरी ऐसे परिवार थे जो ईसाई बने। सेंट थॉमस ने इन्हीं परिवारों में से दो लोगों को चर्च का पादरी बना दिया। चर्च को इन लोगों के हवाले करने के बाद सेंट थॉमस ने भारत के पूर्वी तटीय राज्यों यानी तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की ओर रुख किया और वहां भी चर्च स्थापित किए। इसी तरह वह चीन तक गए और वहां भी ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया। बाद में वह फिर से भारत लौट आए मद्रास (चेन्नई) के मायलपुर में रहने लगे।

ब्राह्णणों को ईसाई कैसे बना दिया?

इसके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। एक कहानी के मुताबिक, एक बार कई ब्राह्णण एक तालाब में नहा रहे थे तभी सेंट थॉमस वहां पहुंचे। सूर्य को अर्घ्य दे रहे ब्राह्णणों को देखकर सेंट थॉमस ने कहा कि क्या वे पानी को ऊपर की तरफ ऐसे फेंक सकते हैं कि ईश्वर उसे स्वीकार कर लें और वह पानी जमीन पर गिरे ही ना? इस पर ब्राह्मणों ने कहा कि यह तो असंभव है। कहा जाता है कि इसी के बाद सेंट थॉमस ने चमत्कार करके दिखाया और पानी हवा में ही रुक गया। सेंट थॉमस ने इसके जरिए यह साबित किया कि उनके गॉड यानी ईसा मसीह उनकी यह भेंट स्वीकार कर रहे हैं। इसके चलते ब्राह्णण उनसे प्रभावित हो गए और उसे तालाब में ही धर्म बदलकर ईसाई बन गए।

 

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इतना ही नहीं, उनके मंदिर को ही चर्च बना दिया गया। जो लोग हिंदू धर्म छोड़ने को तैयार नहीं थे, उन्हें वह जगह छोड़कर भागना पड़ा। इन लोगों ने इसे जगह को श्राप दिया और इसे 'चापाकट्ट' यानी श्रापित जंगल नाम दिया।

कैसे हुई सेंट थॉमस की हत्या?

मायलपुर में लिटिल माउंट नामक जगह सेंट थॉमस के कामकाज का अहम केंद्र थी। लोक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि जब सेंट थॉमस को मारा गया और वह घायल हुए तो वह भागकर बिग माउंट पहुंचे और वहीं पर उनकी मौत हो गई। धर्म परिवर्तन पर जोर होने और ब्राह्णणों से टकराव के कारण सेंट थॉमस निशाने पर थे। उनके खिलाफ दंगे हुए और इन्हीं दंगों में साल 72 में मायलपुर (चेन्नई) में सेंट थॉमस की हत्या कर दी गई और उन्हें वहीं दफनाया गया। बाद में उनके शव को निकालकर एडेसा ले जाया गया।

 

कहा जाता है कि सेंट थॉमस की हत्या के बाद केरल के ईसाई भटक गए थे। उनकी हालत ऐसी थी जैसे कि उन्हें कोई राह दिखाने वाला ही न हो। इसका असर यह हुआ कि धर्म बदलकर ईसाई बने बहुत सारे लोग अपने मूल धर्म में लौट गए। 

 

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मौजूदा स्थिति की बात करें तो केरल के ईसाई कई अलग-अलग मत को मानते हैं। मालाबार तट पर बसे ईसाई आज भी सेंट थॉमस के बताए रास्तों पर ही चलते हैं। केरल के ईसाइयों को प्रमुख तौर पर कैथलिक, ओरिएंटल, ऑर्थोडॉक्स या प्रोटेस्टेंट में बांटा जाता है। आगे चलकर ये और महीन विचारों के आधार पर बंटते जाते हैं। इसमें सेंट थॉमस को मानने वाले ईसाइयों को नसरानी कहा जाता है और केरल के कुल ईसाइयों में इनकी आबादी लगभग 70 प्रतिशत है।