भारत के किसी भी राज्य में वापमंथी दलों की सरकार बनना एक बड़ी घटना थी। साल 1957 का चुनाव केरल के लिए पहला विधानसभा चुनाव था और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने इसमें जीत हासिल करके पूरे देश के राजनीतिक पटल पर खलबली मचा दी थी। तब शायद ही किसी को उम्मीद रही होगी कि लेफ्ट की यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। इसके पीछे विमोचन समारम का नाम आता है, अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी यानी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) के हाथ का जिक्र आता है और लेफ्ट के दल आज भी मानते हैं कि सरकार को बर्खास्त करने का फैसला लिए जाने के पीछे एक बहुत बड़ी और सोची-समझी साजिश थी।
इसकी बड़ी वजह यह भी थी कि लेफ्ट की सरकार पहली बार चुनकर बनी थी और वह कुछ ऐसे काम करने का इरादा रखती थी जिनके बेहद लोकप्रिय होने की उम्मीद थी। यही वजह है कि भारत में कांग्रेस से लेकर अमेरिका तक को इसकी चिंता थी। कुछ अमेरिकी अधिकारियों के कबूलनामे ने इस बात को लेकर और भी हवा दे दी थी कि केरल की उस लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंकने के पीछे अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी CIA का हाथ था।
ताजपोशी और खलबली
नए नवेले राज्य केरल में वामपंथी काफी समय से सक्रिय थे। रबर की खेती करने वाली किसानों से लेकर मिलों में काम करने वाले कामगारों के बीच सक्रियता के चलते CPI को जीत मिली और उशने केरल में सरकार बनाई। ईएमएस नंबूदरीपाद मुख्यमंत्री बने। अगर सैन मैरिनो को छोड़ दें तो यह दूसरी बार हो रहा था जहां वापमंथी दल चुनकर सत्ता में आए थे। इसी के चलते पूरी दुनिया की नजर केरल पर थी। वैचारिक रूप से कम्युनिज्म पर चलने वाले दल क्या करने वाले वाले हैं, यह सब देख रहे थे। जैसा कि लेफ्ट के दलों का वादा था, वैसे ही काम शुरू किए गए।
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हालांकि, इन वादों का पूरा करना आसान काम नहीं था। भूमि सुधार जैसे वादे बोलने में जितने आसान थे, उनको जमीन पर उतारना उतना ही टेढ़ा। लेफ्ट के दलों का सच से सामना भारत में पहली बार हो रहा था। 1957 में ही केरल के शिक्षा मंत्री जोसेफ मुंडासरी केरल एजुकेशन बिल 1957 लेकर आए। मकसद था कि केरल के स्कूलों को सरकारी और सख्त नियमों के तहत लाया जाए। पहला प्रयास था कि जिन भी निजी स्कूलों को सरकारी सहायता मिल रही है उनमें शिक्षकों की नियुक्ति सरकारी सहमित से हो। इसमें कई स्कूल ऐसे थे जिन्हें या तो चर्च चलाते थे या फिर अलग-अलग जातियों से जुड़े संगठन। मामला बिगड़ने लगा।
सीरियन कैथलिक चर्च और नायर सर्विस सोसायटी (NSS) जैसे संगठनों के लिए तो यह बिल बड़ा झटका था। उन्हें लगा कि उनका कंट्रोल खो जाएगा। अगर यह बिल लागू हो जाता तो धार्मिक संगठनों का शैक्षणिक संस्थानों पर नियंत्रण नहीं रह जाता। इसीलिए इसका विरोध होना शुरू हुआ।
दूसरा प्रस्ताव था कि भूमिहीनों को जमीन मिले। केरल सरकार ने प्रस्ताव रखा कि जो किसान लंबे समय से किसी जमीन को पट्टे पर लेकर खेती कर रहे हैं, उन्हें उस जमीन का मालिकाना हक मिले। इतना ही नहीं, लैंडहोल्डिंग पर सीलिंग लगाने और किसानों को उनकी जमीन से हटाने के खिलाफ सख्ती होने लगी। उस समय ज्यादातर जमीन नायरों और सीरियन क्रिश्चियन कम्युनिटी के पास थी तो वे इस फैसले से भी नाराज हो गए।
वादों का जाल और फंसती लेफ्ट सरकार
ऐसे प्रस्ताव आते ही लेफ्ट की सरकार का विरोध होने लगा। चर्च ने इस ऐसे दिखाया जैसे उसकी धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला हो रहा हो। इसी तरह नायर सर्विस सोसायटी के मन्नतू पद्मनाभन की अगुवाई में प्रदर्शन होने लगे। कांग्रेस को भी अपनी हार का बदला लेने का मौका दिखा और उसने भी इन प्रदर्शनों को हवा देने की शुरुआत कर दी। शुरुआत में तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही थे लेकिन आगे चलकर मामला बिगड़ता गया।
