ईरान पर अमेरिका का हमला करीब-करीब तय है। मध्य पूर्व के देशों में चिंता की लहर है। इजरायल उत्साहित है। मगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इजरायल के अलावा एक और देश का साथ मांगने में जुटे हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि ईरान पर हमले में ब्रिटिश सैन्य अड्डों की भूमिका अहम होगी, लेकिन ब्रिटेन की सहमति के बिना इनका उपयोग नहीं किया जा सकता है।
द टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक जब ब्रिटेन ने डिएगो गार्सिया के इस्तेमाल पर रोक लगा दी तो जवाब में ट्रंप ने ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर के उस फैसला की आलोचना की। जिसके तहत चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को लौटाना है।
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इन दो एयरबेस पर अमेरिका की निगाह क्यों?
डोनाल्ड ट्रंप ब्रिटेन के दो एयरबेस का एक्सेस चाहते हैं। पहला एयरबेस डिएगो गार्सिया है। वहीं दूसरा ग्लॉस्टरशायर स्थित आरएएफ फेयरफोर्ड है। डिएगो गार्सिया हिंद महासागर में स्थित चागोस द्वीप समूह में स्थित है। यह पूरे इलाके में अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त तौर पर सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। पिछले साल अमेरिका ने ईरान के तीन परमाणु प्लांट पर बी-2 स्टील्थ विमानों से बमबारी की थी। यह विमान डिएगो गार्सिया से ही टेकऑफ और लैंड कर सकता है।
अगर अमेरिका को ईरान की राजधानी तेहरान समेत अंदरूनी हिस्से में बमबारी करना है तो यह बी-2 विमानों के माध्यम से सिर्फ डिएगो गार्सिया से ही संभव है। ब्रिटेन के ग्लॉस्टरशायर स्थित आरएएफ फेयरफोर्ड भी अहम है। इसकी वजह यह है कि ये यूरोप का इकलौता एयरबेस है, जहां अमेरिका के बी-52 बमबर्षक विमान तैनात हैं। यहां का रनवे भी 10,000 फुट लंबा है। आज से करीब 23 साल पहले 2023 में ईराक पर हमले के वक्त इस बेस ने सबसे अहम भूमिका निभाई थी।
ट्रंप ने क्या कहा था?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक पोस्ट में लिखा, अगर ईरान समझौता करने से इनकार करता है तो अमेरिका के लिए डिएगो गार्सिया और फेयरफोर्ड में स्थित हवाई अड्डे का इस्तेमाल करना आवश्यक हो सकता है, ताकि एक अत्यंत अस्थिर और खतरनाक शासन के संभावित हमले को विफल किया जा सके।' माना जा रहा है कि अमेरिका इन एयरबेस का एक्सेस इसलिए भी चाहता कि हमले की स्थिति में ईरान यहां तक अपनी मिसाइलों को नहीं पहुंचा पाएगा। उससे पहले ही इन्हें निष्क्रिय कर दिया जाएगा।
खाड़ी देशों का एंगल भी समझिए
दूसरा सबसे अहम एंगल यह है कि ईरान ने मध्य पूर्व के देशों के सीधे धमकी दी है। उसने कहा कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह इलाके में स्थित अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाएगा। अब अमेरिका की रणनीति है कि ईरान पर हमलों को मध्य पूर्व के बाहर स्थित एयरबेस से अंजाम दिया जाए, ताकि इलाके को बड़ी तबाही से बचाया जा सके। खबरें यह भी हैं कि कुछ खाड़ी देशों ने अपनी धरती का इस्तेमाल करने से साफ मना कर दिया है। इस वजह से अमेरिका को अब ब्रिटेन का सहारा लेना पड़ रहा है।
ब्रिटेन का सहयोग क्यों जरूरी?
अमेरिका मध्य पूर्व में सैन्य तैनाती बढ़ाने में भी ब्रिटेन के एयरबेस का इस्तेमाल कर रहा है। अधिकांश अमेरिकी लड़ाकू विमान आरएएफ लेकनहीथ और मिल्डेनहॉल से ईंधन भरने के बाद आगे बढ़ते हैं। बहरीन के नेवी बेस, कतर और यूएई में स्थित एयरबेस व ओमान के जासूसी स्टेशन पर ब्रिटेन के सैनिक बड़ी तादाद में तैनात हैं। हाल ही में अमेरिका के अनुरोध पर ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमानों को कतर एयरबेस में तैनात किया है। जॉर्डन और साइप्रस के बेस पर भी ब्रिटेन सेना की पड़ी तैनाती है। दो सप्ताह पहले ही ब्रिटेन ने साइप्रस के बेस में एफ-53 समेत कई लड़ाकू विमानों की तैनाती की है।
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कैसे संघर्ष में शामिल हो सकता है ब्रिटेन?
अमेरिका-ब्रिटेन और इजरायल के बीच सैन्य सहयोग की जानकारी ईरान को भलीभांति है। अगर अमेरिका हमलों के जवाब में ईरान ब्रिटेन के बेस को निशाना बनाता है तो संघर्ष में उसका कूदना लाजिमी है। 2024 के अक्टूबर महीने में ईरान ने बैलेस्टिक मिसाइलों से इजरायल पर हमला किया था। उस वक्त ब्रिटेन के टाइफून विमानों ने हमलों को निष्क्रिय करने में अहम भूमिका निभाई थी।
बेस के इस्तेमाल पर क्या बोला रक्षा मंत्रालय?
हाल ही में खबर आई कि ईरान के खिलाफ ब्रिटेन ने अमेरिका पर डिएगो गार्सिया के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। मगर आधिकारिक तौर पर ब्रिटेन ने यह बात नहीं स्वीकारी है। ब्रिटेन रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना है कि नियमित प्रक्रिया के मुताबिक हम अन्य देशों की ऑपरेशनल गतिविधियों पर टिप्पणी नहीं करते हैं। इसमें ब्रिटेन ठिकानों का तीसरे पक्ष द्वारा इस्तेमाल भी शामिल है। अमेरिका ब्रिटेन का प्रमुख रक्षा एवं सुरक्षा साझेदार है। अमेरिका के साथ हमारे रक्षा संबंधों की गहराई हमारी सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा है।
