ईरान युद्ध अब एक और चरण की तरफ बढ़ रहा है। अगर इसे सही समय पर रोका नहीं गया तो दुनिया सबसे बड़े ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ी होगी। अभी तक अमेरिका-इजरायल ने सिर्फ ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमलों को अंजाम दिया। वहीं जवाबी एक्शन में ईरान ने भी खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इराक में अमेरिकी सैन्य अड्डे के अलावा दूतावास पर हमला किया गया। मगर इजरायल ने पार्स गैस क्षेत्र में हमला करके जंग का एक नया चरण खोल दिया है।
इजरायली सेना ने बुधवार को दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र दक्षिणी पार्स पर हमला किया। यहां कतर के साथ मिलकर ईरान एलएनजी का उत्पादन करता है। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी से बातचीत करने के बाद इजरायल ने ईरान के गैस क्षेत्र को निशाना बनाया। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण है। इसके जवाब में ही ट्रंप ने इजरायल को गैस क्षेत्र में हमले की मंजूरी दी।
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दक्षिणी पार्स क्षेत्र में इजरायली हमले का ईरान ने कुछ ही घंटे में जवाब दिया। उसने सऊदी अरब की राजधानी रियाद और कतर के रास लाफान गैस फील्ड पर बैलेस्टिक मिसाइल से हमला किया। कतर प्रशासन के मुताबिक रास लाफान को भारी नुकसान पहुंचा है। ईरान ने कतर के अलावा सऊदी अरब की समरेफ रिफाइनरी और जुबैल पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स, संयुक्त अरब अमीरात के अल-होसन गैस क्षेत्र, कतर के मेसाईद पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स, मेसाईद होल्डिंग कंपनी पर हमले की धमकी दी थी। ईरान के यह हमले दुनिया के सामने सबसे गंभीर वैश्विक ईंधन संकट पैदा कर सकते हैं।
रास लाफान: यह दुनिया का सबसे बड़ी एलएनजी उत्पादन करने वाला क्षेत्र है। कतर की राजधानी से करीब 80 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहां दुनियाभर की करीब 20 फीसद एलएनजी का उत्पादन होता है। यहां पहले से ही उत्पादन बंद है। मगर ताजा हमले से उत्पादन को दोबारा शुरू करने में अधिक समय लगेगा। नतीजा यह होगा कि गैस की कीमतें लंबे समय तक महंगी बनी रह सकती हैं। पूरी क्षमता से उत्पादन करने में कई महीनों का समय लग सकता है। यूरोप की एलएनजी पर अधिक निर्भरता है। खाड़ी देशों पर ईरानी हमलों का असर सीधे यूरोप पर पड़ेगा। तुर्की, जापान और भारत की भी निर्भरता अधिक है।
दक्षिणी पार्स गैस क्षेत्र: यह इलाका करीब 9,700 वर्ग किलोमीटर में फैला है। ईरान के असलूयेह शहर के करीब स्थित यह इलाका दुनिया की सबसे बड़ी गैस फील्ड है। मैदान के तीन हिस्सों पर ईरान का कब्जा है। उत्तर के एक हिस्से पर कतर का नियंत्रण है। ईरान अपनी जरूरत का करीब 75 फीसद प्राकृतिक गैस का उत्पादन यही से करता है। यही कारण है कि इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। हालांकि यहां से कुछ गैस इराक को भेजी जाती है। हमले के बाद ईरान ने यह आपूर्ति रोक दी है। इस कारण इराक में बिजली का उत्पादन प्रभावित हुआ है।
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ट्रंप प्रशासन को क्या डर सता रहा है?
