बालेंद्र शाह, जब से प्रधानमंत्री बने हैं, तब से नेपाल की वैश्विक कूटनीति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कभी भारत के साथ उनका टकराव देखने को मिलता है, कभी अमेरिका के साथ। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री और दक्षिण और मध्य एशिया के लिए नियुक्त विशेष राजदूत सर्गियो गोर दोनों के साथ उन्होंने मिलने तक से मना कर दिया था।
बालेंद्र शाह, ने एक साल तक कोई भी विदेश दौरा न करने का फैसला किया है। विदेशी प्रतिनिधियों के साथ वह मुलाकात केवल समकक्षता के स्तर पर करना चाहते हैं। जैसे अगर वह प्रधानमंत्री हैं तो कोई प्रधानमंत्री स्तर का व्यक्ति ही उनसे मिले, न कि विदेश मंत्री या राजदूत।
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क्यों नेपाल की मुसीबत बढ़ा रहे हैं बालेन शाह?
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की विदेश नीति पर ही सवाल उठ रहे हैं। बालेन शाह नेपाल की पारंपरिक विदेश नीति को बदलना चाहते हैं। नेपाल में जब तक राजतंत्र था, बीरेंद्र वीर शाह विक्रम राजा थे, तब तक, भारत की तरफ उनका स्वाभाविक झुकाव था। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते बेहतर थे। नेपाल, अब चीन की तरफ ज्यादा झुका नजर आता है। बालेन शाह, अभी एक बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
नेपाल में बदल क्या रहा है?
नेपाल में साल 2008 में कई साल की हिंसक क्रांति, राज परिवार के नरसंहार के बाद, नई लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम हुई। नेपाल, 1996 से लेकर 2006 के माओवादी विद्रोह से जूझता रहा। 2008 में लोकतंत्र बना, राजनीतिक व्यवस्था बदली, लेकिन विदेश नीति में बहुत कुछ बदल चुका था। नेपाल में माओवादी सरकार बनी, जिसका झुकाव, स्वाभाविक तौर पर चीन के साथ रहा। भारत के खिलाफ खूब बयानबाजियां हुईं लेकिन भारत ने संयम बरता। भारत के संयम की एक और परीक्षा हो रही है।
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भारत से रिश्ते तल्ख करेंगे बालेन शाह?
नेपाल में जेन जी युवाओं के आंदोलन के बाद, नई सरकार, नेपाल के रिश्तों को भी बदलना चाहती है। बालेन शाह, राष्ट्र प्रथम की नीति पर भरोसा करते हैं, लेकिन यह अब उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से बालेन शाह ने मुलाकात तक नहीं की, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक, भारतीय प्रतिनिधियों से मिलते रहे हैं। उन्होने सर्गियो गोर से भी मुलाकात नहीं की।
बालेन शाह की नीति पर क्या कह रहे हैं लोग?
दीवान लॉ कॉलेज में इंटरनेशनल स्टडीज के पढ़ाने वाले असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने कहा, 'बालेन शाह, विदेशी राजदूतों और प्रतिनिधियों को अलग-अलग नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से मुलाकात करते हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में ऐसे व्यवहार, कूटनीतिक नजरिए से ठीक नहीं समझे जाते। लोग इसे अकड़ समझे हैं और अकड़ से कूटनीति नहीं चलती है। एक तथ्य है भी है कि नेपाल में भारत विरोध तेजी से बढ़ा है। नेपाल में भारतीयों से बदसलूकी के मामले भी सामने आ रहे हैं। लिपुलेख, कालापानी विवाद पहले से है। ऐसे में अगर यही रुख रहा तो भविष्य में और टकराव बढ़ सकते हैं।'
बालेन शाह क्यों कर रहे हैं ऐसा?
नेपाल के एक स्थानीय अखबार में वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार ने कहा, 'बालेन शाह, अपनी कैंपेनिंग में भी संयमित नजर आए। न किसी को इंटरव्यू दिया, न ज्यादा बात की। उन्होंने सीमित मुलाकातों को अपनी नीति बनाया है, जिससे मीडिया में यह न चर्चा हो कि नेपाल किस पक्ष में झुक रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत सर्जियो गोर मिलना चाहते थे, लेकिन प्रधानमंत्री शाह ने घरेलू प्राथमिकताओं का हवाला देकर मुलाकात नहीं की।'
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भारत, अमेरिका सबके लिए एक जैसा है रुख
प्रेम कुमार ने कहा, 'बालेन शाह न सर्जियो गोर से मिले, न ही विदेश सचिव विक्रम मिस्री से। उनकी जगह विदेश मत्री शिशिर खनाल और वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले मिल रहे हैं। बालेन, अपनी पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने को भी आगे कर रहे हैं। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री 11 मई को काठमांडू जाने वाले थे लेकिन यह दौरा टल गया।'
बालेन शाह पहले भारत आने वाले थे, अब 1 साल तक, घरेलू प्राथमिकताओं का हवाला देकर वह कोई दौरा ही नहीं करेंगे।
चीन को भी नहीं मिल रहा भाव
बालेन शाह, चीन के राजदूत झांग माओमिंग से भी नहीं मिले। चीन, नेपाल से संपर्क बनाए रखना चाहता है लेकिन नेपाल, चुप है। चीन के लिए तिब्बत उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। नेपाल में तिब्बती निर्वासियों की गतिविधियों पर चीन सतर्क रहता है। 2008 के बाद माओवादी सरकार ने फ्री तिब्बत प्रदर्शनों पर सख्ती बरती थी। बालेन शाह ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार बताते हैं, 'नेपाल के युवा, तिब्बत का समर्थन करते हैं और माओवादियों की चीन परस्त नीतियों से बचते रहे हैं। अब देश में राष्ट्रवादी सरकार है। अब इस मुद्दे पर अगर पहले वाला रुख रखते हैं तो वह अपने लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।'
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बालेन का रुख, नेपाल के लिए मुश्किलें क्यों बढ़ा सकता है?
असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने कहा, 'नेपाल दो बड़े देशों से घिरा बफर देश है। नेपाल में औद्योगिक क्रांति, अस्थिर सरकारों की वजह से हाशिए पर है। बिजली से लेकर दवाइयों तक पर नेपाल की निर्भरता भारत और चीन जैसे देशों पर है। अगर 1 साल तक, बालेन शाह, अपनी नीतियों के बारे में ऐसी चुप्पी साधते हैं तो अनिश्चितता बनी रहेगी और चाहकर भी भारत जैसे देश, उनसे दूर होते चले जाएंगे।'
निखिल गुप्ता ने कहा, 'इंटरनेशनल ट्रेड एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़े बताते हैं कि नेपाल की सकल घरेलू आय का 22 से 25 फीसदी हिस्सा विदेश से भेजा गया पैसा होता है। रोजाना इस्तेमाल में आने वाली चीजों से लेकर पेट्रोल, डीजल और निर्माण गतिविधियों तक, नेपाल की भारत पर निर्भरता है। नेपाल का भारत से दूर जाना, वहां की अर्थव्यवस्था के लिए भी ठीक नहीं है।'
