पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने 29 मार्च को एक साथ 234 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी। इस बार देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने दम पर अकेले राज्य की 294 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी को अब केवल 10 प्रत्याशियों की घोषणा करना बाकी है। भवानीपुर सीट से सीएम ममता बनर्जी के खिलाफ प्रदीप प्रसाद को उतारा गया है। पिछले चुनाव में शून्य पर सिमटी कांग्रेस ने इस बार अपनी जमीन खुद तलाशने का फैसला किया है और पार्टी इसपर आगे बढ़ चुकी है।
2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने संयुक्त मोर्चा के बैनर तले चुनाव लड़ा था। संयुक्त मोर्चा में कुल छाह पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ी थीं, इसमें हुए सीट बंटवारे में कांग्रेस के हिस्से में 91 सीटें आई थीं। चुनावी परिणाम आने के बाद संयुक्त मोर्चा और कांग्रेस का बुरा हश्र हुआ था। पूरे संयुक्त मोर्चा को महज एक सीट मिली थी, जबकि कांग्रेस शून्य पर खिसक गई। इससे पहले 2016 के चुनाव में कांग्रेस के पास 44 विधायक थे और 12 फीसदी से अधिक वोट शेयर था।
संघर्ष कर रही है पार्टी
अब पार्टी 2026 के चुनाव में उतर चुकी है। कांग्रेस को 49 साल से बंगाल में सत्ता के लिए संघर्ष कर रही है। पार्टी की आखिरी बार 1977 में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में सरकार बनी थी। इसके बाद सीपीआई (एम) और तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस को बंगाल की कुर्सी पर दोबारा नहीं बैठने दिया है। ऐसे में जिस तरह से बीजेपी को बंगाल में अपना मुख्यमंत्री देखने की उम्मीद है, ठीक वैसे ही कांग्रेस भी राज्य में सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रही है।
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हालांकि, 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने शनदार प्रदर्शन किया था और 44 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनी थी। पार्टी ने 92 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने वाम मोर्चा के साथ गठबंधन किया था, गठबंधन तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देने के लिए था। कांग्रेस राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। यह प्रदर्शन कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने लंबे समय बाद बंगाल में मजबूत वापसी की थी। उसने वाम दलों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया था।
कांग्रेस का वोट शेयर 12.25 फीसदी
इस चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 12.25 फीसदी रहा था। यह वोट शेयर 2011 के चुनाव से 3.16 फीसदी ज्यादा था। वहीं, सीपीआई-एम को महज 26 सीटे जीतकर ही संतोष करना पड़ा था। बीजेपी को इस चुनाव में सिर्फ 3 सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी। दरअसल, 2016 के चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को कुल 211 सीटें मिली थीं। उसके मुकाबले में लेफ्ट फ्रंट (कांग्रेस, सीपीआई-एम, आरएसपी, AIFB, सीपीआई) को मिलकार 76 सीटें मिलीं। वहीं, एनडीए (बीजेपी और जीजेएम) को 6 सीटें मिलीं।
2021 का विधानसभा चुनाव
इसी तरह से पांच साल बाच 2021 में एक बार फिर से पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए। इस चुनाव में भी एक तरफ सीपीआई-एम के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा बना और बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए ने ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा। संयुक्त मोर्चा में सीपीआई-एम (138) के बाद कांग्रेस ने 91 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, मगर यह वह चुनाव था जिसमें बंगाल की जनता ने पूरी तरह से कांग्रेस और वाम दलों का सूपड़ा साफ कर दिया। 2011 से पहले कभी बंगाल की राजनीति पर राज करने वाले वाम दलों और कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस ने 2016 के मुकाबले बहुत बुरा प्रदर्शन किया।
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इस बार अकेले चुनाव में उतरी कांग्रेस
इस चुनाव में कांग्रेस 12.25 फीसदी वोट शेयर (9.32%) से गिरकर 2.93 फीसदी पर आ गई साथ ही पार्टी 44 विधायकों से खिसकर शून्य पर आ गई। इस चुनाव में एनडीए और बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 77 सीटें जीत लीं। इस जीत के साथ ही बीजेपी बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई और कांग्रेस हाशिए पर चली गई। हाशिए पर जाते ही कांग्रेस का बंगाल में सरकार बनाने का सपना भी टूट गया। पिछले दोनों चुनावों में वाम दलों के साथ गठबंधन में लड़ने के बाद भी कांग्रेस सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाई।
दोनों चुनावों में हार मिलने के बाद पार्टी इस बार अकेले चुनाव में उतरी है। ऐसे में देखना होगा कि 4 मई को रिजल्ट आने के बाद कांग्रेस का 49 साल बाद बंगाल में सरकार बनाने का सपना पूरा होता है या नहीं।
