अमेरिका और ईरान के बीच जंग ने कई देशों को दुविधा में डाल दिया है। हालत यह है कि कई देश खुलकर किसी के पक्ष में बोलने से परहेज कर रहे हैं। कुछ दिन पहले तक खबर थी कि सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की और सोमालिया एक नया सैन्य गठबंधन बनाने पर विचार करने में जुटे हैं। मगर खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों ने सबको दुविधा में डाल दिया है। मध्य पूर्व में अमेरिका के हर संकट में साथ देने वाला मिस्र भी असमंजस में फंसा है।

 

मिस्र की अर्थव्यवस्था बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। दुनियाभर में ईंधन की अनिश्चितता का असर यहां भी पड़ रहा है। होर्मुज से निकलने वाला हर टैंकर ईरान की निगाह पर है। ऐसे में मिस्र चाहकर भी ईरान की आलोचना करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। भले ही दशकों से उसकी अर्थव्यवस्था को खाड़ी देशों से आर्थिक सहायता मिलती रही है। मिस्र के सामने एक और धर्म संकट यह है कि अगर ईरान से सीधी बातचीत की तो सऊदी अरब समेत उसके खाड़ी के सहयोगी खफा हो सकते हैं।

 

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संकट में मिस्र की अर्थव्यवस्था

कोविड महामारी और बाद में रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से मिस्र में महंगाई काफी बढ़ चुकी है। स्वेज नहर के शुल्क से मिस्र की बड़ा राजस्व हासिल होता है। मगर लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमले से इसमें भी कमी आई। अब हूती विद्रोही दोबारा बाब अल मंडेब जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दे रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो मिस्र को स्वेज नहर से होने वाली आय में और कमी का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि मिस्र खाड़ी देशों के साथ एकजुटता नहीं दिखा पा रहा है और खुलकर ईरान का विरोध भी नहीं कर पा रहा है।

ईंधन ने मिस्र को दुविधा में डाला

ईरान युद्ध के कारण मिस्र भीषण ऊर्जा संकट की चपेट में है। बिजली की भारी कटौती की जा रही है। मिस्र का ऊर्जा आयात बिल जनवरी में 1.2 अरब डॉलर था। यह मार्च में बढ़कर 2.5 अरब डॉलर हो गया है। सरकार को 30 फीसद से अधिक दाम बढ़ाने पड़े हैं। सरकारी गाड़ियों को 30 फीसद कम ईंधन आवंटित किया जा रहा है। स्ट्रीट लाइट और सड़क किनारे विज्ञापन को दी जाने वाली लाइट में 50 फीसद की कमी की गई है।

 

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मिस्र के सामने क्या खतरा?

मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सिसी ने हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से बात की। उन्होंने बातचीत के माध्यम से तनाव को कम करने पर जोर दिया और कहा कि मिस्र मध्यस्थता के माध्यम से हर संभव मदद को तैयार है। मिस्र ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ईरान के साथ युद्धविराम पर भी चर्चा की। विदेश मंत्री अब्देलट्टी ने सक्रिय भूमिका निभाई। 31 मार्च को सिसी ने ट्रंप से बात की और दावा किया कि सिर्फ ट्रंप ही युद्ध को रुकवा सकते हैं। दो अप्रैल को मिस्र के विदेश मंत्री मॉस्को पहुंचे। यहां उन्होंने पुतिन से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच अनाज और ऊर्जा गलियारा खोलने पर चर्चा हुई।


मिस्र की सिसी सरकार ईरान के साथ संतुलन बनाना चाहती है। वह उन पहलों को करने से भी परहेज नहीं कर रही है, जिससे ईरान को फायदा हो। मगर इन कदमों के अपने खतरे हैं। ईरान को फायदा पहुंचाने वाले मिस्र के कदम से उसके खाड़ी के सहयोग खफा हो सकते हैं। संयुक्त अरब अमीरात ने मिस्र में सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर रखा है।

 

दो साल पहले 2024 में यूएई ने मिस्र के रास अल-हिकमा जिले को 35 अरब डॉलर में खरीदा था। यह रकम मिस्र को आर्थिक संकट से उबारने के काम आई थी। कतर ने भी 3.5 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है। कुवैत के करीब 4 अरब डॉलर और सऊदी अरब के 10 अरब डॉलर से अधिक की राशि मिस्र की केंद्रीय बैंक में जमा है। अगर मिस्र ने ईरान के पक्ष में कोई कदम उठाया तो खाड़ी देश यह रकम निकाल सकते हैं।