- ट्रंप प्रशासन को एक डर भी सता रहा है। अगर ईरान की तेल और गैस सुविधाओं पर ईरान हमला जारी रखता है तो दुनियाभर में ईंधन के दाम बढ़ सकते हैं।
- अमेरिका का मानना है कि इन हमलों से ईरान की जनता को नुकसान पहुंचेगा। विद्रोह में उसे ईरानी जनता का साथ चाहिए। मगर हमले के बाद ईरानी जनता नाराज हो सकती है।
- अमेरिका चाहता है कि वेनेजुएला की तरह ईरान के तेल और गैस क्षेत्र में उसका प्रभाव हो। युद्ध के बाद वह ईरान के साथ सहयोग चाहता है। अगर हमलों में ईंधन सुविधाओं को निशाना बनाया गया तो दोबारा भारी भरकम निवेश लगेगा।
- डर यह भी है कि अपनी तेल सुविधाओं के जवाब में तेहरान खाड़ी के देशों के तेल अवसंरचना पर बड़े हमले कर सकता है। इन्हीं सभी कारणों से ट्रंप प्रशासन ने इजरायल से ईरान की तेल सुविधाओं पर हमला न करने का आग्रह किया।
ईरान की दबाव वाली रणनीति
युद्ध के शुरूआती चरण में ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। बहरीन और ओमान समेत कुछ देशों में तेल सुविधाओं पर मामूली हमले किए, ताकि यह संदेश भेजा जा सके कि अगर ईरान पर हमले जारी रहते हैं तो वह आने वाले समय में तेल और गैस सुविधाओं को निशाना बनाएगा। तेल और गैस ही खाड़ी देशों की दुखती रग है। उनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही इस पर टिकी है। अगर खाड़ी देशों का तेल ढांचा तबाह होता है तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा संकट देखना पड़ सकता है।
पहले नाकाबंदी अब उत्पादन, ईरान के निशाने पर क्या-क्या?
इजरायल और अमेरिका ने जब बमबारी तेज की तो जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को रोक दिया। दुनिया के कई देशों पर ऊर्जा संकट खड़ा हुआ और अचानक ईंधन के दाम बढ़ने लगे। अब यहां से ईरान की मंशा के बिना कोई टैंकर नहीं गुजर पा रहा है। दुनियाभर के कई देशों में गैस और तेल का संकट खड़ा हो गया है। ईरान ने होर्मुज पर पाबंदी लगाकर दुनिया को अपनी ताकत का प्रदर्शन किया।
उधर, ट्रंप प्रशासन ईरान के सामने बेबस है। लगातार दबाव बनाया जा रहा है, ताकि होर्मुज को खुलवाया जा सके। चीन, जापान, फ्रांस और यूके तक से मदद मांगी जा चुकी है। मगर ईरान समझ चुका है कि होर्मुज न केवल खाड़ी देशों, बल्कि अमेरिका भी नाजुक नब्ज है। इस पर चोट करके अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव बनाया जा सकता है। अब ईरान होर्मुज को दबाव के टूल के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
होर्मुज खुल भी गया तो कोई फायदा नहीं होगा!
पार्स पर इजरायली हमले के बाद युद्ध का नया चरण खुल चुका है। अगर ईरान की तेल सुविधाओं पर हमले जारी रहते हैं तो जवाबी कार्रवाई में खाड़ी देशों के ईंधन ठिकानों पर तेहरान के हमले तय हैं। यदि यह हमले सफल होते हैं तो दुनियाभर में अभी ऊर्जा आपूर्ति का संकट है। मगर कुछ दिन में यह ऊर्जा उत्पादन का संकट बन जाएगा। ऐसी स्थिति में अगर अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवा भी लिया तो दुनिया को इसका कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि हमलों के कारण खाड़ी देशों में तेल और गैस का उत्पादन ही ठहर जाएगा।
ट्रंप का कयामत का दिन
डोनाल्ड ट्रंप अभी तेल सुविधाओं पर हमले के पक्ष में नहीं है। मगर वह इस विकल्प को 'कयामत के दिन' की खातिर बचाकर रखना चाहते हैं। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अगर ईरान पहले खाड़ी देशों की तेल सुविधाओं पर हमला करता है तो उसका जवाब ईरान की ईंधन सुविधाओं पर हमला करके दिया जाएगा। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि यदि ईरान ने वैश्विक तेल आपूर्ति को नुकसान पहुंचाया तो उसे 20 गुना अधिक दंड मिलेगा।