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इसी लेफ्ट सरकार के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन को विमोचन समारम या मुक्ति का संघर्ष भी कहा जाता है। रोचक बात है कि लेफ्ट सरकार के फैसलों से ज्यादातर जनता को सीधा लाभ मिल सकता था लेकिन वही लोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने उतर आए थे। प्रदर्शन करने वालों में छात्र, किसान, धार्मिक लोग, महिलाएं, राजनीतिक लोग, मजदूर और शिक्षक तक शामिल थे।
इसकी पहली बड़ी वजह थी कि स्कूलों से जुड़े बिल के विरोध में कैथलिक चर्च ने अपने स्कूलों को बंद कर दिया था। इसी तरह NSS को भी मौका मिला और उसने भी विरोध शुरू किया। मुस्लिम लीग को इन सुधारों से ज्यादा कोई मतलब नहीं था। उसे उम्मीद थी कि कांग्रेस उसे राष्ट्रीय पहचान दिलाएगी। इसी मोह में वह भी लेफ्ट सरकार के खिलाफ उतर आई। एक और रोचक बात है कि केरल राज्य बनने से पहले त्रावणकोर-कोचीन में 1949 से 1956 के बीच कुल पांच मुख्यमंत्री बन चुके थे। इसमें से चार कांग्रेस के थे और एक पीएसपी। ये सरकारें भी कमोबेश वैसे ही प्रयास कर चुकी थीं जैसे लेफ्ट ने किए लेकिन वे कभी सफल नहीं हुए।
अब लेफ्ट सरकार वही काम बड़ी स्थिरता से कर रही थी और विरोधी दलों को डर सताने लगा था कि अगर सारे काम होते गए तो शायद उन्हें वापसी का मौका ही नहीं मिलेगा। कांग्रेस को डर था कि अगर लेफ्ट का यह मॉडल केरल में सफल हो गया तो उसकी लोकप्रियता पूरे देश में फैल सकती है।
गोलीबारी और लेफ्ट सरकार बर्खास्त
12 जून 1959 को कांग्रेस ने विमोचन समारम दिनम मनाने का एलान किया। इस तारीख से आंदोलन में अपने आखिरी चरण में प्रवेश कर लिया। 13 जून 1959 को अंगामाली में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी। इस गोलीबारी में 7 लोगों की मौत हो गई। अब प्रदर्शन उग्र होने लगे। जवाब में पुलिस ने भी दमनकारी कदम उठाने शुरू कर दिए। हिंसक प्रदर्शन और जोरदार दमन का असर ऐसा हुआ कि राज्य अशांत हो उठा और केंद्र की नेहरू सरकार को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया।
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मुख्यमंत्री नंबूदरीपाद ने अपनी सरकार का मत समझाने के लिए प्रधानमंत्री नेहरू को आमंत्रित किया। एयरपोर्ट पर खुद सीएम नंबूदरीपाद ने पंडित नेहरू का स्वागत किया। राजभवन जाने के रास्ते में प्रदर्शनकारी आ गए और उन्होंने मांग की कि केरल की लेफ्ट सरकार को बर्खास्त किया जाए। पंडित नेहरू ने राजभवन से मदद मांगी और सभी स्टेकहोल्डर्स से भी बातचीत की। जब वह लौटने लगे तो मीडिया के सामने यह कह दिया कि यह बहुजन मुन्नेत्तम यानी लोकप्रिय आंदोलन है। इसने दिखाया कि खुद पंडित नेहरू प्रदर्शनकारियों के समर्थन में थे। राज्यपाल से कहा गया कि वह केरल के हालात पर एक रिपोर्ट तैयार करें। राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि राज्य में कानून-व्यवस्था खराब हो गई है।
केरल में बिगड़ते हालात ने केंद्र की पंडित नेहरू सरकार को मौका दे दिया था। आखिरकार साल 1959 में 31 जुलाई को पंडित जवाहर लाल नेहरू की केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल किया। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसी अनुच्छेद के जरिए केरल की ई एम एस नंबूदरीपाद की सरकार बर्खास्त कर दी। साथ ही विधानसभा भी भंग करने का आदेश दे दिया। सिर्फ 27 महीने में ही गैर-कांग्रेसी सरकार बर्खास्त हो जाना बहुत बड़ी घटना थी। कहा जाता है कि पहले पंडित नेहरू ऐसा नहीं करना चाहते थे लेकिन स्थिति बिगड़ते देख उन्हें अपने सहयोगियों की बात माननी पड़ी।
CIA की क्या भूमिका थी?
कहा जाता है कि विमोचन समारम यानी इस आंदोलन के पीछे CIA की भी भूमिका थी। 1970 में भारत में अमेरिका के राजदूत रहे डैनिएल पैट्रिक मोयनीहान ने अपने संस्मरण 'अ डैंजरस प्लेस' में लिखा कि केरल की कम्युनिस्ट पार्टी को हटाने और कई अन्य कामों के लिए CIA ने कांग्रेस की फंडिंग की थी। सीपीएम के नेता और केरल सरकार में मंत्री रहे थॉमस इजाक ने इस बारे में कहा, '1950 के दशक में CIA ने दुनियाभर के कई देशों में चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंका।' डैनिएल पैट्रिक मोयनीहान ने यह भी लिखा था कि इंदिरा गांधी ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए कई बार CIA से फंडिंग ली।
